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Friday, August 5, 2011

Bastar ka sahitya: रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श -www.sahityashi...

Bastar ka sahitya: रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श -www.sahityashi...: "रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श - शरदचन्द्र गौड ‘‘छत्तीस जनों वाला घर’’ 6 अगस्त 1968 को धमतरी छत्तीसगढ़ के एक छोटे से ग्राम ‘लिमतरा’ में..."

Bastar ka sahitya: रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श -www.sahityashi...

Bastar ka sahitya: रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श -www.sahityashi...: "रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श - शरदचन्द्र गौड ‘‘छत्तीस जनों वाला घर’’ 6 अगस्त 1968 को धमतरी छत्तीसगढ़ के एक छोटे से ग्राम ‘लिमतरा’ में..."

Bastar ka sahitya: रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श -www.sahityashi...

Bastar ka sahitya: रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श -www.sahityashi...: "रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श - शरदचन्द्र गौड ‘‘छत्तीस जनों वाला घर’’ 6 अगस्त 1968 को धमतरी छत्तीसगढ़ के एक छोटे से ग्राम ‘लिमतरा’ में..."

रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श -www.sahityashilpi.com


रजत कृष्ण के काव्यसंग्रह पर विमर्श - शरदचन्द्र गौड


‘‘छत्तीस जनों वाला घर’’

6 अगस्त 1968 को धमतरी छत्तीसगढ़ के एक छोटे से ग्राम ‘लिमतरा’ में एक किसान परिवार में जन्में रजत कृष्ण ने हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया साथ ही ‘‘विष्णु चन्द्र शर्मा और उनका रचना संसार’’ विषय में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। इन्होंने‘सर्वनाम त्रैमासिक पत्रिका’ का संपादन दायित्व अप्रेल 2006 से संभाला। शासकीय महाविद्यालय बागबाहरा में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत श्री रजत कृष्ण विगत 20 वर्षों से लेखन कार्य से जुड़े हुए हैं। उनके लेख, कविताएं एवं टिप्पणियां समय-समय पर विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती है। 

‘‘छत्तीस जनों वाला घर’’ संकल्प प्रकाशन बागबाहरा जिला महासमुंद छ.ग. से प्रकाशित उनका प्रथम कविता संग्रह है।

रजत कृष्ण आधुनिक समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर है। जैसे सरल वे हैं वैसी ही सरल उनकी कविताएं भी हैं। आस-पड़ोस, खेत-खलिहान, मित्र, रिश्तेदार, सामाजिक सरोकार उनकी कविताओं की विषय वस्तु है। प्रकृति के नैसर्गिक सौन्दर्य को भी आपने छुआ है, किंतु आपका मन खेत-खलिहान, परिवार एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में ज्यादा रमा है। प्रस्तुत कविता संग्रह समकालीन कविता की मुख्य धारानुरूप अतुकांत है, किंतु एक लय उनकी कविताओं में स्पष्ट दिखाई देती है। आज के आधुनिक युग में जहाँ भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में रिश्ते-नाते अपनी जिन्दगी की अन्तिम सांसे गिन रहे हैं वहीं रजत जी ने अपने कविता संग्रह को ‘‘छत्तीस जनों वाला घर’’ नाम दिया। 

शीर्षक को सार्थक करती कविता संग्रह की इस कविता में ‘नब्बे वर्षीय दादी एवं डेढ़ वषीर्य बिटिया एक साथ एक ही घर में रहते है। इस परिवार के आस-पड़ोस के साथ भी जीवांत रिश्ते हैं-

छत्तीस जनों
वाला हमारा घर
नब्बे वर्षीय दादी की
साँसो से लेकर
डेढ़ वर्षीय बिटिया
‘खुशी’ की
आँखों में बसता है

किसानों एवं पुरखों के खून-पसीने से सराबोर खेतों के माटी की भीनी गंध उनकी कविताओं में आती है, वहीं स्थानीय शब्दों का चयन वे बड़ी सहजता से करते है। ‘‘खेत’’ कविता में वे लिखते है-

हम कहते है खेत
और महक उठती है
गंध उस मिट्टी की
जो सिरजी
पुरखों के खून के पसीने से

वे प्रकृति चित्रण में भी पीछे नहीं रहे ‘धान-किसान से’’ कविता में वे लिखते है-

मुझे अब
सूर्य नारायाण से धूप
वरूण देव से जल
और पवन देव से
हवा चाहिए....

‘अगहन की सुबह’ में भी उनका प्रकृति चित्रण अनूठा है-

आज सूरज
जैसे सातों घोड़ों पर
सवार होकर निकला है
हवा ने जैसे
हरेक पाँख खोली है......

छत्तीसगढ़ के गाँव में धान मिंजाई के दिन घर-परिवार के सारे सदस्य एक साथ एक जुट हो काम करते है, इसका सजीव चित्रण रजत जी ने ‘धान मिंजाई के दिन ’ कविता में किया है-

धान का बीड़ा बोहे
मेरी माँ
खेत से आ रही है...........
खलिहान में बाबूजी
धान मिंज रहे है
बीड़ा रचते भईया
बिड़हारिनों की राह देख रहे हैं

आज जहां घर के बुजुर्गों को वृद्धावस्था आश्रम में रहने पर मजबूर किया जा रहा है, वहीं ग्रामीण परिवेशी रजत के घर में पहला दिया वहीं जलाया जाता है जहाँ ‘बाबा’ रहते है, ‘दीवाली का दिया’ कविता में वे लिखते है -

जिस कमरे में
अंतिम साँसे गिन रहे बाबा
घर में वह सबसे अँधेरा है
शुरू करो वहीं से
दीवाली का दिया बारना

शहरी जीवन भले ही बदल गया हो किन्तु गांव में तो आज भी सामाजिक रिश्तों की डोर मजबूत है, तभी तो वे लिखते है-

खिड़की के रास्ते से ही
जाते है पड़ोसी के घर
हमारे यहाँ से
दूध-दही
अचार-पापड़

मेहनत कश मजदूरों, किसानों को तो ‘सूरज’ की गर्मी भी दुलारती है तभी तो दादी सुबह-सुबह ऊपर बसते दादा को जल भेजती है। सूरज का रथ कविता कुछ इन्ही भावों को व्यक्त करती प्रतीत होती है। दंगे एवं भूकंप से बेघर बार लोग किस प्रकार खुली चांदनी में रहने को मजबूर होते है इसको प्रस्तुत किया है रजत जी ने अपनी कविता ‘तारों से बातें करते हुए’ में।

कहते है श्रंगार रस से श्रेष्ठ रस कोई नहीं , कविता में काव्य सौन्दर्य इसी से आता है, रजत जी ने अपनी कविता ‘सुन्दरता’ में नारी सौन्दर्य का निश्छल वर्णन किया है-

तुम बहुत सुन्दर हो
बहुत सुन्दर
पर
तुम्हारी तुलना
चांद से नहीं करूंगा........
नहीं कहूंगा
तुम्हारी आंखे
कमल सी है
केश काली घटा सी.....

कवि की विरह वेदना ‘मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ’ कविता में मूर्त हो उठती है-

जेठ-बैसाख के
मुहाने पर बैठ
में तुम्हें याद कर रहा हूँ
कि चली आयी है वह राहें
जिन पर तुम चौकड़ी भरा करती थी.........

‘अनुपस्थिति में फैली उपस्थिति’ एवं ‘स्वप्न के उजड़ने के बाद’ भी इसी श्रेणी की कविताएं है। ‘मैं धूप का एक टुकड़ा नहीं हूँ’ एक आत्मकेन्द्रित कविता है जिसमें कवि का आत्मविश्वास साफ झलकता है-

मैं धूप का
एक टुकड़ा नहीं हूँ
जो आँगन में ही
फुदक कर
लौट जाऊँगा....................

‘मैं लौट आया’ कविता कवि के आत्मकथ्य एवं संघर्ष की व्याख्या करती है.........वे देखते है कि सिर्फ उनका ही नहीं बल्कि इस दुनिया के अधिसंख्य लोगों का जीवन संघर्षमय है.....व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटना जाहिए। इस संग्रह में दो मजदूर, एक आदमी का जीना, हद, दण्ड ,युद्ध की बात करने से पहले एवं मिट्टी के काठ एवं लोहा उल्लेखनीय कविताएं हैं। संग्रह की अंतिम कविता ‘बत्तीस डिसमिल जमीन’ किसान एवं उसकी जमीन के अटूट रिश्ते को प्रकट करती है। इस कविता को संग्रह की आत्मा कहा जा सकता है।

Friday, July 22, 2011

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita- Bachapan

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita- Bachapan: "लड़ते-झगड़ते और शिकायत करते ये छोटे-छोटे बच्चे फिर मिल जाते क्षण भर में खेलते-कूदत किलकारियाँ भरते ये छोटे-छोटे बच्चे इनको खेलता द..."

Bastar ka sahitya: बस्तर एक खोज

Bastar ka sahitya: बस्तर एक खोज: "बस्तर एक नजर... दण्डकारण्य के पठार पर स्थित बस्तर अपने नैसर्गिक सौंदर्य एवं जनजातीय विविधता के लिये जाना जाता है। एक ओर जहाँ सभ्यता के प्र..."

Bastar ka sahitya: बस्तर दशहरा

Bastar ka sahitya: बस्तर दशहरा: "बस्तर दशहरा बस्तर अंचल के दशहरे का संबंध रावण वध से नहीं है। इसकी जन स्वीकृति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह 75 दिनों तक चलता है।..."

Bastar ka sahitya: बस्तर दशहरा

Bastar ka sahitya: बस्तर दशहरा: "दशहरा पर्व राजीव रंजन प्रसाद के साथ [संस्मरणात्मक आलेख] -- शरद चन्द्र गौड़ बस्तर दशहरे को बचपन से देखता आ रहा हूँ, मुझे याद है जब हम बस्तर ..."

Bastar ka sahitya: Gandhi jee ka Dharam Darsan

Bastar ka sahitya: Gandhi jee ka Dharam Darsan: "महात्मा गांधी धर्मदर्शन गांधीजी ने धर्म की व्यापक व्याख्या की है, उनका धर्म किसी सीमा में ना बंध कर विष्व बंधुत्व का संदेष लेकर आता है। उनका..."

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita-Mera Jeevan

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita-Mera Jeevan: "क्षंण भंगुर है जीवन मेरा दीप जलाऊँगा। फैल रहा अंधियारा काला पल दो पल के लिए सही में उजियारा लाऊँगा। पीड़ा मेरी अमिट छाप है जीवन मेरी दृश्ट..."

Bastar ka sahitya: Hindi Bal-Kavita- Gadha Computer

Bastar ka sahitya: Hindi Bal-Kavita- Gadha Computer: "मैं हमेशा दौड़ में पिछड़ जाता हैंग हो जाता, स्लो हो जाता हर प्रकार के वायरस मुझे सताते मुझे चलाने वाले हाथ से काम कर मुझ से आगे निकल ज..."

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita- बसंत ऋतु के बासंती पौधे

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita- बसंत ऋतु के बासंती पौधे: "ऋतु बदली आया बसंत बसंती चादर से सुशोभित वसुंधरा सूखे पत्ते उड़ते इधर-उधर दरख़्तों पर सुशोभित बासंती कोमल पत्तियाँ आम बौरा गए हो ..."

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- मैं पानी हूँ

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- मैं पानी हूँ: "मैं पानी हूँ आपकी आँखों का पानी प्यासे की प्यास बुझाने वाला पानी रंगहीन, गंधहीन पानी झील नदी नालों पोखरों तालाब और कुँए का पानी वर्ष..."

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita- मृग-मरीचिका

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita- मृग-मरीचिका: "मैं मृग-मरीचिका प्यासे को पानी का आभास दिलाती मैं पानी का मोल बताती मैं पानी को अनमोल बनाती मैं मृग-मरीचिका रेगिस्तान में उठती गरम ह..."

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita- नोनी की नेनो

Bastar ka sahitya: Hindi Kavita- नोनी की नेनो: "काम वाली बाई ने अपनी बच्ची को नोनी कहकर बुलाया नोनी सरपट भाग कर आई मुझे लगा कहीं यह टाटा की नेनों तो नहीं ‘‘बस्तर’’ में छोटी बच्ची क..."

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- कुम्हार का घड़ा

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- कुम्हार का घड़ा: "आज मैने घड़़ा बनाया घूमते हुए चाक पर गीली मिट्टी को चढ़ा अपनी हथेलियों और अँगुलियों से सहेजकर चाक पर चढ़ी मेरे हाथों से घूमती मिट्टी..."

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- कचरे का डब्बा

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- कचरे का डब्बा: "मेरे घर की पहचान कचरे का डब्बा मेरे घर का पता कचरे के डब्बे वाली गली मुझे नमस्ते करता कचरे का डब्बा दादी से रोज़ मिलता बतियाता और आँ..."

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- जल अब तो आजा

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- जल अब तो आजा: "कुंभी के अब नहीं होते दर्शन तालाब उदास खग-विहीन शंख, कमल, तरंग अब दिखते नाही टोंटी भी है जल-विहीन शहर उठा है आस लगाए गुण्डी, धड़ा,..."

Hidi Kavita- कचरे का डब्बा


मेरे घर की पहचान
कचरे का डब्बा
मेरे घर का पता
कचरे के डब्बे वाली गली
मुझे नमस्ते करता
कचरे का डब्बा
दादी से रोज़ मिलता
बतियाता और आँखे दिखाता
कचरे का डब्बा

सोचता हूँ
कचरे का डब्बा ना होता तो
मामाजी को घर नहीं मिलता
जानवरों को ढोर नहीं मिलता
कचरे के डब्बे ने
लगाम लगा दी
तेज़ रफ़्तार से आने वाले
वाहनों पर
सामने आ खड़ा हुआ
सीना तान
कचरे का डब्बा

कचरे के डब्बे के
इतने फ़ायदे हैं
कि अब तो
उसकी बदबू भी भीनी खुशबू
लगती है
 बेख़ौफ़
मोहल्ले के लड़के
सड़क पर खेलते हैं
क्योंकि
बेतरतीब फैले कचरे ने
रास्ता रोक
सड़क को मैदान बना दिया है

सफ़ाई को मुँह चिढ़ाता
कचरे का डब्बा
शहर के सौन्दर्यकरण
से ख़फ़ा
कचरे का डब्बा
मेरे घर की पहचान
कचरे का डब्बा

Hidi Kavita- जल अब तो आजा


कुंभी के अब नहीं
होते दर्शन
तालाब उदास खग-विहीन

शंख, कमल, तरंग
अब दिखते नाही
टोंटी भी है जल-विहीन

शहर उठा है आस लगाए
गुण्डी, धड़ा, मटका लिए
लड़ते रहते
बात-बात पर
करते तू..तू, मैं..मैं
टोंटी उनको खूब निहारती
मैं अब तक हूँ नीर विहीन

मछली ने अब चलना सीख लिया
जीना सीख लिया
जल-विहीन
अब तो आजा अब तो आ जा
टोंटी भी अब आस लगाती
पानी आजा पानी आजा

Hidi Kavita- कुम्हार का घड़ा


आज मैने घड़़ा बनाया
घूमते हुए चाक पर
गीली मिट्टी को चढ़ा
अपनी हथेलियों और
अँगुलियों से सहेजकर

चाक पर चढ़ी
मेरे हाथों से घूमती मिट्टी
मुझ से पूछ रही थी
मेरा क्या बनाओगे
जो भी बनाओं
घड़ा या सुराही
दिया या ढक्कन
बस बेडौल नहीं बनाना

घबराहट में वह
इधर-उधर गिर जाती
और ताकती
बूढ़े कुम्हार की ओर
ये तुमने
किसे बिठा दिया चाक पर
मेरा रूप बनाने
नौसीखिये हाथों में
ढलती मिट्टी
चिन्तित है अपने भविष्य पर
मैनें भी देखा
बूढ़े कुम्हार की ओर आस से
वह मेरी मंशा समझ गया
और उसने अपना हाथ
लगा
सम्हाला मिट्टी को चॉक पर
मिट्टी में भी जीने
की आस बंधी
और संभल गई वह चॉक पर

एक सुन्दर सा घड़ा बन गया
आज मेरे हाथ से
घूमते हुए चाक पर

Wednesday, July 20, 2011

Hindi Kavita- नोनी की नेनो


काम वाली बाई ने
अपनी बच्ची को
नोनी कहकर बुलाया
नोनी सरपट भाग कर आई
मुझे लगा कहीं यह
टाटा की नेनों तो नहीं

‘‘बस्तर’’ में छोटी बच्ची को
कहते हैं नोनी
अँग्रेज़ी में छोटा-कण कहलाता है
नेनो
इस असाधारण समानता ने
मानों दो भाषाओं का
संगम बना दिया
नोनी को नेनो और
नेनो को नोनी बना दिया

नोनी भी चुलबुली और चंचल है
सरपट भागती है तो लोग उसे देखते हैं
नेनो को देखने के लिए भी
लोग तरसते हैं

पूरे चेनलो में
नेनो की बहार है
मानो नेनो को देखकर ही पेट भर जाएगा
फिर नोनी की भूख कोन मिटाएगा

लाख रूपये का कोई मायने नहीं रहा
नेनो चलाने वाला भी गरीब कहलाएगा

Hindi Kavita- मृग-मरीचिका


मैं मृग-मरीचिका
प्यासे को पानी का आभास दिलाती
मैं पानी का मोल बताती
मैं पानी को अनमोल बनाती
मैं मृग-मरीचिका

रेगिस्तान में उठती
गरम हवा की लहर हूँ मै
मानों शांत पानी में
किसी नें कंकड़
मार दिया हो

मैं पानी की एक-एक
बूँद को तरसते
मरूस्थल की पहचान हूँ
कभी मेरी छाती पर
मारता था हिलोरे
समन्दर का पानी
उसी पानी की आस में हूँ मैं

मैं मीठे पानी के
स्त्रोत का
रास्ता जानती हूँ
मैं हारे-थके प्यासे
काफ़िले में
जीने की आस बँधाती हूँ

अनमोल पानी का
झरना नहीं हूँ मै
कुँए और सरोवर का
मीठा पानी भी नहीं हूँ मैं
मैनें तो पानी को
कभी छुआ तक नहीं
मुझे तो पानी कभी दिखा ही नहीं
मैं तो बस
प्यासे की प्यास हूँ
मैं तो बस
पानी का अहसास हूँ

Hidi Kavita- मैं पानी हूँ

मैं पानी हूँ
आपकी आँखों का पानी
प्यासे की प्यास
बुझाने वाला पानी
रंगहीन, गंधहीन पानी
झील नदी नालों
पोखरों
तालाब और कुँए का पानी
वर्षा का पानी
ओस का पानी
समुन्दर का लहलहाता
इठलाता बलखाता पानी
बर्फ़ का जमा
बादलों का वाष्पित पानी

नदियों में बहता
तालाब पोखरों में बँधता
बादलों में आसमान छूता
उड़ता बरसता
फिर बहता
मैं रूकता नहीं
मैं चलता रहता हूँ
अपनी मंज़िल की ओर
सारा जहाँ मेरी मंज़िल

समंदर मेरा अन्तिम पड़ाव
जहाँ पर भी
मैं मारता हिलोरे
और उड़ जाता
बादल बन कर

मेरे बिना जीवन नहीं
मेरे बिना जग नहीं
मैं ना गिरूँ तो
पड़ जाता सूखा
मैं बरस पड़़ूँ
तो आ जाती बाढ़

मेरे जीवन चक्र
को मत रोको
मैं अनमोल हूँ
मुझे सहेजो

Hindi Kavita- बसंत ऋतु के बासंती पौधे


ऋतु बदली
आया बसंत

बसंती चादर से
सुशोभित वसुंधरा
सूखे पत्ते उड़ते
इधर-उधर
दरख़्तों पर सुशोभित
बासंती कोमल पत्तियाँ

आम बौरा गए
हो गए बासंती
मधुर सुगन्ध से
सुगन्धित वसुन्धरा
साड़ी में लिपटी
बलखाती, मुस्काती
लकदक यौवन के
मद में मदमाती नवयौवना

धूल के गुबार
उड़ते पत्तों का बवंडर
सबको चिढ़ाते
‘शान से इठलाते
बासन्ती पत्तों से लिपटे दरख़्त

ऋतु बदली आया बसन्त

Hindi Kavita- Bachapan


लड़ते-झगड़ते
और शिकायत करते
ये छोटे-छोटे बच्चे
फिर मिल जाते
क्षण भर में
खेलते-कूदत
किलकारियाँ भरते
ये छोटे-छोटे बच्चे

इनको खेलता देख
जी उठता हूँ मैं
इनको झगड़ता देख
बचपन की यादों में
खो जाता हूँ मैं
इनकी निश्छल हँसी
कराती है मुझे
मंदिर का-सा अहसास

काश समय का चक्र
उलटा घूम जाता
और मुझे
अपना बचपन पुनः मिल पाता

Hindi Bal-Kavita- Gadha Computer

मैं हमेशा दौड़ में
पिछड़ जाता
हैंग हो जाता, स्लो हो जाता
हर प्रकार के वायरस मुझे सताते
मुझे चलाने वाले
हाथ से काम कर
मुझ से आगे निकल जाते
मैं गधा कम्प्यूटर
मेरी विंडो खुलने के पहले
क्लोज हो जाती
मेरी मदर बोर्ड मुझे सताती
मेरा प्रिंटर
एक घण्टे में
एक प्रिंट निकालता
मैं गधा कम्प्यूटर

मुझे चलाने वाला
रोज़ झल्लाता
माऊस टेबल पर पटकता
और खाम-खा
की-बोर्ड के बटन
खटखटाता
कुर्सी पर पीछे झुकता
माऊस से
मिनीमाईज-मेक्सीमाईज करता
सी०पी०यू० के डब्बे को
हाथ से ठक...ठकाता
यू०पी०एस० के तारों को
निकालकर पुनः लगाता
अपनी क़िस्मत को कोसता
और पुनः
की-बोर्ड के बटन
खटखटाता
मैं गधा कम्प्यूटर

मेरा एंटी-वायरस
खुद वायरस से
इन्फेक्टेड हो जाता
अपग्रेड करने के लिए
रोज संदेश पढ़ाता
वायरस मेरे साथ
गुल्ली-डंडा खेलते
मेरे कहने पर कि
मैं एण्टी-वायरस हूँ
मुँह टेढ़ा कर जीभ चिढ़ाते
मैं हैरान-परेशान
ताकता अपने चलाने वाले को
और सोचता 
मैं हूँ गधा कम्प्यूटर

Hindi Kavita-Mera Jeevan

क्षंण भंगुर है जीवन मेरा
दीप जलाऊँगा।
फैल रहा अंधियारा काला
पल दो पल के लिए सही में 
उजियारा लाऊँगा।

पीड़ा मेरी अमिट छाप है
जीवन मेरी दृश्टि
फूलों की चाह नहीं है
ना मुरझाने का भय
खड़े लेन में अंतिम व्यक्ति 
से बतियाऊँगा 
क्षण भंगुर है जीवन मेरा
दीप जलाऊँगा...........

अंधियारे के काले काले बादल 
फेल रहे हैं नभ में
सूरज की हलकी सी किरण
बंद मुट्ठी में कर 
जग में फेलाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

पीड़ा मेरी मुझको भाये 
तुझको तेरा षुभ अर्पित
तेरे दुखों को अम्रत समझ
में पी जाऊंगा 
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

तू क्या जाने जलते अंगारों को 
मुख में रखने का सुख
ठण्डी-ठण्डी बर्फीली सी 
पवनों का सुख में पाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

पत्ते-पौधे जंगल सब कुछ
हर पल भाते मुझको
होले-हाले आती वायु से
नव जीवन पाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगाक्षंण भंगुर है जीवन मेरा
दीप जलाऊँगा।
फैल रहा अंधियारा काला
पल दो पल के लिए सही में 
उजियारा लाऊँगा।

पीड़ा मेरी अमिट छाप है
जीवन मेरी दृश्टि
फूलों की चाह नहीं है
ना मुरझाने का भय
खड़े लेन में अंतिम व्यक्ति 
से बतियाऊँगा 
क्षण भंगुर है जीवन मेरा
दीप जलाऊँगा...........

अंधियारे के काले काले बादल 
फेल रहे हैं नभ में
सूरज की हलकी सी किरण
बंद मुट्ठी में कर 
जग में फेलाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

पीड़ा मेरी मुझको भाये 
तुझको तेरा षुभ अर्पित
तेरे दुखों को अम्रत समझ
में पी जाऊंगा 
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

तू क्या जाने जलते अंगारों को 
मुख में रखने का सुख
ठण्डी-ठण्डी बर्फीली सी 
पवनों का सुख में पाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

पत्ते-पौधे जंगल सब कुछ
हर पल भाते मुझको
होले-हाले आती वायु से
नव जीवन पाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा