Follow by Email

Friday, September 11, 2015

Skill Development Workshop



स्किल गेप एनालिसिस/पोस्ट टेªनिंग प्लेसमेंट की संभावनाओं पर कार्यशाला
दिनांक 11.09.2015 कलेक्ट्रेट जगदलपुर कार्यवाही विवरण
      जगदलपुर दिनांक 11.09.2015 कलेक्टर, श्री अमित कटारिया जी की अध्यक्षता एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी      श्री के.एल. चैहान जी की उपस्थिति में पोस्ट टेªनिंग प्लेसमेंट की संभावनाओं पर विचार करने के लिए कार्यशाला का आयोजन कलेक्ट्रेट के प्ररेणा हाॅल में किया गया।
      कार्यशाला में नगर के व्यापारियों, उद्योगपतियों, स्किल डेव्हलपमेंट से जुड़े शासकीय विभाग, आई.टी.आई., महिला पाॅलीटेक्निक काॅलेज एवं बस्तर जिले में पंजीकृत अशासकीय वी.टी.पी. ने भाग लिया।
1. व्यापार एवं उद्योग समुदाय के प्रतिनिधियों ने बताया कि उन्हें निम्नानुसार ट्रेड में स्किल व्यक्तियों की आवश्यकता है-
क्र     संस्थान का नाम       प्लेसमेंट हेतु आवश्यक टेª
1              बस्तर चेंबर आॅफ कामर्स टैली एवं कंप्युटर , रिटेल पर्सन, ड्राईवर, वेल्डर, मैकेनिक
2              लक्ष्मी इंडस्ट्री    सिक्योरिटी गार्ड, हेल्पर, कंप्युटर आपरेटर
3              देवांश रेसीडेंसी   कुक, वेटर, असिस्टेंट मेनेजर
4              हाॅटल सूरी इंटरनेशनल  कुक, वेटर, टेली के जानकार, सिक्योरिटी गार्ड
5              बी.आर.कोल्ड स्टोरेज     आॅफिस असिस्टेंट (कंप्युटर एवं टेली जानकार)
6              वेशनवी प्रोडक्ट  कंप्युटर आॅपेरटर
7              नमन बस्तर रिर्सोट      वेटर  , हाऊस कीपर, आॅफिस असिस्टेंट, मार्केटिंग मैनेजर
8              बाबा चावल उद्योग      आॅपरेटर, मेनेजर
9              पंकज प्रिंटर     कंप्युटर आपरेटर , टेली एवं प्रिंटिंग आपरेटर
10           काम्बो मोटर्स(रायल इंफील्ड)      सेल्स मेनेजर , टू व्हीलर रिपेयर मेकेनिक
11           गुलजाॅर सिंग एण्ड कंपनी सेल्स पर्सन
12           खालसा एग्रो इंडस्ट्री      वेल्डर एवं इलेक्ट्रीशियन
13           प्रहलाद टेªडर्स   आॅपरेटर
14           मनोरमा नर्सिंग होम     नर्सिंग असिस्टेंट, बेड साईड अटेंडर
15           हेलीवाल कोल्ड स्टोरेज    आॅफिस असिस्टेंट
16           पूजा एग्रोटेक    मेनेजर, ड्राईवर, मिल आपरेटर, स्टोन क्रसर आपरेटर
17           कस्टमर सर्विस सेंटर     कंप्युटर कियोस, सिक्योरिटी गार्ड
18           बस्तर इंस्टीटयूट आफ अेकनाॅलाजी       टेली, डी.टी.पी.
19           पीयुस   आफिस असिस्टेंट, मेनेजर,
20           रजा राईस इंडस्ट्री कंप्युटर आपरेटर, टेली, सिक्योरिटी गार्ड
1.            बैठक में महाप्रबंधक उद्योग, उपसंचालक रोजगार, उपसंचालक उद्यानिकी, उपसंचालक रेशम, प्राचार्य शासकीय महिला बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता प्रशिक्षण केन्द्र , प्रबंधक हस्तशिल्प विकास बोर्ड, विभागाघ्यक्ष ग्रामीण प्रौद्यागिकी अध्ययन शाला बस्तर विश्वविद्यालय, एस.डी.ओ.पी.डब्लू.डी., सी.एस.ई.बी., सहायक संचालक जिला हाथकरघा, श्रम पदाधिकारी, प्राचार्य शासकी सह शिक्षा पाॅलीटेकनिक, आई.टी.आई. जगदलपुर, प्रबंधक एस.बी.आई. आरसेटी, पी.आर.ओ., एवं    उप संचालक क्रेडा ने भाग लिया एवं अपने विचार व्यक्त किये। बृहद उद्योगों की आवश्यकताओं पर भी चर्चा हुई, उन्हें किस प्रकार के दक्ष व्यक्तियों की आवश्यकता होगी।
2.            जिले में पंजीकृत अशासकीय एवं शासकीय वी.टी.पी. भी वर्कसाप में उपस्थित हुए।
सहायक संचालक
जिला कौशल विकास प्राधिकरण
जगदलपुर, जिला बस्तर

Tuesday, May 21, 2013

Bastar ka sahitya: मेरी एक नई कविता ‘‘हमारा घर’’ हमारा घर एक जीवांत...

Bastar ka sahitya: मेरी एक नई कविता ‘‘हमारा घर’’
हमारा घर
एक जीवांत...
: मेरी एक नई कविता ‘‘हमारा घर’’ हमारा घर एक जीवांत घर इसकी हर वस्तु में जीवन है खँूटी पर टंगी सफेद सर्ट मामा जी की याद दिलाती है कित...
मेरी एक नई कविता ‘‘हमारा घर’’
हमारा घर
एक जीवांत घर
इसकी हर वस्तु में जीवन है

खँूटी पर टंगी
सफेद सर्ट
मामा जी की याद दिलाती है
कितने प्यार से
उन्होनें वह दी थी मुझे

टाँड पर रखा
खराब माॅनीटर
बड़े भैया की याद दिलाता है
कितना उत्साह था
जब वेे घर पर
नया कंप्यूटर लेकर आये थे

मौसाजी और फूफाजी की तस्वीर.....
अब भी लगता है वो मुझे खिला रहे हों

नाना जी की तस्वीर देख
मुझे गुना में बिताये
बचपन के दिन याद आ जाते हैं

छोटी बहन सीमा तो
मानों पूरे घर में बसी है ....आज तक

सत्यदीप और संस्कार के
छोटे हो चुके कपड़े देख
उनका बचपन सामने आ जाता है

मेरा एक चारखाने वाला स्वेटर
मम्मी ने बनाया था
उस समय मैं
आठवीं में पढ़ता था
एक बार मेरे बड़े बेटे ने
उसे पहना
मुझे अपना बचपन
एवं मम्मी याद आ गई

मम्मी की यादे तो
पूरे घर में बसी है
घर के द्वार पर
बैठ वो सबकी समस्या
सुनती थी
सब उन्हें दादी कहते थे
यहाँ तक कि में भी
सत्यदीप जरा दादी को तो बुला दे...

पापा जब भी मुझे दिखते है
कुरते-पजामें में ही दिखते हैं
फ्रिज पर रखी तस्वीर
रोज मुझे से बतियाती है

मैने आज तक काॅलेज
की काॅपी एवं किताब नहीं फेंकी
एक-एक किताब मुझे
अपने साथी मित्रों की याद दिलाती है

हर साल दीवाली आती है
हर साल सफाई होती है
कबाड़ वाला माह में एक बार
तो आवाज देता ही है
किसे बेचूँ, किसे फेंकू
इस घर की तो हर वस्तु में जीवन है- शरद चन्द्र गौड़ मो. 9424280807

Saturday, January 19, 2013

Bastar ka sahitya: प्यासी इन्द्रावती

Bastar ka sahitya: प्यासी इन्द्रावती: यश  पब्लिकेशन दिल्ली को धन्यवाद , आज मुझे मेरे एवं धर्मपत्नी कविता गौड़ जी के कविता संग्रह ‘‘ प्यासी इंद्रावती ’’ का कवर पेज प्राप्...

प्यासी इन्द्रावती




यश  पब्लिकेशन दिल्ली को धन्यवाद , आज मुझे मेरे एवं धर्मपत्नी कविता गौड़ जी के कविता संग्रह ‘‘प्यासी इंद्रावती’’ का कवर पेज प्राप्त हुआ.....पूरी उम्मीद है कि विश्व पुस्तक मेले में दिनांक 04.02.2013 से 10.02.2013 के बीच इसका विमोचन हो सकेगा। बस्तर को करीब से देखने वाले...बस्तर के दर्द को अपना दर्द समझने वाले ‘‘राजीव रंजन प्रसाद’’ जी ने इस संग्रह की प्रस्तावना लिखी है। लीजिए प्रस्तुत है उनकी लिखी प्रस्तावना-
सदानीरा तथा प्यासी इन्द्रावती..।
----------

एक समय में मंदाकिनी नाम से जाने वाली नदी इन्द्रावती आज भी छत्तीसगढ राज्य के लगभग आधे भूभाग की जीवन रेखा है। यह बस्तर क्षेत्र के लिये केवल नदी नहीं है अपितु मनोभावना है। इस अंचल का एसा कोई कवि या साहित्यकार नहीं जिसकी कलम से इन्द्रावती अभिव्यक्त न हुई हो। अतीत का गौरव और वर्तमान की पीडा को सहेजे निरंतर बहती हुई इन्द्रावती कभी आदिम जीवन का साक्षी बनी तो कभी इसने विन्ध्य से इस अरण्य में पहुँचे महर्षि अगस्त्य का स्वागत किया; यह सरिता भगवान राम के चरण पखारने का गौरव भी रखती है। महायान के प्रवर्तक नागार्जुन नें इस सरिता के किनारे अपने ज्ञान का प्रसार किया तो चीनी यात्री ह्वेनसांग के कदम भी इस सरिता के कूलों पर पड़े हैं। इन्द्रावती नें देखा है समुद्रगुप्त का आक्रमण, नलों, वाकाटकों, नागों, चालुक्यों/काकतीयों, मराठों और अंग्रेजों का शासन समय। यह नदी गवाह है बस्तर के उन वीर आदिवासियों की जिन्होंने भूमकाल किये और शासन-सत्ता को चेताया। यह नदी गवाह है राजतंत्र के लोकतंत्र में विलय की और उसके बाद के अनेक उठापटकों, खीचतानों और अंतत: महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव की हत्या की। इन्द्रावती नें विकास का दौर भी देखने की कोशिश की और महसूस किया कि  किस तरह बैलाडिला से हो कर उसकी सहायक धारायें लाल प्रदूषित पानी उस तक ला रही हैं और यह भी कि उस पर बाँध बनाने की कोशिश निरस्त कर दी गयी। इन्द्रावती को अहसास है कि वह बस्तर अंचल की जीवन रेखा है फिर भी उसका जल यहाँ की एक प्रतिशत भूमि को भी सिंचित क्षेत्र में नहीं बदल सका है। इन्ही कश्मकशों के बीच इन्द्रावती की भूमि बारूदी सुरंगों के फटने और वाम-अतिवादियों की दहशत से दहलने लगी। नक्सलवाद नें क्रांति का लबादा ओढ कर कुछ इस तरह की स्याही फैलाई कि गहरा अंधकार पसर गया। हमेशा अपने में रहने वाला और अपनी ही शैली का जीवन जीने वाला समाज नक्सलवादियों और प्रसाशन की बंदूकों की नोक पर आ गया। कई बार आदिवासी ही आदिवासी के खिलाफ खडे हो उठे और गहरे अविश्वास के माहौल में अनेक तरह के खांचे वर्ग विहीन समाज बनाने का दावा करने वालों ने खीच दिये। इन्द्रावती सिसक रही है और जैसे उसका जल अश्रु प्रवाह बन कर ही इन दिनो बह रहा है।

         
“प्यासी इन्द्रावती” एक सशक्त शीर्षक है; उस काव्य संग्रह का जिसकी रचनायें बस्तर अंचल के परिवेश में लिखी गयी हैं। प्यासा शब्द अपने आप में गहरा बिम्ब है जो इस अंचल की वेदना को उसकी प्रतीक सरिता इन्द्रावती के माध्यम से प्रदर्शित करता है। इन्द्रावती आज निश्चित ही प्यासी है यदि संदर्भ सुकून और शांति का है। इन्द्रावती बस्तर की आत्मा है और उसकी प्यास समझी जा सकती है जब इस क्षेत्र में जीवन सहमा-डरा किसी तरह जिया जा रहा है। तकनीकी रूप से भी देखा जाये तो ओडिशा में एक साधारण नाले की ओर इन्द्रावती नदी के बदलते प्रवाह को रोकने की निरंतर कोशिशे की जाती रही हैं। सदानीरा यह नदी अगर अपना मार्ग बदल लेती है और ओडिशा की ओर बहने लगेगी तो न जाने इस अंचल में शेष क्या रह जायेगा? सही मायनो में इस चिंता को प्यासी इन्द्रावती काव्य संग्रह में इसके कवि-दम्पत्ति शरद चन्द्र गौड तथा कविता गौड नें स्थान दिया है। शरद चन्द्र गौड बस्तर अंचल के साहित्य जगत की वह आवाज़ हैं जिन्होंने अपने लेखन में मिट्टी की खुशबू को हमेशा बनाये रखा है। साहित्यिक उपलब्धियों की बात की जाये तो उनकी दो पुस्तके प्रकशित हुई हैं जिसमें “बस्तर एक खोज” तथा “तांगेवाला पिशाच” प्रमुख है। शरद जी न केवल काव्य मंचों पर ही चर्चित नाम है अपितु अंतर्जाल पर भी लम्बे समय से सक्रिय हैं तथा वैकल्पिक मीडिया में उन्होंने अपनी ठोस तथा रचनात्मक उपस्थिति दर्ज की है। कविता जी और शरद जी दोनो का ही एक साथ रचनात्मक होना एक सुखद युति है तथा संयुक्त रूप से इन दोनो का एक काव्यसंग्रह में प्रस्तुत होना उनके अपने भावनात्मक एकात्मकता का प्रमाण सदृश्य ही है।

इस संग्रह की रचनायें सरल, स्पष्ट व सुबोध हैं। पाठको के लिये सीधे हृदय में उतर जाने की क्षमता वाली इन कविताओं में बिम्बों या शब्दों की बाजीगरी नहीं की गयी है अपितु कविद्वय ने अपनी बात सीधे सीधे और बिना लाग-लपेट के कही है। कविताओं के शीर्षक जटिल नहीं हैं तथा रहस्यमयता नहीं बढाते। यह बात जोडनी होगी कि आज के दौर में कविता से दूर जाते पाठकों के बीच यह ठंडी हवा का झोंका सा काव्य संग्रह है जिसकी सुबोधता उन्हें अविस्मरणीय पंक्तियों और भावनाओं के सामने ला खडा करेंगी। शरद जी की कविताओं में जहाँ समाज प्रधान भाव है वही कविता जी की रचनाये उनके आस पास से ही उपजी हैं। कविद्वय का किसी विषय वस्तु पर अंवेषण करने का तरीका सराहनीय है तथा अपने प्रस्तुतिकरण में भी वे अपने कहन में परिपूर्णता दर्शाते हैं। उनकी रचनाओं में कई विषय छुवे गये हैं लेकिन बस्तर रचना माला का धागा बना हुआ है। विशेष तौर पर शरद गौड जी नें पूरी साहसिकता के साथ वर्तमान परिस्थितियों पर भी लिखा है और यहाँ जारी लाल-आतंकवाद की सही शब्दों में अपनी अनेक रचनाओं में भर्त्सना भी की है। इन्द्रावती नदी उनकी भावनाओं के बहुत करीब प्रतीत होती है तथा यह कभी बिम्ब बन कर तो कभी पूरी-पूरी रचना का विषयवस्तु बन कर इस संग्रह में प्रस्तुत हुई है। इन्द्रावती की वेदना ही नहीं अपितु इसके मार्ग बदलने की समस्या को भी शरद जी नें भावुक हो कर उठाया है। पानी न होने की समस्या को प्रस्तुत करती कई रचनायें मन को छू जाती हैं तथा यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होती कि समस्याओं का प्रगटीकरण करती कवितायें चित्र खींचती हुई हैं। कवि-दम्पत्ति की रचनायें उनकी आपसी समझ की भी परिचायक हैं चूंकि अनेक विषय तथा उनके प्रस्तुतिकरण की शैली तथा कई बार शब्द प्रयोग में भी दोनो के बीच प्रसंशनीय एकरूपिता देखने को मिलती है। कविता जी की रचनायें बहुत लम्बी लम्बी नहीं हैं जबकि शरद जी अपनी भावाभिव्यक्ति में शब्दों की कंजूसी नहीं करते।  

प्रस्तावना लिखते हुए मैं समीक्षक नहीं बनना चाहता चूंकि पाठक ही किसी प्रस्तुति के सच्चे मूल्यांकक होते हैं। मुझे कवि-दम्पत्ति की रचनाओं को पढ सुन कर आनंदानुभूति हुई तथा यह अहसास हुआ कि आने वाले समय में बस्तर अंचल के रचनात्मक समाज के ये दोनो ही महत्वपूर्ण हस्ताक्षर सिद्ध होंगे। शरद जी की प्रवृत्ति एक शोधकर्ता की है तथा वे सामग्री संचयन तथा बस्तर क्षेत्र के अतीत और वर्तमान को शब्दों के द्वारा प्रस्तुत करने की कोशिश के बडे प्रवर्तक हैं। उनकी यह कोशिश उनकी कविताओं में भी झांकती दिखी है।

बहुधा यह नहीं होता कि रचनाकार आंचलिकता के प्रति इतना समर्पित हो कि उसकी रचनायें क्षेत्र का आईना बनती दिखें। बस्तर अंचल पर बहुत कुछ लिखा जाना है और निरंतर लिखा जाना चाहिये। यह शिकायत बहुत हद तक दूर हुई है कि परेशानियों से जूझते बस्तर अंचल के रचनाकार यहाँ के बारूद, बंदूख, वाम-अतिवाद और शोषण को विषय नहीं बना रहे। शरद जी की रचनाओं को बस्तर के वर्तमान की अभिव्यक्ति का पहला कदम माना जा सकता है। कवि दम्पत्ति से अपेक्षा है कि वे निरंतर इसी तरह सृजनात्मक रहे और अपने अनुभव और विषयवस्तु की परिधि को निरंतर बढाते रहें। उनसे अभी कई पुस्तकों और काव्य संग्रहों की अपेक्षा है तथापि इन्द्रावती नदी की प्यास बुझाने की यह मूल्यवान कोशिश भी कुछ कम नहीं है। इस संग्रह में बस्तर अथवा इन्द्रावती विषय से इतर भी अनेक कवितायें हैं फिर भी प्यासी इन्द्रावती शीर्षक ही इस काव्यसंग्रह के लिये उपयुक्त है चूंकि कवितायें स्वयं भी तो भावना-भावुकता की प्रवाहित होने वाली नदियाँ ही हैं। इसमे संदेह नहीं कि शरद और कविता जी की प्रस्तुत रचनायें निश्चित ही मील का वह पहला पत्थर सिद्ध होगी जिससे प्रेरित हो कर बस्तर अंचल की रचनाधर्मिता आगे आ सकेगी। मेरी कवि-दम्पत्ति को हर्दिक शुभकामनाये हैं।


राजीव रंजन प्रसाद
     

Monday, October 1, 2012

महात्मा गांधी एक झलक

  महात्मा गांधी एक झलक

महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था। देशवासियों की सेवा करने के कारण वे महात्मा गांधी के नाम से संसार भर में प्रसिद्ध हुए। मोहन का जन्म अश्विन बदी 12 विक्रम संवत 1926 अर्थात 2 अक्टूबर 1869 ईश्वी को काठियावाड़ (सौराष्ट) के छोटे से शहर पोरबंदर में हुआ था। उनके पिता करमचंद गांधी वैष्य थे, वे वैष्ण धर्म को मानने वाले सत्यभाषी, निडर एवं न्याय प्रिय थे। उनकी माता का नाम पुतली बाई था। जब गांधी जी 7 वर्ष के थे तभी उनके पिता पोरबंदर से कोर्ट के सदस्य बन कर राजकोट चले गये थे। गांधी जी की स्कूली शिक्षा पोरबंदर के ‘लूल्या मास्टर’ के प्रायमरी स्कूल में हुई वह पाठशाला उनके घर के पास थी एवं मास्टर जी लँगड़े थे इसीलिए लोग उन्हें ‘लूल्या मास्टर’ कहते थे। मोहन के पिता राजकोट रियासत के दीवान बनकर गये तब बालक मोहन भी गया उस समय उसकी आयु 7 वर्ष की थी। वे काफी शर्मीले थे उन्होनें अपनी आत्म कथा में लिखा ‘‘ मैं बहुत शर्मीला लड़का था। पाठशाला में अपने काम से ही काम रखता था। घण्टी बजने के समय पहुँचता था और पाठशाली के बंद होते ही घर भाग जाता था।’’
बैरिस्ट्री पास करने के लिए गांधी जी 1887 में इंग्लेंड गए जहाँ वह 1891 तक रहे। 10 जून 1891 को उन्हें बेरिस्ट्री की पदवी प्राप्त हुई किंतु भारत आने के बाद वे मुकदमा लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाये प्रो.सत्यपूर्मी के अनुशार उनकी दशा‘‘ ससुराल गई हुई नई बहु’’ के समान थी।  गांधी जी अब्दुल्ला सेठ के दीवानी मुकदमें की पैरवी करने के लिए अप्रेल 1893 को दक्षिण अफ्रीका के शहर डरबन रवाना हुए। 1893 को नेटाल के बंदरगाह डरबन पर जहाज ने लंगर डाला। जहाज से उतरते ही उन्हें आभास हो गया की यहां योरोपिय एवं भारतीयों के बीच भेदभाव किया जाता है। दक्षिण अफ्रीका में भारत के मुसलमाल व्यापारियों की संख्या अधिक थी, हिन्दू, पारसी और इसाइयों की संख्या कम थी। यूरोपिय लोग भारतियों को ‘‘काला कुली’’ कहते थे।प्रिटारिया के एक वर्ष के निवास में गांधी जी को बहुत कुछ प्राप्त हुआ सार्वजनिक कार्यकरने की शक्ति का अहसाश एवं वकालत के गुंण उन्होनें वहीं सीखे। उन्होनें लिखा है ‘‘ वकील बनने की कुंजी यहीं मेरे हाथ लगी।’’ मैनें देखा कि वकील का गुण दोनों पक्षों के बीच खुदी हुई खाई को पाटना है। मुकदमें के खतम होने के पश्चात वे डरबन पहुंचे और हिन्दुस्तान लौटने की तैयारी शुरू की किंतु नेटाल में भारतीयों के मताधिकार के प्रश्न पर उन्होंने भारत लोटने का विचार त्याग दिया, तीन वर्ष पश्चात वे अपने परिवार को भी डरबन ले कर आ गये एवं उन्होनें 20 वर्ष दक्षिण अफ्रिका में बसे भारतियों के अधिकारों के लिए व्यतीत किये।  दक्षिण अफ्रिका में भारतीयों की सेवा करते हुए ही उन्होनं सीखा कि सत्य एक विशाल वृक्ष है ज्यों-ज्यों उसकी सेवा की जाति है त्यों-त्यों उसमें से अनेक फल पैदा होते  दिखाई पड़ते हैं। सत्य की इस खोज ने गांधी जी को राजनीति में आने को प्रेरित किया। 
अफ्रीका में बेस्टिर गांधी के सार्वजनिक कार्यो के कारण भारत ही नहीं वरन संपूर्ण विश्व उन्हें सम्मान से देखने लगा था एवं उनके विचार यूरोप वासियों को भी आंदोलित करने लगे थे। 9 जनवरी 1915 को गांधी जी भारत पहुंचे उनको देखने बंबई के बंदरगाह पर जनता ही भीड़ टूट पड़ी‘ महात्मा गांधी की जय घोष’’ से आसमान गुंज उठा। गांधी जी के गुरू गोपाल कृष्ण गोखले ने उनकी एवं उनकी पत्निी कस्तूरबा गांधी की अगवानी की। गवर्नन विलिंगटन ने उनसे कहा कि ‘‘ जब आप गवर्मेंट के खिलाफ  कोई काम शरू करो तो मझे उसकी पूर्व सूचना देना ना भूलना’’। गोखले जैसे शीर्ष नेताओं की मृत्यू के पश्चात गांधी जी गांधी जी कांग्रेस एवं देशवासियों के प्रेरणा श्रोत बन गये।‘‘ उनकी मृत्यू पर जवाहर लाल नहरू जी ने कहा था‘‘ हमारे जीवन से प्रकास तिरोहित हो गया है।’’ उन्होनें देश की स्वतंत्रता प्राप्ती के लिए संघर्ष तो किया किंतु स्वतंत्रता प्राप्ती के साधनों से समझोता नहीं किया। उनका मानना था कि गलत साधनों से प्राप्त स्वतंत्रता कभी स्थाई नहीं बन सकती।  स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उनने सत्याग्रह का मार्ग चुना। उन्होंने साबरमति में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की यहीं से उन्होंने एवं आश्रम वासियों ने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रहम्हचर्य, और अपरिग्रह को अपनाया। चंपारन का सत्याग्रह,खेड़ा सत्याग्रह, रोलट कमेटी का विरोध, असहयोग आंदोलन, बारडोली आंदोल, विदेशी वस्त्रों की होली , भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों का नेतृत्व करने के साथ ही वे ग्राम सुधार एवं अछुत उद्धार के कार्यों में भी लगे रहे। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की सरकार का गठन हुआ, किंतु गांधी जी तो जैसे इस महान ऐतिहासिक परिवर्तन से अप्रभावित ही थे। साम्प्रदायिक सद्भाव की स्थापना में उन्हें और महत्वपूर्ण कार्य मिल गया। 
30 जनवरी 1948 दिन शुक्रवार, समय संध्या रात की और बड़ रही थी। घड़ी ने पाँच बजा दिया था।बिरला हाउस के प्रांगण में जनता महात्मा गांधी के आगमन की प्रतिक्षा कर रही थी। गांधी जी दो लड़कियों आभा और मनु के कंधों पर हाथ रख जल्दी-जल्दी आ रहे थे वे कंधों पर शाल ओड़े हुए थे वे मंच की पाँच सीड़ियां ही चढ़े होंगे की भीड़ से निकले नाथूराम गोडसे ने पिस्तोल से तीन गोलियाँ दाग दी महात्मा के मुख से सिर्फ निकला हे राम। ब्रीचर ने लिखा है‘‘ गांधी की मृत्यु एक मनुष्य की मृत्यु से कहीं अधिक थी, एक युग समाप्त हो गया। -शरद चन्द्र गौड़ जगदलपुर
गांधी जी का छŸाीसगढ़ प्रवास...
 20 सितबंर 1920 का दिन छŸाीसगढ़ के लिए एक एतिहासिक दिन बन गया, इस दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का प्रथम छŸाीसगढ़ आगमन हुआ। गांधी जी पं.सुंदरलाल शर्मा से प्रभावित हुए उन्हीं के शब्दों में ‘‘ सुन्दरलाल जी तो हरिजनोद्धार के इस कार्य में मेरे भी गुरू हैं, समाज सुधार का उनका यह प्रयास प्रशंसनीय एवं अभिनंदनीय है’’।अपने प्रथम प्रवास में गांधी जी ने रायपुर, धमतरी और कुरूद की आमसभा में व्याख्यान दे कर स्वतंत्रता की ज्योति जलाई। अपने हरिजन उद्धार कार्यक्रम को ही आगे बढ़ाने के लिए गांधी जी द्वितीय एवं अंतिम बार 22 नवंबर 1933 को छŸाीसगढ़ अंचल के प्रवास पर आये। धमतरी में आयोजित उनकी आम सभा में 20 हजार लोगों की सहभागिता रही। उन्हें हरिजन कोष के लिए चांदी, जेवर एवं नगद रूपये भी भेंट किये गये। धमतरी में उन्हें 1001 रूपयों से भरी थाली दी गयी।गांधी जी ने पं. सुंदर लाल शर्मा जी के सहयोग से स्थातिप सतनामि आश्रम की भी प्रशंसा की। गांध्ी जी की यात्रा में वाहन चालक बने डाॅ. हजारी लाल जैन, वे संपूर्ण यात्रा में गांधी जी के साथ ही रहे। रायपुर प्रवास में पं.रविशंर शुक्ल के निवास शुक्ल भवन में उनके रहने की व्यवस्था रही। उनके साथ यात्रा में कु.मीराबेन, श्री ठक्कर बापा, श्री मनोहर देशाई एवं जमनालाल बजाज की पुत्री भी थी। धमतरी यात्रा पर उनकी कार में फेंकी गई एक पोटली की चर्चा रही इस पोटली में एक हल्दी की गांठ, थोड़ा पीला चांवल,, दो कोड़ी, एक अधन्ना तथा कुछ फूल थे। गांधी जी ने इसे एक गरीब की सच्ची भेंट माना। रायपुर में उनकी सभा लारी स्कूल में हुई जो कि अब सप्रे शाला के नाम से जाना जाता है। गांधी जी के कहने पर उनकी हजामत बनाने के लिए ब्राह्नाण पारा के माखन नाई को बुलाया गया अपने भाग्य पर धन्य माखन ने गांधी जी से कहा-‘‘ बने बलाये मालिक, जेखर दर्शन पर लाखों मनसे तरसथे, तेखर देह में आज छुए हवो’’ गांधी जी ने माखन से कहा मेनें 19 वर्षों से आईना देखना बंद कर दिया है। गांधी जी के फोटो खींचने आये फोटोग्राफर से उन्होंने डाॅ. हजारीलाल जैन के फोटो खींचने को कहा। गांधी जी आजादी के दीवानों का केन्द्र रहे जैतूसाव मठ भी गये। -श्रीमती कविता गौड़
------------------------------------------------

गांधीजी का जीवन दर्शन....
- शरद चन्द्र गौड़
गांधी जी सत्य एवं अहिंसा के पुजारी थे, किसी जीव की हत्या ना करना मात्र ही अहिंसा नहीं है, अपितु मन, वचन कर्म से किसी व्यक्ति को हानी नहीं पहुंचाना ही अहिंसा है। ईश्वर सत्य है सत्य ही ईश्वर है हर जीव में ईश्वर का अंश होता है एवं अहिंसा के बिना सत्य को नहीं पहचाना जा सकता। आपसी घृणा, द्वेष तथा असहयोग आदि गुणों का समावेश ईश्वर के प्रतिकुल है।
गांधी जी के अनुशार सत्य की प्राप्ती का एक मात्र साधन अहिंसा ही है, अहिंसा के बिना सत्स से साक्षातकार संभव नहीं है, ईश्वर सत्य है यदी सत्य का आचरण नहीं किया गया तो कितनी भी पूजा अर्चना क्यों ना कर लो ,मंदिर-मस्जिद, गिरजाधर, गुरूद्वारे क्यों ना जले जाओ ईश्वर से के दर्शन संभव नहीं हैं। मानव का यह धर्म है कि वह अत्याचार का विरोध करे। अहिंसा का अर्थ कायरता से नहीं लगाया जा सकता ,समर्थ व्यक्ति के द्वारा किया गया अहिंसक आचरण ही अहिंसा है। अपराधियों को दण्ड दिये जाने के प्रश्न पर अनका कहना था कि ‘‘ पाप से घृणा करो , पापी से नहीं’’। अर्थात जैल का स्वरूप भी एक सुधार गृह के समान ही होना चाहिए।
समाज के स्वरूप के विषय में उनके विचार हैं कि समाज महत्वपूर्ण है व्यक्ति ने अपनी आवश्यक्ताओं की पूर्ती के लिए समाज का गठन किया है किंतु व्यक्ति समाज से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि वही समाज का निर्माण करता है एवं अच्छे समाज की रचना के लिये व्यक्ति का भी सदाचारी होना चाहिए। यहां गांधी जी के विचार अधिकांश समाज शास्त्रियों से मेल नहीं खाते किंतु वे अपने आप का समाज शास्त्री नहीं बल्कि समाज सुधारक मानते रहे अतः उन्होंने समाज से जुड़ी तकनीकी शब्दावलियों की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया। मानव भौतिक आवश्यकताओं का दास बनता जा रहा है एवं आवश्यकताओं का कहीं अंत नहीं है व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन व्यतीत कर अपनी आवश्यकताओं को कम करना चाहिए। भौतिक आवश्यकताओं के प्रति मोह व्यक्ति को विवके शुन्य बनाता है। इसी तरह संयम जीवन का एक उच्च आदर्श है जो मानव को मानव बनाने के लिए अपेक्षित है।
महात्मा गांधी भगवत गीता में आस्था रखते थे एवं चिंतन हमेशा भगवत गीता के विचारों से प्रभावित रहा। वे एकेश्वरवाद में विश्वास रखते थे अर्थात ईश्वर एक ही है समस्त प्राणियों में उसका वास है अतः वे सभी प्राणियों के कल्याण के लिए प्रयास रत रहे। उन्होंने किसी विचार धारा के सृजन का प्रयास नहीं किया बल्कि अच्छे विचारों एवं आचरण को पहले स्वयं अपना फिर लोगों को अपनाने को कहा, स्वयं से अच्छा दृष्टांत दूसरा संभव नही। एक बार एक महिला उनके पास अपने छोटे बच्चे को लेकर आयी एवं उसने कहा गांधी जी ये बच्चा गुड़ बहुत खाता है इसलिए इसके दांत खराब हो गये हैं इसका गुड़ खाना छुड़वा दो, गांधी जी ने उस महिला से कहा बेटा एक सप्ताह बाद फिर से इस बच्चे को लेकर आना में इसका गुड़ खाना छुड़वा दूंगा। वह महिला एक सप्ताह बाद पुनः अपने बच्चे के साथ आयी गांधी जी ने फिर से वही जुमला दुहरा दिया बेटा इस बच्चे को लेकर अगले सप्ताह आना यही सिलसिला तीन सप्ताह चला , जब महिला पुनः अपने बच्चे को लेकर आयी तो गांधी जी ने बच्चे को प्रेम से अपने पास बुलाया और कहा बेटा ़ ज्यादा गुड खाने से दांत में कीड़े पड़ जाते हैं इसलिय अब से ज्यादा गुड़ खाना छोड़ दो फिर महिला से कहा कि अपने बच्चे को ले जाओ अब यह धीर-धीरे गुड़ खाना छोड़ देगा। महिला भड़क गयी उसने गांधी जी से कहा- गांधी जी इतना ही कहना था तो यह तो आप चार सप्ताह पहले भी कह सकते थे खामखा आपने मेरे चार सप्ताह खराब कर दिये। गांधी जी ने उŸार दिया बेटा चार सप्ताह पहले में भी बहुत गुड़ खाता था....में एसे किसी आचरण को व्यवहार में लाने को नहीं कह सकता जिसे मैं स्वयम् व्यहार में नहीं लाता।
गांधी जी ने ईश्वर के बारे में लिखा था‘‘ ईश्वर वह रहस्यपूर्ण शक्ति है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता और वह सर्वव्यापी है।मैं उसके अस्तित्व का अनुभव करता हूँ यद्यपि देखता नहीं हूँ।’’ उन्होनें कहा था यदी कोई व्यक्ति तर्क द्वारा मुझे ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने को कहे तो में हार जाऊँगा। किंतु मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि ईश्वर का अस्तित्व उतना ही सत्य है, जितना हम और आप। यदी कोई मेरी आँखें निकाल ले , नाक काट ले , मैं नहीं मर सकता हूँ, किंतु यदि कोई मुझसे ईश्वर के प्रति विश्वास को हटा ले तो में शीघ्र ही मर जाऊँगा।
गांधी जी के बारे में राधाकृष्णन् जी ने लिखा था‘‘ गांधीजी एक नितांत धार्मिक पुरूष हैं। उन्हें मानवता की एकता में अटूट विश्वास है। हम लोग चाहे जिस जाति, धर्म या देश के हों, हम सभी उसी परमपिता परमेष्वर की संतान हैं। प्रत्येक धार्मिक पुरूष सारी मानवता के साथ अपने स्नेह-संबंध में विश्वास रखता है।’’
गांधी जी ने ईश्वर को सत्य माना है एवं सत्य ही को ईश्वर माना , इसी लिए सत्य के प्रति उनका आग्रह सत्याग्रह बन गया एवं भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व को उनके इस विचार ने प्रभावित किया।
गांधी जी का विश्वास था कि मानव की सेवा ही ईश्वर सेवा है अतः मानव कल्याण के लिए उन्होंने संपूर्ण जीवन लगा दिया।गांधी जी के अनुशार सब धर्म समान इस अर्थ में हैं कि सबका लक्ष्य एक ही है अर्थत परम सत्य की प्राप्ति चाहे उस परम सत्य की व्याख्या हम किसी भी रूप में क्यो ना करें। अगर विभिन्न्ा धर्मों में अंतर है तो वह यह कि लक्ष्य सबका समान या दक होने पर भी उस लक्ष्य तक पनहुंचने का सभी का मार्ग अलग- अलग है और यह स्वाभाविक भी है।
रोमन रोलैंड के शब्दों में ‘‘ गांधी की क्रियाओं को समझने के लिए यह स्पष्टतः समझ लेना होगा कि गांधी वाद दो मजिला एक विराट् अट्टालिका की भाँति है। इसके नीचे धर्म की एक ठोस बुनियाद या नींव है। इस विराट तथा अटल नींव पर राजनीतिक तथा सामाजिक आंदोलन आधारित है।’’-शरद चन्द्र गौड जगदलपुर
़ (संदर्भ गृंथ साजिक विचार धारा काॅट से गांधी तक रवीन्द्र नाथ मुकर्जी, महात्मा गांधी का शिक्षा दर्शन प्रो. सत्यमूर्ति, नोबल प्ररस्कार विजेता रोमां रोलां की कृति महात्मा गांधी का जीवन दर्शन) 

गांधी जी की अफ्रीका प्रावास...
गांधी जी अब्दुल्ला सेठ के दीवाना मामले की पेरवी करने दक्षिण अफ्रिका गये। मुंबई से अफ्रीका की यात्रा पर पानी जहाज से निकले गांधी मई 1893 को नेटाल के बंदरगाह डरबन पहुँचे। जहाज से उतरने के साथ ही गांधी जी को अहशास हो गया कि यहाँ भारतीयों एवं यूरोपवासियों के मध्य भेदभाव किया जाता है। दक्षिण अफ्रिका में भारत के मुसलमान व्यापारियों की संख्या अधिक थी एवं वहां के लोग इन्हें ‘‘काला कुली’’ कहा करते थे। जब गोरों को दक्षिण अफ्रीका के खनिज संसाधनों का पता चला तब इन खनिज संसाधनों के दोहन के लिए उन्हें सस्ते मजदूरों का आवश्यकता पड़ी, दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासी जुलू स्वाभाव से ही सुस्त थे अतः उन्होंने भारत से महनत कश सस्ते मजदूरों का आयात शुरू किया ये मजदूर 1860 से दक्षिण अफ्रिका आना प्रारंभ हुए। उन्होंने यह शर्त भी रखी कि पाँच वर्ष पश्चात उन्हें वापस जाना पड़ेगा आगे उनके निवास की स्थिति में पुनःप्रतिज्ञाबद्ध होना पड़ेगा। भारतीय कुलियों को वे गिरमिटिया केे नाम से पुकारते थे। ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया ने सन् 1858 में घोषंणा की कि भारतीय कुलियों को वे सभी अधिकार प्राप्त होंगे जो अन्य नागरिकों को प्राप्त हैं। किंतु एंसा हो नहीं रहा था एवं भारतीय वहाँ भेदभाव का शिकार थे। गांधी जी ने भारतियों के प्रति होने वाले भेदभाव के विरूद्ध कड़ा संघर्ष किया। वे आये तो  एक वर्ष के लिए  शेख अब्दुल्ला के दीवानी मामले की पेरवी करने किंतु उन्होंने 21 वर्ष से अधिक दक्षिण अफ्रिका में बिताए उन्होंने 1914 को अंतिम रूप से दिक्षण अफ्रिका से बिदाई ली।
बेरिस्टर गांधी की पोने दो हजार फीस एवं जहाज के आने जाने का किराये की जानकारी होने पर अब्दुल्ला असमंजस में पड़ गये उनका केस ट्रांसवाल की राजधानी प्रिटोरिया में चल रहा था उनका अच्छा व्यवसाय था उनके जहाज भी चलते थे भारतीयों के बीच उनका अच्छा सम्मान भी था। कचहरी पहंचने पर मजिस्ट्रेट ने उन्हें पगड़ी उतारने को कहा एवं गांधी जी ने पगड़ी उतारने से इनकार कर दिया....मानो यह उनके अंग्रेजों के ख्लिाफ असहयोग आंदोलन की शुरूआत थी। उन्होनें पगड़ी के बदले टोप पहनने पर भी विचार किया, हकंतु अबदुल्ला ने कहा कि यह उनकी अंग्रेजों के समक्ष हार मानी जायेगी एवं भारतीयों के साथ भेद भाव और भी बड़ जायेगा। कोर्ट की इस घटना को पेपरों में जम कर उछाला गया एवं बेरिस्टर माहन दास करमचंद गांधी रातों रात दक्षिण अफ्रिका में प्रसिद्ध हो गये। गांधी जी को मामले को समझने के लिए प्रिटोरिया जाना थ अबदुल्ला ने गांधी जी के लिए प्रथम श्रेणी के टिकट की व्यवस्था की गांधी जी की गाड़ी जब रात के लगभग 9 बजे नेटाल की राजधानी मेरिप्सबर्ग पहुँची तो उस डिब्बे में एक अंग्रेज घुस आया एवं गांधी जी को वहां बैठा देख पहले तो चैंका फिर रेल के अधिकारी को साथ ले आया। रेल के अधिकारी ने अपमानजनक भाषा में गांधी जी को दूसरे डिब्बे में जाने को कहा, गांधी जी के विरोध करने पर उन्हें जबरदस्ती स्टेशन पर ही उतार दिया गया। पूरी रात गांधी जी ठंड में ठिटुरते रहे सुबह उन्होंने अबदुल्ला को खबर करी तब उनके आगे की यात्रा की व्यवस्था की गयी। चार्लस टाउन पहुंचकर उनको आगे की यात्रा घोड़ा गाड़ी में करनी थी । साथी अंग्रेज यात्री ने उनका गाड़ी के अंदर नहीं बैठने दिया बड़ी मुस्किल से वे कोचबाक्स पर बैठ कर सफर कर सके उस अंग्रेज ने आगे जलकर उन्हें वहाँ से भी उठाने का प्रयास किया किंतु गांधी जी ने संघर्ष किया इस प्रकार वे जाहंसबर्ग पहुँचे आगे की रेल यात्रा उन्होंने स्टेशन मास्टर से निवेदन कर प्रथम श्रेणी के डिब्बे में की जोकि जो कि एक अंग्रजे सहयात्री के सहयोग से शांतीपूर्ण रही। प्रिटोरिया के एक अच्छे होटल का मेनेजर भी उन्हें इसीलिए रूकाने पर सहमत हुआ कि वे अपने कमरे में ही भोजन मंगाकर खायेंगे  क्योंकि उनके अंग्रेज ग्राहक किसी काले के साथ खाना-खाना पसंद नहीं करते। गांधी जी ने वादी एवं प्रतिवादी में आपसी समझोता कराने में सफलता प्राप्त की इस प्रकार दोनों ही न्यायालय के खर्चों से बच गये। इस संदर्भ में गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा हैे कि  ‘‘ इस मामले से मैनें  मानव स्वभाव के अच्छे पक्ष को पहचाना जान लिया और मानव हृदय को जीतने की कला सीख ली।’’ गांधी जी ने करीब 20 वर्षों तक वकालत की एवं कई मामलों में वादी प्रतिवादी में समझोता कराकर संतुष्ट किया वे झूटे मुकदमों की कभी पेरवी ही नहीं करते थे।
सेठ अबदुल्ला के मुकदमें की पेरवी कर वे जब भारत लोटने की तैयारी कर रहे थे तभी उन्होनें ‘‘नेटाल मर्करी’’ नामक अखबार में पढ़ा भारतीयों को मताधिकार से वंचित करने वाला विधेयक विधान सभा में लाया जाने वाला है बस उन्होने भारत लोटने का निर्णय स्थिगित कर दिया। गांधी जी ने अबदुल्ला के नेतृत्व में विरोध कमेटी का गठन किया एवं सन् 1894 में भारतीयों की ओर से प्रार्थना पत्र भेजा गया, परिणाम स्वरूप विधान सभा की कार्यवाही दो दिनों तक स्थगित रखी गई किंतु दो दिनों के बाद ही प्रस्ताव पारित कर भारतीयों को मतदान से वंचित कर दिया गया।गांधी जी ने भारत के राष्ट्रवादी नेता दादा भाई नौराजी को दक्षिण अफ्रिका की घटनाओं से अवगत कराया एवं विनम्रता से परामर्श चाहा। गांधी जी की प्रेरणा से दक्षिण अफ्रिका में बसे भारतीयों ने पहली बार संगठित हो अंग्रजोें का विरोध किया। उन्होंने ‘‘नेटाल इंडियन कांग्रेस’’ की स्थापना की सेठ अबदुल्ला उसके अध्यक्ष चुने गये एवं गांधी जी मंत्री बने। लार्डरिपन को प्रार्थना पत्र भेजा गया उन्होनें भारतीयों को मतदान से वंचित करने वाले विधेयक को रद्द कर दिया। गांधी जी ने सामाजिक सुधार के क्षेत्र में भी कार्य प्रारंभ किये। भारतीय शिक्षक संध की स्थापना की 1896 में वे पुनः भारत की और रवाना हुए भारत पहुंचकर उन्होंने दक्षिण अफ्रिका में बसे भारतीयों की करूण गाथा को लोगों को बताया अफ्रीकी अंगेजों ने तो अब गांधी जी कोे दक्षिण अफ्रिका में ना रखने का फैसला कर लिया।  किंतु गांधी जी छः माह पश्चात ही अबदुल्ला के अनुरोध पर उनके नये जहाज से निःशुल्क दक्षिण अफ्रिका की और रवाना हुए। गांधी जी यूरोपिय पोशाक में रहते थे उनकी पत्निी एवं बच्चों को अपमान ना सहना पड़े इसलिए उन्होंने उन्हें भी यूरोपिय पोशाक ही पहनाई। गांधी जी एवं मजदूरों से भरे जहाज को बंदरगाह गोरों के विरोध का सामना करना पड़ा फ्लेग का बहाना कर जहाज को बंदरगाह पर 23 दिन रोका गया एवं किसी भी यात्री को बंदरगाह पर उतरने नहीं दिया गया। अंततः 23 दिन यात्री उतरे एडव्होकेट लाटेन की जिम्मेदारी पर गांधी जी को सुरक्षित जहाज से उतार कर उनके मित्र रूस्तम जी के मकान पर ले जाया गया। अंग्रेजों ने उनके साथ मारपीट की तब पुलिश सुपरीटेंडेट अलेक्जैंडर की पत्निी उनके सिर पर छाता तान कर खड़ी हो गयी। समाचार पत्रों में गोरे लोगों द्वारा गांधीजी से की गई असभ्यता की कड़ी आलोचना की गयी  इससे कुछ गोरे भी लज्जित हुए। गांधी जी सेवा कार्य में लग गये उन्होंने बोअर युद्ध में भी रोगियों की चिकित्सा की। गांधी जी पुनः भारत आये एवं उन्होनें कांग्रेस के अधिवेशन में एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में भाग लिया उन्हें दक्षिण अफ्रिका का समस्या पर बोलने के लिए मात्र पाँच मिनिट का समय दिया गया वे कलकŸाा में लोकमांय बालगंगाधर तिलक के साथ रूके। उन्होंने राजकोट में कुछ माह वकालत भी की एवं वे 1902 में तीसरी बार नेटाल दक्षिण अफ्रिका पहुँचे। गांधी जी ने जोहंसबर्ग में रहकर वकालत प्रारंभ की। उन्होनें जूलू युद्ध में भी युद्ध ग्रस्त क्षेत्र में सहायता की। 1904 में उन्होनें डर्बन से इंडियन ओपीनियन नामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। 11 सितम्बर 1906 को एक सभा में उन्होंने सत्याग्रह को पारिभाषित करते हुए कहा कि ‘‘ बुरे कानून के सामने ना झुकना ही सत्याग्रह है।’’ हेनरी पोलक द्वारा दी गयी रस्किन की किताब अनटू दिस लास्ट से वे अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्होनें डर्बन में सौ एकड़ की जमीन खरीद कर ‘‘फिनिक्स आश्रम’’ की स्थापना की। यह आश्रम उनके सहयोगियों का केंद्र बन गया। उन्होनें भारतीयों की सेवा हेतु खर्च जुटाने के लिए जोहंसबर्ग में वकालत शुरू की। उन्होनें अपना संपूर्ण जीवन जन सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होनें अपने भाई को लिखा कि ‘‘ मेरा अपना कुछ नहीं । मेरे पास जो कुछ भी है वह लोक सेवा में लगाया जा रहा है।मुझे किसी प्रकार के सांसारिक सुख भोग की चाह नहीं है। मैं समाज-सेवा में पूर्ण रूप से लग जाना जाहता हूँ। ट्रांस्वाल सरकार के अध्यादेश के अनुशार भरतीयों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया गांधी जी ने सत्याग्रह का मार्ग अपनाया इस गलत कानून के विरोध के कारण उन्हें एवं अन्य भारत वासियों को जेल में डाल दिया गया, लगातार भारतीयों के जेल भरो आंदोलन से परेशान हो अंग्रेज सरकार ने समझोते का रास्ता अपनाया , अध्यादेश को इस शर्त पर वापिस ले लिया गया कि भारतीय स्वेच्छा से अपना नाम रजिस्टर में दर्ज करवा देंगे। लेकिन जनरल अंगे्रज जनरल स्मट्स ने अपने वचन का पालन नहीं किया उन्होनें एशियाई रजिस्टर में नाम दर्ज करने वाले कानून को वापस नहीं लिया। गांधी जी ने सत्याग्रह किया उन्हें एवं उनके साथियों पर मुकदमें चलाये गये एवं उन्हें जेल भेज दिया गया। गांधी जी ने सुप्रमीम कोर्ट में अपील की एवं उनकी बात मान ली गयी। गांधी जी ने जेल यात्रियों एवं उनके परिवार को संगठित रखने के लिए टालस्टाय आश्रम की स्थापना की इस आश्राम के लिए उनके मित्र केलेन बेक ने एक हजार एकड़ की जमीन मुफ्त दी। यहाँ उन्होनंे प्राकृतिक चिकित्सा के प्रयोग किये वहीं आश्रम वासियों को आत्म निर्भर बनाया। गांधी जी ने लोगों को पदयात्रा के लिये कहा वहीं वे स्वयं भी प्रतिदिन साठ-पेंसठ किलोमीटर प्रतिदिन चलते थे। केपटाउन में अंग्रेजी कानून आया की सिर्फ इसाई पद्धिती से किये गये विवाह ही वैद्य हैं इस प्रकार गैर इसाईयों द्वारा किये गये विवाह अवेध घोषित हो गये , गांधी जी ने इसे सामाजिक अन्याय माना एवं इसका संगठित विरोध किया। अंततः गैर ईसाई विवाह को वैद्य ठहराना पड़ा । गांधी जी के नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका में किये गये सत्याग्रह शांतिपूर्ण रहे अंततः उन्होनें दक्षिण अफ्रिका से 18 जुलाई 1914 को अंतिम विदाई ली एवं इंगलैण्ड के माग्र से भारत प्रस्थान किया। -शरद चन्द्र गौड़

गांधी जी का संपूर्ण जीवन एक नजर......

जन्म- 2 अक्टूबर 1869 बोरबंदर काठियावाड़ सौराष्ट्र ( गुजरात)
पिता का नाम- करमचंद गांधी
माता का नाम- पुतली बाई
विवाह- 13 वर्ष में हुआ
पत्नी- कस्तूरबा
प्रारंभिक शिक्षा- पोरबंदर एवं राजकोट
लंदन प्रस्थान- 4 दिसंबर 1888 बम्बई(मुंबई) से कानून का पढ़ाई करने के लिए
उनकी पढ़ाई का खर्च उठाया- बड़े भाई लक्ष्मीदास ने 
बेरिस्टर की पदवी प्राप्त हुई- 10 जून 1891 को 
अफ्रीका रवाना- 1893 सेठ अबदुल्ला के मुकदमे के कसलसिले में
अफ्रीका रहे- 21 वर्ष
अफ्रीका से भारत रवाना- 18 जुलाई 1914
अफ्रीका में किये गये अंादोलन- एशिया मूल के लोगों के साथा भेदभाव का विरोध,  मतदान से वंचित वंचित करने का विराध, गैर ईसाई विवाह को अवेध ठहराये जाने का विरोध, रस्ट्रिेशन कानून का विराध।
अफ्रिका में स्थापित किये गये आश्रम- फिनिक्स एवं टाल्स्टाय आश्रम
अफ्रीका से भारत पहुँचे- 9 जनवरी 1915 बंबई के अपोलो बंदरगाह
अफ्रीका से लोटे गांधीजी पहने थे- धोती,  दुपट्टे, अँगरखे और काठियावाड़ी पोशाक में 
अफ्रीका से लोटे गांधीजी का स्वागत किया- गोपालकृष्ण गोखले ने
अफ्रीका से लोटे गांधीजी ने सबसे पहले मुलाकात की- गर्वनर विलिंग्टन से
साबरमति के सत्याग्रह आश्रम की स्थापना- 15 मई 1915
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एतिहासिक भाषण- 4 फरवरी 1916
चंपारन आंदोलन-
खेड़ासत्याग्रह- 1917-18
रोलट बिल का विरोध- 30 मार्च एवं 6 अप्रेल 1919 गांधी जी ने अपनी दोजप्त किताबें ‘‘ हिंद स्वराज’ एवं ‘‘सर्वोदय’’ बेच कर विरोध किया। सत्याग्रह प्रारंभ
जलियावाला बाग कांड- 1919 
रोलट एक्ट विरोधी सत्याग्रह बंद-   18 अप्रेल 1919 सत्याग्रह बंद
असहयोग आंदोलन- 1920 से
असहयोग आंदोलन स्थगित- चैरी-चैरा कांड से निराश हो
छह वर्ष की सजा के लिए रखा गया- यरवदा जैल में
साईमन कमीशन का विरोध- 3 फरवरी 1928
बारडोली सत्याग्रह-
दांडी यात्रा- 12 मार्च 1930 नमक कानून तोड़ने के लिए 5 अप्रेल 1930 को दांडी पहंुचे
जेल भेजे गये- 4 फरवरी 1932 यरवदा जेल
भारत छोड़ो आंदोलन- 
कस्तूरबा की मृत्यू- 22 फरवरी 1944
गांधी जी का महाप्रयाण- 30 जनवरी 1948
गांधी जी का प्रथम छŸाीसगढ़ प्रवास- 20 सितंबर 1920
गांधी जी का अंतिम छŸाीसगढ़ प्रवास- 22 नवंबर 1933


क्या गांधीजी समाजशास्त्री थे ?

भारतीय परंपरा के अनुकुल , भारतीय समाज पर अपने विचार प्रकट करने वाले विचारकों में गांधी जी का स्थान प्रमुखता से लिया जाता है। भारतीय परंपरा एवं संस्कृति के अनुकुल भारतीय समाज की समस्याओं का समाधान उनकी विचारधारा में मिलता है। उन्होंने ना सिर्फ भारतीय समाज पर अपने विचार रखे वरन सामाजिक समस्याओं का निराकरण भी किया वे समाजशास्त्री से ज्यादा समाज सुधारक की भूमिका में नजर आये। भारत हो या दक्षिण अफ्रिका उन्होनें देखा की भारतीयों की समस्याएं समान ही हैं। भारतीय समाज की सायद ही कोई एसी समस्या हो जिस पर गांधी जी ने अपने विचार व्यक्त ना किये हों। देश के राष्ट्रीय जीवन के निर्माण में उनकी भूमिका सर्वोपरी रही, अहिंसा के आदर्शों पर चलते हुए उन्होंने देश में एक राष्ट्रीय चेतना का संचार किया इसीलिय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के रूप में याद करता है।  उन्होंने समाज के निम्नतम् सतर पर पहुंचकर वहाँ की समस्याओं को पहचानकर लोगों की भावनाओं को समझकर अपने विचार प्रकट किये। उनके ये विचार विसुद्ध भरतीय विचार थे  और भारतीय जनजीवन से सम्बन्धित थे। फिर भी क्या महात्मा गांधी को समाजशास्त्री कहा जा सकता है।
गांधीजी के जीवन का अध्यन करने पर यह पता चलता है कि उनका सार्वजनिक जीवन एक राजनीतिज्ञ के रूप में प्रारंभ हुआ। उन्होनें राजनीति में भी नैतिक तत्वों का सम्मिलित किया। इस दृष्टिकांण से गांधी जी सिर्फ राजनीतिज्ञ ना होकर एक आदर्शवादी भी थे। उनका विश्वास था कि व्यापक रचनात्मक कार्यों के बिना स्वराज्य प्राप्ती फीकी और अर्थहीन रहेगी। उन्होनें कहा था ‘‘ ठोस रचनात्मक कार्यों के बिना हमारी आजादी की लड़ाई कमजोर व ठीली पड़ जायेगी। अर्थात गांधी जी आदर्शवादी ही नहीं यथार्थवादी भी थे। वे धनी एवं गरीब के बीच की खाई को पाटना चाहते। ग्राम स्वावलंबन उनकी यथार्थवादी सोच का ही परिणाम था। उन्होंने भारत की असीमित जन शक्ति को पहचाना बल्कि उसके सार्थक उपयोग का रास्ता भी बतलाया, यदी हमने उनके विचारों को सही मायने में हकीकत में बदला होता तों हमारा ग्राम स्वालंबी एवं बैरोजगारी की समस्या से मुक्त होता वे उन्नत तकनीक के विरोधी नहीं थे किंतु उन्होंने असीमित जनशक्ति के सार्थक उपयोग की वकालत की। एक बेरिस्टर के रूप में भी उनकी सोच यथार्थवादी के साथ आदर्शवादी भी बनी रही वे किसी गलत व्यक्ति की वकालत नहीं करते थे , उनका उद्देश्य न्याय दिलाना था किंतु दोशी को बचाना वे गलत मानते थे।
गंाधी जी ने अपने विचारों को अपने जीवन अनुभव एवं बोद्धिक चिंतन के आधार पर प्रस्तुत किया उन्होनें समाजशास्त्र के मान्य सिद्धांतो को इसका आधार नहीं बनाया, उनके सामाजिक विचार हमें उनके व्याख्यानों , लेखों, तथा आत्मकथा के माध्यम से प्राप्त होते हैं। वास्तविकता तो यह है  िकवे समाजशास्त्री बनना भी नहीं चाहते थे न ही इस दिशा में उन्होनें कोई प्रयास ही किया वे तो समाजसुधार के लिए सक्रिय रहे एवं राष्ट्र के मार्गदर्शक बने। किंतु सामाजिक विचारकों की शायद ही कोई किताब हो जिसमें गांधी जी के सामाजिक विचारों को शामिल नहीं किया गया हो। वे समाजशास्त्रियों की भांती सिद्धांतवादी भी नहीं थे वे अपने विचारों में व्यवहारिकता को बनाये रखते थे, परिस्थितियों के अनुसार वे अपने विचारों को बदलते भी थे। उन्होंनें स्वयं कहा कि ‘‘ लोग कहते हैं कि मेरे विचार बदल गये है, पर सच्ची बात तो यह है कि परिस्थितियां बदल गई है।’’ गांधी जी ने  यह भी कहा था कि ‘‘ मैं कदापी यह दावा नहीं करता हूँ कि मैनें किन्हीं नए सिद्धांतों कों जन्म दिया, मेने तो अपने निजी तरीके से शाश्वत सत्यों को दैनिक जीवन और उनकी समस्याओं पर लागू करने का प्रयत्न मात्र किया है।’’
उररोक्त विवेचना के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँच हैं कि गांधी जी एक राजनीतिक, दार्शनिक, समाज-सुधारक और विश्व शिक्षक थे, उन्हें समाजशास्त्री ना कहना ही उचित प्रतीत होता है क्योंकि उनके विचारों में राष्ट्र की प्रगति बार-बार मूर्त हो उठती थी और उन विचारों के आधार पर कोई अंतिम निष्कर्ष या परिणाम निकालना संभव न था। श्री लुई फिसर ने सच ही कहा है कि ‘6 गांधीजी इतने स्वच्छन्द, निर्बाध तथा ऐसे थे कि उनके विषय में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती थी, इसलिए आप आवेगमय तथा कठिन  थे और बिना नक्शे के कहीं भी जा सकते थे।  फिर भी गांधीजी ने समस्त विचार, चिंतन, ध्यान, और कर्म के मूल केन्द्र या मूलधारा को अवष्य ही स्पष्टतः खोजा जा सकता है और है सत्य, अहिंसा, और जनकल्याण। डाॅ. महादेव प्रसाद शर्मा के शब्दों में ‘‘ गांधीवाद वी सिद्धांत है जो सब प्राणियों को भगवद् रूप् और इस कारण समान जानकर सत्य और अहिंसापूर्ण साधनों द्वारा सभी के कल्याण अथवा सर्वोदय का प्रयत्न करता है जिसके मतानुसार सभी व्यक्ति ओर सार्वजनिक समस्याएँ सत्य और अहिंसा के द्वारा सुलझाई जा सकती है।
गांधीजी के सम्बन्ध में एक दूसरी बात यह है कि उन्होंने अपने किसी भी विचार को केवल सैद्धान्तिक स्तर तक लाकर कभी नहीं छोड़ा, सदेव ही उसे व्यावहारिक रूप् में प्रयोग किया अर्थत उसे स्वयं अपनाया। उनके समस्त जीवन की कहानी व्यावहारिक स्तर पर सत्य की खोज की कहानी है। इसीलिए उन्होंने अपनी ‘‘आत्मकथा’’ को सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी का नाम दिया है।   -शरद चन्द्र गौड़ 

गांधीगिरी
संप्रेषण के तीन सााधन होते हैं दृष्य,श्रव्य, एवं दृष्य-श्रव्य इनमें से तीसरा साधना जादा प्रभावकारी सिद्ध होता है अतः चलचित्रों में उल्लेखित विषय वस्तुओं की उपेक्षा नहीें की जा सकती निष्चित रूप से समाज को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक है। गांधीगिरी शब्द मुन्न्ााभाई श्रंखला में बनी फिल्मों की याद दिलाता है। ‘‘मुन्न्ााभाई एम.बी.बी.एस.’’ एवं ‘‘लगे रहो मुन्न्ाा भाई’’ में गांधी जी के विचारों को की प्रासांगिता को एक अलग ही तरह से उकेरा है उसकी आवश्यकता एवं महत्व को समझने का प्रयास किया जाना चाहिए। बदली हुई परिस्थितियों में गांधी जी के विचारों की प्रासांगिता और भी ज्यादा बड़ गई है आज जब संपूर्ण इलेक्ट्रानिक मीडिया हिंसा एवं सेक्स को उपभोक्तावस्तुओं को बेचने का आधार बना रहा है तब ऐंसी परिस्थिति में गांधी जी के शांति, सहयोग एवं सादा जीवन के विचार समाज को ना सिर्फ संगठित रखेंगे बल्कि आने वाली पीड़ी को एक नया रास्ता दिखायेंगे। आखिर गांधीगिरी क्या है क्या यह ‘‘दादागिरी’’ से मिलता जिलता शब्द तो नहीं, लेकिन दोनों में वैचारिक समानता दिखाई नहीं पड़ती किंतु ‘‘गिरी’’ शब्द दोनों में समान रूप से उपयोग में लाया जा रहा है। उल्लेखित फिल्म में तो गांधीगिरी को एक हथियार की तरह उपयोग में लाया गया था ‘‘बिना धार का हथियार’’ एक ऐंसा हथियार जो मारे बिना ही घायल कर सकता है यदि कहानी को हकीकत के थोड़े ही करीब मान लिया जाये तो निश्चित रूप से यह एक कारगर हथियार था जिसे सफलता से उपयोग में लाया गया एवं अपेक्षित परिणाम भी प्राप्त हुए। गांधीगिरी हिंसा पर अहिंसा की जीत का साधन है यह एक अहिंसक सत्याग्रह का हथियार है जिसके प्रयोग से दक्षिण अफ्रिका में गांधी जी ने गोरों (अंग्रेजों) को झुका दिया था वहीं भारत में अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा भले ही जाते-जाते वे देश को दो भागों में विभाजित करने में सफल हो गए। अब ना तो गुलामी है नाही सांप्रदायिकता का नासूर बन चुका घाव किंतु हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार ने देश को गुलामी से भी जादा बद्तर स्थति में पहुँचा दिया है आज अगर गांधी होते तो उन्हें एक नहीं कई फिनिक्स, टाल्स्टाय एवं साबरमति आश्रम खोले होते , आज एक नहीं सेंकड़ों गांधी की आवश्यकता इस देश को है। माओवादी नक्सली आंदोलन के चलते देश के अधितर वनांचल मुख्यभूमी से कटकर रह गए हैं , बेकसूर वनवासी मारे जा रहे हैं किसी पत्रिका में पढ़ा था कि नक्सली वारदातों में मरने वालों की संख्या बार्डर पर शहीद होने वालों से अधिक है। शिक्षा के स्तर में अधिकाधिक भिन्न्ाता दिखाई पड़ती है आज डोनेशन के बल पर एक औसत विद्यार्थी भी अच्छे से अच्छे विद्याालय में दाखिाला ले डाॅक्टर-ईंजीनियर बन सकता है वहीं मुफ्त में सरकारी शिक्षा पाने वाला विद्याार्थी आज भी ‘‘लार्ड मैकाले’’ की  क्लर्क बनाओ शिक्षा पा रहा है। विकास की धारा भी सुपर्ण देश में एक सी नहीं बही है जहां पंजाब एवं हरियांणा उन्नत कृषी कर रहे हैं वहीं छŸाीसगढ़, झारखण्ड मध्यप्रदेश में आज भी कृषि की दशा शोचनीय है। ग्राम स्वराज के नाम जल रहे प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण ने भ्रष्टाचार का ही विकेंद्रीकरण किया है। ऐंसा शायद ही कोई विभाग हो जहां भ्रष्टाचार ना हो। कहते हैं आज वही व्यक्ति ईमानदार है जिसे भ्रष्टाचार करने का मौका नहीं मिला अर्थात सभी विभागों को गांधीगिरी की दरकार है। ऐंसा नहीं की आम व्यक्ति में असंतोंष नहीं हर व्यक्ति पीड़ित है, आक्रोशित है वह आंदोलन के लिए तैयार है किंतु उचित नेतृत्व के अभाव ने उसे अपने घर तक सीमित कर के रख दिया है। आज का आम आदमी गांधी के इंतजार में बैठा है। जगदलपुर के जिला कलेक्टोरेट को तत्कालीन कलेक्टर श्री गणेश शंकर मिश्रा जी ने गांधी मय स्वयरूप प्रदान कर दिया वहां आफिस में काम शुरू करने के पहले कर्मचारी गांधीजी के प्रिय भजन वैषणव जन....... को सुनते हैं एवं गांधी जी के आदर्शों पर चलने का प्रण लेते हैं, संपूर्ण कलेक्टोरेट परिसर में गांधी जी के प्रियवचनों एवं गीतों को सुरूचिपूर्ण तरीके से लगाया गया है ऐंसा ही संभाग के अन्य कार्यालयों में भी किया गया है किंतु क्या वास्तव में गांधीवादी आचरण का अनुकरण इन कार्यालयों में किया जा रहा है, क्या ये सभी कार्यालय भ्रस्टाचार से मुक्त हो चुके हैं ? हम चले थे अकेले पीछे मुड़कर देखा तो कारंवा बन गया , प्रयास कैसा भी हो चुपचाप घर बैठने से तो अच्छा ही होता है कहते है चार बार झूंठी हंसी हंसो तो एक बार सच्ची मुसकुराहट आप के लबों पर जरूर का जायेगी बस्तर में मिश्रा जी द्वारा किया गया गांधीवादी अभियान लंबा जायेगा औरों को भी स्वेच्छा से जोड़ेगा ऐंसी आशा की जानी चाहिए।
वास्तव में बहुत से विभाग तो ऐंसे हैं कि जहाँ सीधे-सीधे गांधीगिरी की दरकार है, मैं किन्ही विभाग विशेष के नाम के उल्लेख से परहेज करना चाहता हूँ लेकिन लोग तो जानते हैं रोड पर गाड़ियों को रोक कर चालान के नाम पर क्या किया जाता है, बिल आहरण के नाम पर वसूली का शिकार कौन सा ऐंसा कर्मचारी है जो नहीं हुआ, पुलिस हमारी सुरक्षा के लिए है लेकिन हम अपने बच्चों को पुलिस का नाम लेकर डराते हैं, घर का नक्सा पास कराने चले जाईये, बच्चे के एडमीशन के लिये जाईये आप को नोचने खसोंटने वाले हर जगह मिल जायेंगे। ट्रांसफर में मौसम में तो अधिकारियों के बल्ले-बल्ले ही हो जाते हैं एवं पिसता है सीधा-साधा आदमी जिसने कभी भ्रष्टाचार नहीं किया।
मुझे तो ऐंसा लगता है गांधीजी के विचारों को हकीकत का अमलीजामा पहनाना ही गांधीगिरी है एवं आज के समय में यह हमारी समस्याओं का यही एक मात्र हल भी है।