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Monday, October 1, 2012

महात्मा गांधी एक झलक

  महात्मा गांधी एक झलक

महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था। देशवासियों की सेवा करने के कारण वे महात्मा गांधी के नाम से संसार भर में प्रसिद्ध हुए। मोहन का जन्म अश्विन बदी 12 विक्रम संवत 1926 अर्थात 2 अक्टूबर 1869 ईश्वी को काठियावाड़ (सौराष्ट) के छोटे से शहर पोरबंदर में हुआ था। उनके पिता करमचंद गांधी वैष्य थे, वे वैष्ण धर्म को मानने वाले सत्यभाषी, निडर एवं न्याय प्रिय थे। उनकी माता का नाम पुतली बाई था। जब गांधी जी 7 वर्ष के थे तभी उनके पिता पोरबंदर से कोर्ट के सदस्य बन कर राजकोट चले गये थे। गांधी जी की स्कूली शिक्षा पोरबंदर के ‘लूल्या मास्टर’ के प्रायमरी स्कूल में हुई वह पाठशाला उनके घर के पास थी एवं मास्टर जी लँगड़े थे इसीलिए लोग उन्हें ‘लूल्या मास्टर’ कहते थे। मोहन के पिता राजकोट रियासत के दीवान बनकर गये तब बालक मोहन भी गया उस समय उसकी आयु 7 वर्ष की थी। वे काफी शर्मीले थे उन्होनें अपनी आत्म कथा में लिखा ‘‘ मैं बहुत शर्मीला लड़का था। पाठशाला में अपने काम से ही काम रखता था। घण्टी बजने के समय पहुँचता था और पाठशाली के बंद होते ही घर भाग जाता था।’’
बैरिस्ट्री पास करने के लिए गांधी जी 1887 में इंग्लेंड गए जहाँ वह 1891 तक रहे। 10 जून 1891 को उन्हें बेरिस्ट्री की पदवी प्राप्त हुई किंतु भारत आने के बाद वे मुकदमा लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाये प्रो.सत्यपूर्मी के अनुशार उनकी दशा‘‘ ससुराल गई हुई नई बहु’’ के समान थी।  गांधी जी अब्दुल्ला सेठ के दीवानी मुकदमें की पैरवी करने के लिए अप्रेल 1893 को दक्षिण अफ्रीका के शहर डरबन रवाना हुए। 1893 को नेटाल के बंदरगाह डरबन पर जहाज ने लंगर डाला। जहाज से उतरते ही उन्हें आभास हो गया की यहां योरोपिय एवं भारतीयों के बीच भेदभाव किया जाता है। दक्षिण अफ्रीका में भारत के मुसलमाल व्यापारियों की संख्या अधिक थी, हिन्दू, पारसी और इसाइयों की संख्या कम थी। यूरोपिय लोग भारतियों को ‘‘काला कुली’’ कहते थे।प्रिटारिया के एक वर्ष के निवास में गांधी जी को बहुत कुछ प्राप्त हुआ सार्वजनिक कार्यकरने की शक्ति का अहसाश एवं वकालत के गुंण उन्होनें वहीं सीखे। उन्होनें लिखा है ‘‘ वकील बनने की कुंजी यहीं मेरे हाथ लगी।’’ मैनें देखा कि वकील का गुण दोनों पक्षों के बीच खुदी हुई खाई को पाटना है। मुकदमें के खतम होने के पश्चात वे डरबन पहुंचे और हिन्दुस्तान लौटने की तैयारी शुरू की किंतु नेटाल में भारतीयों के मताधिकार के प्रश्न पर उन्होंने भारत लोटने का विचार त्याग दिया, तीन वर्ष पश्चात वे अपने परिवार को भी डरबन ले कर आ गये एवं उन्होनें 20 वर्ष दक्षिण अफ्रिका में बसे भारतियों के अधिकारों के लिए व्यतीत किये।  दक्षिण अफ्रिका में भारतीयों की सेवा करते हुए ही उन्होनं सीखा कि सत्य एक विशाल वृक्ष है ज्यों-ज्यों उसकी सेवा की जाति है त्यों-त्यों उसमें से अनेक फल पैदा होते  दिखाई पड़ते हैं। सत्य की इस खोज ने गांधी जी को राजनीति में आने को प्रेरित किया। 
अफ्रीका में बेस्टिर गांधी के सार्वजनिक कार्यो के कारण भारत ही नहीं वरन संपूर्ण विश्व उन्हें सम्मान से देखने लगा था एवं उनके विचार यूरोप वासियों को भी आंदोलित करने लगे थे। 9 जनवरी 1915 को गांधी जी भारत पहुंचे उनको देखने बंबई के बंदरगाह पर जनता ही भीड़ टूट पड़ी‘ महात्मा गांधी की जय घोष’’ से आसमान गुंज उठा। गांधी जी के गुरू गोपाल कृष्ण गोखले ने उनकी एवं उनकी पत्निी कस्तूरबा गांधी की अगवानी की। गवर्नन विलिंगटन ने उनसे कहा कि ‘‘ जब आप गवर्मेंट के खिलाफ  कोई काम शरू करो तो मझे उसकी पूर्व सूचना देना ना भूलना’’। गोखले जैसे शीर्ष नेताओं की मृत्यू के पश्चात गांधी जी गांधी जी कांग्रेस एवं देशवासियों के प्रेरणा श्रोत बन गये।‘‘ उनकी मृत्यू पर जवाहर लाल नहरू जी ने कहा था‘‘ हमारे जीवन से प्रकास तिरोहित हो गया है।’’ उन्होनें देश की स्वतंत्रता प्राप्ती के लिए संघर्ष तो किया किंतु स्वतंत्रता प्राप्ती के साधनों से समझोता नहीं किया। उनका मानना था कि गलत साधनों से प्राप्त स्वतंत्रता कभी स्थाई नहीं बन सकती।  स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उनने सत्याग्रह का मार्ग चुना। उन्होंने साबरमति में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की यहीं से उन्होंने एवं आश्रम वासियों ने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रहम्हचर्य, और अपरिग्रह को अपनाया। चंपारन का सत्याग्रह,खेड़ा सत्याग्रह, रोलट कमेटी का विरोध, असहयोग आंदोलन, बारडोली आंदोल, विदेशी वस्त्रों की होली , भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों का नेतृत्व करने के साथ ही वे ग्राम सुधार एवं अछुत उद्धार के कार्यों में भी लगे रहे। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की सरकार का गठन हुआ, किंतु गांधी जी तो जैसे इस महान ऐतिहासिक परिवर्तन से अप्रभावित ही थे। साम्प्रदायिक सद्भाव की स्थापना में उन्हें और महत्वपूर्ण कार्य मिल गया। 
30 जनवरी 1948 दिन शुक्रवार, समय संध्या रात की और बड़ रही थी। घड़ी ने पाँच बजा दिया था।बिरला हाउस के प्रांगण में जनता महात्मा गांधी के आगमन की प्रतिक्षा कर रही थी। गांधी जी दो लड़कियों आभा और मनु के कंधों पर हाथ रख जल्दी-जल्दी आ रहे थे वे कंधों पर शाल ओड़े हुए थे वे मंच की पाँच सीड़ियां ही चढ़े होंगे की भीड़ से निकले नाथूराम गोडसे ने पिस्तोल से तीन गोलियाँ दाग दी महात्मा के मुख से सिर्फ निकला हे राम। ब्रीचर ने लिखा है‘‘ गांधी की मृत्यु एक मनुष्य की मृत्यु से कहीं अधिक थी, एक युग समाप्त हो गया। -शरद चन्द्र गौड़ जगदलपुर
गांधी जी का छŸाीसगढ़ प्रवास...
 20 सितबंर 1920 का दिन छŸाीसगढ़ के लिए एक एतिहासिक दिन बन गया, इस दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का प्रथम छŸाीसगढ़ आगमन हुआ। गांधी जी पं.सुंदरलाल शर्मा से प्रभावित हुए उन्हीं के शब्दों में ‘‘ सुन्दरलाल जी तो हरिजनोद्धार के इस कार्य में मेरे भी गुरू हैं, समाज सुधार का उनका यह प्रयास प्रशंसनीय एवं अभिनंदनीय है’’।अपने प्रथम प्रवास में गांधी जी ने रायपुर, धमतरी और कुरूद की आमसभा में व्याख्यान दे कर स्वतंत्रता की ज्योति जलाई। अपने हरिजन उद्धार कार्यक्रम को ही आगे बढ़ाने के लिए गांधी जी द्वितीय एवं अंतिम बार 22 नवंबर 1933 को छŸाीसगढ़ अंचल के प्रवास पर आये। धमतरी में आयोजित उनकी आम सभा में 20 हजार लोगों की सहभागिता रही। उन्हें हरिजन कोष के लिए चांदी, जेवर एवं नगद रूपये भी भेंट किये गये। धमतरी में उन्हें 1001 रूपयों से भरी थाली दी गयी।गांधी जी ने पं. सुंदर लाल शर्मा जी के सहयोग से स्थातिप सतनामि आश्रम की भी प्रशंसा की। गांध्ी जी की यात्रा में वाहन चालक बने डाॅ. हजारी लाल जैन, वे संपूर्ण यात्रा में गांधी जी के साथ ही रहे। रायपुर प्रवास में पं.रविशंर शुक्ल के निवास शुक्ल भवन में उनके रहने की व्यवस्था रही। उनके साथ यात्रा में कु.मीराबेन, श्री ठक्कर बापा, श्री मनोहर देशाई एवं जमनालाल बजाज की पुत्री भी थी। धमतरी यात्रा पर उनकी कार में फेंकी गई एक पोटली की चर्चा रही इस पोटली में एक हल्दी की गांठ, थोड़ा पीला चांवल,, दो कोड़ी, एक अधन्ना तथा कुछ फूल थे। गांधी जी ने इसे एक गरीब की सच्ची भेंट माना। रायपुर में उनकी सभा लारी स्कूल में हुई जो कि अब सप्रे शाला के नाम से जाना जाता है। गांधी जी के कहने पर उनकी हजामत बनाने के लिए ब्राह्नाण पारा के माखन नाई को बुलाया गया अपने भाग्य पर धन्य माखन ने गांधी जी से कहा-‘‘ बने बलाये मालिक, जेखर दर्शन पर लाखों मनसे तरसथे, तेखर देह में आज छुए हवो’’ गांधी जी ने माखन से कहा मेनें 19 वर्षों से आईना देखना बंद कर दिया है। गांधी जी के फोटो खींचने आये फोटोग्राफर से उन्होंने डाॅ. हजारीलाल जैन के फोटो खींचने को कहा। गांधी जी आजादी के दीवानों का केन्द्र रहे जैतूसाव मठ भी गये। -श्रीमती कविता गौड़
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गांधीजी का जीवन दर्शन....
- शरद चन्द्र गौड़
गांधी जी सत्य एवं अहिंसा के पुजारी थे, किसी जीव की हत्या ना करना मात्र ही अहिंसा नहीं है, अपितु मन, वचन कर्म से किसी व्यक्ति को हानी नहीं पहुंचाना ही अहिंसा है। ईश्वर सत्य है सत्य ही ईश्वर है हर जीव में ईश्वर का अंश होता है एवं अहिंसा के बिना सत्य को नहीं पहचाना जा सकता। आपसी घृणा, द्वेष तथा असहयोग आदि गुणों का समावेश ईश्वर के प्रतिकुल है।
गांधी जी के अनुशार सत्य की प्राप्ती का एक मात्र साधन अहिंसा ही है, अहिंसा के बिना सत्स से साक्षातकार संभव नहीं है, ईश्वर सत्य है यदी सत्य का आचरण नहीं किया गया तो कितनी भी पूजा अर्चना क्यों ना कर लो ,मंदिर-मस्जिद, गिरजाधर, गुरूद्वारे क्यों ना जले जाओ ईश्वर से के दर्शन संभव नहीं हैं। मानव का यह धर्म है कि वह अत्याचार का विरोध करे। अहिंसा का अर्थ कायरता से नहीं लगाया जा सकता ,समर्थ व्यक्ति के द्वारा किया गया अहिंसक आचरण ही अहिंसा है। अपराधियों को दण्ड दिये जाने के प्रश्न पर अनका कहना था कि ‘‘ पाप से घृणा करो , पापी से नहीं’’। अर्थात जैल का स्वरूप भी एक सुधार गृह के समान ही होना चाहिए।
समाज के स्वरूप के विषय में उनके विचार हैं कि समाज महत्वपूर्ण है व्यक्ति ने अपनी आवश्यक्ताओं की पूर्ती के लिए समाज का गठन किया है किंतु व्यक्ति समाज से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि वही समाज का निर्माण करता है एवं अच्छे समाज की रचना के लिये व्यक्ति का भी सदाचारी होना चाहिए। यहां गांधी जी के विचार अधिकांश समाज शास्त्रियों से मेल नहीं खाते किंतु वे अपने आप का समाज शास्त्री नहीं बल्कि समाज सुधारक मानते रहे अतः उन्होंने समाज से जुड़ी तकनीकी शब्दावलियों की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया। मानव भौतिक आवश्यकताओं का दास बनता जा रहा है एवं आवश्यकताओं का कहीं अंत नहीं है व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन व्यतीत कर अपनी आवश्यकताओं को कम करना चाहिए। भौतिक आवश्यकताओं के प्रति मोह व्यक्ति को विवके शुन्य बनाता है। इसी तरह संयम जीवन का एक उच्च आदर्श है जो मानव को मानव बनाने के लिए अपेक्षित है।
महात्मा गांधी भगवत गीता में आस्था रखते थे एवं चिंतन हमेशा भगवत गीता के विचारों से प्रभावित रहा। वे एकेश्वरवाद में विश्वास रखते थे अर्थात ईश्वर एक ही है समस्त प्राणियों में उसका वास है अतः वे सभी प्राणियों के कल्याण के लिए प्रयास रत रहे। उन्होंने किसी विचार धारा के सृजन का प्रयास नहीं किया बल्कि अच्छे विचारों एवं आचरण को पहले स्वयं अपना फिर लोगों को अपनाने को कहा, स्वयं से अच्छा दृष्टांत दूसरा संभव नही। एक बार एक महिला उनके पास अपने छोटे बच्चे को लेकर आयी एवं उसने कहा गांधी जी ये बच्चा गुड़ बहुत खाता है इसलिए इसके दांत खराब हो गये हैं इसका गुड़ खाना छुड़वा दो, गांधी जी ने उस महिला से कहा बेटा एक सप्ताह बाद फिर से इस बच्चे को लेकर आना में इसका गुड़ खाना छुड़वा दूंगा। वह महिला एक सप्ताह बाद पुनः अपने बच्चे के साथ आयी गांधी जी ने फिर से वही जुमला दुहरा दिया बेटा इस बच्चे को लेकर अगले सप्ताह आना यही सिलसिला तीन सप्ताह चला , जब महिला पुनः अपने बच्चे को लेकर आयी तो गांधी जी ने बच्चे को प्रेम से अपने पास बुलाया और कहा बेटा ़ ज्यादा गुड खाने से दांत में कीड़े पड़ जाते हैं इसलिय अब से ज्यादा गुड़ खाना छोड़ दो फिर महिला से कहा कि अपने बच्चे को ले जाओ अब यह धीर-धीरे गुड़ खाना छोड़ देगा। महिला भड़क गयी उसने गांधी जी से कहा- गांधी जी इतना ही कहना था तो यह तो आप चार सप्ताह पहले भी कह सकते थे खामखा आपने मेरे चार सप्ताह खराब कर दिये। गांधी जी ने उŸार दिया बेटा चार सप्ताह पहले में भी बहुत गुड़ खाता था....में एसे किसी आचरण को व्यवहार में लाने को नहीं कह सकता जिसे मैं स्वयम् व्यहार में नहीं लाता।
गांधी जी ने ईश्वर के बारे में लिखा था‘‘ ईश्वर वह रहस्यपूर्ण शक्ति है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता और वह सर्वव्यापी है।मैं उसके अस्तित्व का अनुभव करता हूँ यद्यपि देखता नहीं हूँ।’’ उन्होनें कहा था यदी कोई व्यक्ति तर्क द्वारा मुझे ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने को कहे तो में हार जाऊँगा। किंतु मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि ईश्वर का अस्तित्व उतना ही सत्य है, जितना हम और आप। यदी कोई मेरी आँखें निकाल ले , नाक काट ले , मैं नहीं मर सकता हूँ, किंतु यदि कोई मुझसे ईश्वर के प्रति विश्वास को हटा ले तो में शीघ्र ही मर जाऊँगा।
गांधी जी के बारे में राधाकृष्णन् जी ने लिखा था‘‘ गांधीजी एक नितांत धार्मिक पुरूष हैं। उन्हें मानवता की एकता में अटूट विश्वास है। हम लोग चाहे जिस जाति, धर्म या देश के हों, हम सभी उसी परमपिता परमेष्वर की संतान हैं। प्रत्येक धार्मिक पुरूष सारी मानवता के साथ अपने स्नेह-संबंध में विश्वास रखता है।’’
गांधी जी ने ईश्वर को सत्य माना है एवं सत्य ही को ईश्वर माना , इसी लिए सत्य के प्रति उनका आग्रह सत्याग्रह बन गया एवं भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व को उनके इस विचार ने प्रभावित किया।
गांधी जी का विश्वास था कि मानव की सेवा ही ईश्वर सेवा है अतः मानव कल्याण के लिए उन्होंने संपूर्ण जीवन लगा दिया।गांधी जी के अनुशार सब धर्म समान इस अर्थ में हैं कि सबका लक्ष्य एक ही है अर्थत परम सत्य की प्राप्ति चाहे उस परम सत्य की व्याख्या हम किसी भी रूप में क्यो ना करें। अगर विभिन्न्ा धर्मों में अंतर है तो वह यह कि लक्ष्य सबका समान या दक होने पर भी उस लक्ष्य तक पनहुंचने का सभी का मार्ग अलग- अलग है और यह स्वाभाविक भी है।
रोमन रोलैंड के शब्दों में ‘‘ गांधी की क्रियाओं को समझने के लिए यह स्पष्टतः समझ लेना होगा कि गांधी वाद दो मजिला एक विराट् अट्टालिका की भाँति है। इसके नीचे धर्म की एक ठोस बुनियाद या नींव है। इस विराट तथा अटल नींव पर राजनीतिक तथा सामाजिक आंदोलन आधारित है।’’-शरद चन्द्र गौड जगदलपुर
़ (संदर्भ गृंथ साजिक विचार धारा काॅट से गांधी तक रवीन्द्र नाथ मुकर्जी, महात्मा गांधी का शिक्षा दर्शन प्रो. सत्यमूर्ति, नोबल प्ररस्कार विजेता रोमां रोलां की कृति महात्मा गांधी का जीवन दर्शन) 

गांधी जी की अफ्रीका प्रावास...
गांधी जी अब्दुल्ला सेठ के दीवाना मामले की पेरवी करने दक्षिण अफ्रिका गये। मुंबई से अफ्रीका की यात्रा पर पानी जहाज से निकले गांधी मई 1893 को नेटाल के बंदरगाह डरबन पहुँचे। जहाज से उतरने के साथ ही गांधी जी को अहशास हो गया कि यहाँ भारतीयों एवं यूरोपवासियों के मध्य भेदभाव किया जाता है। दक्षिण अफ्रिका में भारत के मुसलमान व्यापारियों की संख्या अधिक थी एवं वहां के लोग इन्हें ‘‘काला कुली’’ कहा करते थे। जब गोरों को दक्षिण अफ्रीका के खनिज संसाधनों का पता चला तब इन खनिज संसाधनों के दोहन के लिए उन्हें सस्ते मजदूरों का आवश्यकता पड़ी, दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासी जुलू स्वाभाव से ही सुस्त थे अतः उन्होंने भारत से महनत कश सस्ते मजदूरों का आयात शुरू किया ये मजदूर 1860 से दक्षिण अफ्रिका आना प्रारंभ हुए। उन्होंने यह शर्त भी रखी कि पाँच वर्ष पश्चात उन्हें वापस जाना पड़ेगा आगे उनके निवास की स्थिति में पुनःप्रतिज्ञाबद्ध होना पड़ेगा। भारतीय कुलियों को वे गिरमिटिया केे नाम से पुकारते थे। ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया ने सन् 1858 में घोषंणा की कि भारतीय कुलियों को वे सभी अधिकार प्राप्त होंगे जो अन्य नागरिकों को प्राप्त हैं। किंतु एंसा हो नहीं रहा था एवं भारतीय वहाँ भेदभाव का शिकार थे। गांधी जी ने भारतियों के प्रति होने वाले भेदभाव के विरूद्ध कड़ा संघर्ष किया। वे आये तो  एक वर्ष के लिए  शेख अब्दुल्ला के दीवानी मामले की पेरवी करने किंतु उन्होंने 21 वर्ष से अधिक दक्षिण अफ्रिका में बिताए उन्होंने 1914 को अंतिम रूप से दिक्षण अफ्रिका से बिदाई ली।
बेरिस्टर गांधी की पोने दो हजार फीस एवं जहाज के आने जाने का किराये की जानकारी होने पर अब्दुल्ला असमंजस में पड़ गये उनका केस ट्रांसवाल की राजधानी प्रिटोरिया में चल रहा था उनका अच्छा व्यवसाय था उनके जहाज भी चलते थे भारतीयों के बीच उनका अच्छा सम्मान भी था। कचहरी पहंचने पर मजिस्ट्रेट ने उन्हें पगड़ी उतारने को कहा एवं गांधी जी ने पगड़ी उतारने से इनकार कर दिया....मानो यह उनके अंग्रेजों के ख्लिाफ असहयोग आंदोलन की शुरूआत थी। उन्होनें पगड़ी के बदले टोप पहनने पर भी विचार किया, हकंतु अबदुल्ला ने कहा कि यह उनकी अंग्रेजों के समक्ष हार मानी जायेगी एवं भारतीयों के साथ भेद भाव और भी बड़ जायेगा। कोर्ट की इस घटना को पेपरों में जम कर उछाला गया एवं बेरिस्टर माहन दास करमचंद गांधी रातों रात दक्षिण अफ्रिका में प्रसिद्ध हो गये। गांधी जी को मामले को समझने के लिए प्रिटोरिया जाना थ अबदुल्ला ने गांधी जी के लिए प्रथम श्रेणी के टिकट की व्यवस्था की गांधी जी की गाड़ी जब रात के लगभग 9 बजे नेटाल की राजधानी मेरिप्सबर्ग पहुँची तो उस डिब्बे में एक अंग्रेज घुस आया एवं गांधी जी को वहां बैठा देख पहले तो चैंका फिर रेल के अधिकारी को साथ ले आया। रेल के अधिकारी ने अपमानजनक भाषा में गांधी जी को दूसरे डिब्बे में जाने को कहा, गांधी जी के विरोध करने पर उन्हें जबरदस्ती स्टेशन पर ही उतार दिया गया। पूरी रात गांधी जी ठंड में ठिटुरते रहे सुबह उन्होंने अबदुल्ला को खबर करी तब उनके आगे की यात्रा की व्यवस्था की गयी। चार्लस टाउन पहुंचकर उनको आगे की यात्रा घोड़ा गाड़ी में करनी थी । साथी अंग्रेज यात्री ने उनका गाड़ी के अंदर नहीं बैठने दिया बड़ी मुस्किल से वे कोचबाक्स पर बैठ कर सफर कर सके उस अंग्रेज ने आगे जलकर उन्हें वहाँ से भी उठाने का प्रयास किया किंतु गांधी जी ने संघर्ष किया इस प्रकार वे जाहंसबर्ग पहुँचे आगे की रेल यात्रा उन्होंने स्टेशन मास्टर से निवेदन कर प्रथम श्रेणी के डिब्बे में की जोकि जो कि एक अंग्रजे सहयात्री के सहयोग से शांतीपूर्ण रही। प्रिटोरिया के एक अच्छे होटल का मेनेजर भी उन्हें इसीलिए रूकाने पर सहमत हुआ कि वे अपने कमरे में ही भोजन मंगाकर खायेंगे  क्योंकि उनके अंग्रेज ग्राहक किसी काले के साथ खाना-खाना पसंद नहीं करते। गांधी जी ने वादी एवं प्रतिवादी में आपसी समझोता कराने में सफलता प्राप्त की इस प्रकार दोनों ही न्यायालय के खर्चों से बच गये। इस संदर्भ में गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा हैे कि  ‘‘ इस मामले से मैनें  मानव स्वभाव के अच्छे पक्ष को पहचाना जान लिया और मानव हृदय को जीतने की कला सीख ली।’’ गांधी जी ने करीब 20 वर्षों तक वकालत की एवं कई मामलों में वादी प्रतिवादी में समझोता कराकर संतुष्ट किया वे झूटे मुकदमों की कभी पेरवी ही नहीं करते थे।
सेठ अबदुल्ला के मुकदमें की पेरवी कर वे जब भारत लोटने की तैयारी कर रहे थे तभी उन्होनें ‘‘नेटाल मर्करी’’ नामक अखबार में पढ़ा भारतीयों को मताधिकार से वंचित करने वाला विधेयक विधान सभा में लाया जाने वाला है बस उन्होने भारत लोटने का निर्णय स्थिगित कर दिया। गांधी जी ने अबदुल्ला के नेतृत्व में विरोध कमेटी का गठन किया एवं सन् 1894 में भारतीयों की ओर से प्रार्थना पत्र भेजा गया, परिणाम स्वरूप विधान सभा की कार्यवाही दो दिनों तक स्थगित रखी गई किंतु दो दिनों के बाद ही प्रस्ताव पारित कर भारतीयों को मतदान से वंचित कर दिया गया।गांधी जी ने भारत के राष्ट्रवादी नेता दादा भाई नौराजी को दक्षिण अफ्रिका की घटनाओं से अवगत कराया एवं विनम्रता से परामर्श चाहा। गांधी जी की प्रेरणा से दक्षिण अफ्रिका में बसे भारतीयों ने पहली बार संगठित हो अंग्रजोें का विरोध किया। उन्होंने ‘‘नेटाल इंडियन कांग्रेस’’ की स्थापना की सेठ अबदुल्ला उसके अध्यक्ष चुने गये एवं गांधी जी मंत्री बने। लार्डरिपन को प्रार्थना पत्र भेजा गया उन्होनें भारतीयों को मतदान से वंचित करने वाले विधेयक को रद्द कर दिया। गांधी जी ने सामाजिक सुधार के क्षेत्र में भी कार्य प्रारंभ किये। भारतीय शिक्षक संध की स्थापना की 1896 में वे पुनः भारत की और रवाना हुए भारत पहुंचकर उन्होंने दक्षिण अफ्रिका में बसे भारतीयों की करूण गाथा को लोगों को बताया अफ्रीकी अंगेजों ने तो अब गांधी जी कोे दक्षिण अफ्रिका में ना रखने का फैसला कर लिया।  किंतु गांधी जी छः माह पश्चात ही अबदुल्ला के अनुरोध पर उनके नये जहाज से निःशुल्क दक्षिण अफ्रिका की और रवाना हुए। गांधी जी यूरोपिय पोशाक में रहते थे उनकी पत्निी एवं बच्चों को अपमान ना सहना पड़े इसलिए उन्होंने उन्हें भी यूरोपिय पोशाक ही पहनाई। गांधी जी एवं मजदूरों से भरे जहाज को बंदरगाह गोरों के विरोध का सामना करना पड़ा फ्लेग का बहाना कर जहाज को बंदरगाह पर 23 दिन रोका गया एवं किसी भी यात्री को बंदरगाह पर उतरने नहीं दिया गया। अंततः 23 दिन यात्री उतरे एडव्होकेट लाटेन की जिम्मेदारी पर गांधी जी को सुरक्षित जहाज से उतार कर उनके मित्र रूस्तम जी के मकान पर ले जाया गया। अंग्रेजों ने उनके साथ मारपीट की तब पुलिश सुपरीटेंडेट अलेक्जैंडर की पत्निी उनके सिर पर छाता तान कर खड़ी हो गयी। समाचार पत्रों में गोरे लोगों द्वारा गांधीजी से की गई असभ्यता की कड़ी आलोचना की गयी  इससे कुछ गोरे भी लज्जित हुए। गांधी जी सेवा कार्य में लग गये उन्होंने बोअर युद्ध में भी रोगियों की चिकित्सा की। गांधी जी पुनः भारत आये एवं उन्होनें कांग्रेस के अधिवेशन में एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में भाग लिया उन्हें दक्षिण अफ्रिका का समस्या पर बोलने के लिए मात्र पाँच मिनिट का समय दिया गया वे कलकŸाा में लोकमांय बालगंगाधर तिलक के साथ रूके। उन्होंने राजकोट में कुछ माह वकालत भी की एवं वे 1902 में तीसरी बार नेटाल दक्षिण अफ्रिका पहुँचे। गांधी जी ने जोहंसबर्ग में रहकर वकालत प्रारंभ की। उन्होनें जूलू युद्ध में भी युद्ध ग्रस्त क्षेत्र में सहायता की। 1904 में उन्होनें डर्बन से इंडियन ओपीनियन नामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। 11 सितम्बर 1906 को एक सभा में उन्होंने सत्याग्रह को पारिभाषित करते हुए कहा कि ‘‘ बुरे कानून के सामने ना झुकना ही सत्याग्रह है।’’ हेनरी पोलक द्वारा दी गयी रस्किन की किताब अनटू दिस लास्ट से वे अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्होनें डर्बन में सौ एकड़ की जमीन खरीद कर ‘‘फिनिक्स आश्रम’’ की स्थापना की। यह आश्रम उनके सहयोगियों का केंद्र बन गया। उन्होनें भारतीयों की सेवा हेतु खर्च जुटाने के लिए जोहंसबर्ग में वकालत शुरू की। उन्होनें अपना संपूर्ण जीवन जन सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होनें अपने भाई को लिखा कि ‘‘ मेरा अपना कुछ नहीं । मेरे पास जो कुछ भी है वह लोक सेवा में लगाया जा रहा है।मुझे किसी प्रकार के सांसारिक सुख भोग की चाह नहीं है। मैं समाज-सेवा में पूर्ण रूप से लग जाना जाहता हूँ। ट्रांस्वाल सरकार के अध्यादेश के अनुशार भरतीयों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया गांधी जी ने सत्याग्रह का मार्ग अपनाया इस गलत कानून के विरोध के कारण उन्हें एवं अन्य भारत वासियों को जेल में डाल दिया गया, लगातार भारतीयों के जेल भरो आंदोलन से परेशान हो अंग्रेज सरकार ने समझोते का रास्ता अपनाया , अध्यादेश को इस शर्त पर वापिस ले लिया गया कि भारतीय स्वेच्छा से अपना नाम रजिस्टर में दर्ज करवा देंगे। लेकिन जनरल अंगे्रज जनरल स्मट्स ने अपने वचन का पालन नहीं किया उन्होनें एशियाई रजिस्टर में नाम दर्ज करने वाले कानून को वापस नहीं लिया। गांधी जी ने सत्याग्रह किया उन्हें एवं उनके साथियों पर मुकदमें चलाये गये एवं उन्हें जेल भेज दिया गया। गांधी जी ने सुप्रमीम कोर्ट में अपील की एवं उनकी बात मान ली गयी। गांधी जी ने जेल यात्रियों एवं उनके परिवार को संगठित रखने के लिए टालस्टाय आश्रम की स्थापना की इस आश्राम के लिए उनके मित्र केलेन बेक ने एक हजार एकड़ की जमीन मुफ्त दी। यहाँ उन्होनंे प्राकृतिक चिकित्सा के प्रयोग किये वहीं आश्रम वासियों को आत्म निर्भर बनाया। गांधी जी ने लोगों को पदयात्रा के लिये कहा वहीं वे स्वयं भी प्रतिदिन साठ-पेंसठ किलोमीटर प्रतिदिन चलते थे। केपटाउन में अंग्रेजी कानून आया की सिर्फ इसाई पद्धिती से किये गये विवाह ही वैद्य हैं इस प्रकार गैर इसाईयों द्वारा किये गये विवाह अवेध घोषित हो गये , गांधी जी ने इसे सामाजिक अन्याय माना एवं इसका संगठित विरोध किया। अंततः गैर ईसाई विवाह को वैद्य ठहराना पड़ा । गांधी जी के नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका में किये गये सत्याग्रह शांतिपूर्ण रहे अंततः उन्होनें दक्षिण अफ्रिका से 18 जुलाई 1914 को अंतिम विदाई ली एवं इंगलैण्ड के माग्र से भारत प्रस्थान किया। -शरद चन्द्र गौड़

गांधी जी का संपूर्ण जीवन एक नजर......

जन्म- 2 अक्टूबर 1869 बोरबंदर काठियावाड़ सौराष्ट्र ( गुजरात)
पिता का नाम- करमचंद गांधी
माता का नाम- पुतली बाई
विवाह- 13 वर्ष में हुआ
पत्नी- कस्तूरबा
प्रारंभिक शिक्षा- पोरबंदर एवं राजकोट
लंदन प्रस्थान- 4 दिसंबर 1888 बम्बई(मुंबई) से कानून का पढ़ाई करने के लिए
उनकी पढ़ाई का खर्च उठाया- बड़े भाई लक्ष्मीदास ने 
बेरिस्टर की पदवी प्राप्त हुई- 10 जून 1891 को 
अफ्रीका रवाना- 1893 सेठ अबदुल्ला के मुकदमे के कसलसिले में
अफ्रीका रहे- 21 वर्ष
अफ्रीका से भारत रवाना- 18 जुलाई 1914
अफ्रीका में किये गये अंादोलन- एशिया मूल के लोगों के साथा भेदभाव का विरोध,  मतदान से वंचित वंचित करने का विराध, गैर ईसाई विवाह को अवेध ठहराये जाने का विरोध, रस्ट्रिेशन कानून का विराध।
अफ्रिका में स्थापित किये गये आश्रम- फिनिक्स एवं टाल्स्टाय आश्रम
अफ्रीका से भारत पहुँचे- 9 जनवरी 1915 बंबई के अपोलो बंदरगाह
अफ्रीका से लोटे गांधीजी पहने थे- धोती,  दुपट्टे, अँगरखे और काठियावाड़ी पोशाक में 
अफ्रीका से लोटे गांधीजी का स्वागत किया- गोपालकृष्ण गोखले ने
अफ्रीका से लोटे गांधीजी ने सबसे पहले मुलाकात की- गर्वनर विलिंग्टन से
साबरमति के सत्याग्रह आश्रम की स्थापना- 15 मई 1915
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एतिहासिक भाषण- 4 फरवरी 1916
चंपारन आंदोलन-
खेड़ासत्याग्रह- 1917-18
रोलट बिल का विरोध- 30 मार्च एवं 6 अप्रेल 1919 गांधी जी ने अपनी दोजप्त किताबें ‘‘ हिंद स्वराज’ एवं ‘‘सर्वोदय’’ बेच कर विरोध किया। सत्याग्रह प्रारंभ
जलियावाला बाग कांड- 1919 
रोलट एक्ट विरोधी सत्याग्रह बंद-   18 अप्रेल 1919 सत्याग्रह बंद
असहयोग आंदोलन- 1920 से
असहयोग आंदोलन स्थगित- चैरी-चैरा कांड से निराश हो
छह वर्ष की सजा के लिए रखा गया- यरवदा जैल में
साईमन कमीशन का विरोध- 3 फरवरी 1928
बारडोली सत्याग्रह-
दांडी यात्रा- 12 मार्च 1930 नमक कानून तोड़ने के लिए 5 अप्रेल 1930 को दांडी पहंुचे
जेल भेजे गये- 4 फरवरी 1932 यरवदा जेल
भारत छोड़ो आंदोलन- 
कस्तूरबा की मृत्यू- 22 फरवरी 1944
गांधी जी का महाप्रयाण- 30 जनवरी 1948
गांधी जी का प्रथम छŸाीसगढ़ प्रवास- 20 सितंबर 1920
गांधी जी का अंतिम छŸाीसगढ़ प्रवास- 22 नवंबर 1933


क्या गांधीजी समाजशास्त्री थे ?

भारतीय परंपरा के अनुकुल , भारतीय समाज पर अपने विचार प्रकट करने वाले विचारकों में गांधी जी का स्थान प्रमुखता से लिया जाता है। भारतीय परंपरा एवं संस्कृति के अनुकुल भारतीय समाज की समस्याओं का समाधान उनकी विचारधारा में मिलता है। उन्होंने ना सिर्फ भारतीय समाज पर अपने विचार रखे वरन सामाजिक समस्याओं का निराकरण भी किया वे समाजशास्त्री से ज्यादा समाज सुधारक की भूमिका में नजर आये। भारत हो या दक्षिण अफ्रिका उन्होनें देखा की भारतीयों की समस्याएं समान ही हैं। भारतीय समाज की सायद ही कोई एसी समस्या हो जिस पर गांधी जी ने अपने विचार व्यक्त ना किये हों। देश के राष्ट्रीय जीवन के निर्माण में उनकी भूमिका सर्वोपरी रही, अहिंसा के आदर्शों पर चलते हुए उन्होंने देश में एक राष्ट्रीय चेतना का संचार किया इसीलिय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के रूप में याद करता है।  उन्होंने समाज के निम्नतम् सतर पर पहुंचकर वहाँ की समस्याओं को पहचानकर लोगों की भावनाओं को समझकर अपने विचार प्रकट किये। उनके ये विचार विसुद्ध भरतीय विचार थे  और भारतीय जनजीवन से सम्बन्धित थे। फिर भी क्या महात्मा गांधी को समाजशास्त्री कहा जा सकता है।
गांधीजी के जीवन का अध्यन करने पर यह पता चलता है कि उनका सार्वजनिक जीवन एक राजनीतिज्ञ के रूप में प्रारंभ हुआ। उन्होनें राजनीति में भी नैतिक तत्वों का सम्मिलित किया। इस दृष्टिकांण से गांधी जी सिर्फ राजनीतिज्ञ ना होकर एक आदर्शवादी भी थे। उनका विश्वास था कि व्यापक रचनात्मक कार्यों के बिना स्वराज्य प्राप्ती फीकी और अर्थहीन रहेगी। उन्होनें कहा था ‘‘ ठोस रचनात्मक कार्यों के बिना हमारी आजादी की लड़ाई कमजोर व ठीली पड़ जायेगी। अर्थात गांधी जी आदर्शवादी ही नहीं यथार्थवादी भी थे। वे धनी एवं गरीब के बीच की खाई को पाटना चाहते। ग्राम स्वावलंबन उनकी यथार्थवादी सोच का ही परिणाम था। उन्होंने भारत की असीमित जन शक्ति को पहचाना बल्कि उसके सार्थक उपयोग का रास्ता भी बतलाया, यदी हमने उनके विचारों को सही मायने में हकीकत में बदला होता तों हमारा ग्राम स्वालंबी एवं बैरोजगारी की समस्या से मुक्त होता वे उन्नत तकनीक के विरोधी नहीं थे किंतु उन्होंने असीमित जनशक्ति के सार्थक उपयोग की वकालत की। एक बेरिस्टर के रूप में भी उनकी सोच यथार्थवादी के साथ आदर्शवादी भी बनी रही वे किसी गलत व्यक्ति की वकालत नहीं करते थे , उनका उद्देश्य न्याय दिलाना था किंतु दोशी को बचाना वे गलत मानते थे।
गंाधी जी ने अपने विचारों को अपने जीवन अनुभव एवं बोद्धिक चिंतन के आधार पर प्रस्तुत किया उन्होनें समाजशास्त्र के मान्य सिद्धांतो को इसका आधार नहीं बनाया, उनके सामाजिक विचार हमें उनके व्याख्यानों , लेखों, तथा आत्मकथा के माध्यम से प्राप्त होते हैं। वास्तविकता तो यह है  िकवे समाजशास्त्री बनना भी नहीं चाहते थे न ही इस दिशा में उन्होनें कोई प्रयास ही किया वे तो समाजसुधार के लिए सक्रिय रहे एवं राष्ट्र के मार्गदर्शक बने। किंतु सामाजिक विचारकों की शायद ही कोई किताब हो जिसमें गांधी जी के सामाजिक विचारों को शामिल नहीं किया गया हो। वे समाजशास्त्रियों की भांती सिद्धांतवादी भी नहीं थे वे अपने विचारों में व्यवहारिकता को बनाये रखते थे, परिस्थितियों के अनुसार वे अपने विचारों को बदलते भी थे। उन्होंनें स्वयं कहा कि ‘‘ लोग कहते हैं कि मेरे विचार बदल गये है, पर सच्ची बात तो यह है कि परिस्थितियां बदल गई है।’’ गांधी जी ने  यह भी कहा था कि ‘‘ मैं कदापी यह दावा नहीं करता हूँ कि मैनें किन्हीं नए सिद्धांतों कों जन्म दिया, मेने तो अपने निजी तरीके से शाश्वत सत्यों को दैनिक जीवन और उनकी समस्याओं पर लागू करने का प्रयत्न मात्र किया है।’’
उररोक्त विवेचना के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँच हैं कि गांधी जी एक राजनीतिक, दार्शनिक, समाज-सुधारक और विश्व शिक्षक थे, उन्हें समाजशास्त्री ना कहना ही उचित प्रतीत होता है क्योंकि उनके विचारों में राष्ट्र की प्रगति बार-बार मूर्त हो उठती थी और उन विचारों के आधार पर कोई अंतिम निष्कर्ष या परिणाम निकालना संभव न था। श्री लुई फिसर ने सच ही कहा है कि ‘6 गांधीजी इतने स्वच्छन्द, निर्बाध तथा ऐसे थे कि उनके विषय में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती थी, इसलिए आप आवेगमय तथा कठिन  थे और बिना नक्शे के कहीं भी जा सकते थे।  फिर भी गांधीजी ने समस्त विचार, चिंतन, ध्यान, और कर्म के मूल केन्द्र या मूलधारा को अवष्य ही स्पष्टतः खोजा जा सकता है और है सत्य, अहिंसा, और जनकल्याण। डाॅ. महादेव प्रसाद शर्मा के शब्दों में ‘‘ गांधीवाद वी सिद्धांत है जो सब प्राणियों को भगवद् रूप् और इस कारण समान जानकर सत्य और अहिंसापूर्ण साधनों द्वारा सभी के कल्याण अथवा सर्वोदय का प्रयत्न करता है जिसके मतानुसार सभी व्यक्ति ओर सार्वजनिक समस्याएँ सत्य और अहिंसा के द्वारा सुलझाई जा सकती है।
गांधीजी के सम्बन्ध में एक दूसरी बात यह है कि उन्होंने अपने किसी भी विचार को केवल सैद्धान्तिक स्तर तक लाकर कभी नहीं छोड़ा, सदेव ही उसे व्यावहारिक रूप् में प्रयोग किया अर्थत उसे स्वयं अपनाया। उनके समस्त जीवन की कहानी व्यावहारिक स्तर पर सत्य की खोज की कहानी है। इसीलिए उन्होंने अपनी ‘‘आत्मकथा’’ को सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी का नाम दिया है।   -शरद चन्द्र गौड़ 

गांधीगिरी
संप्रेषण के तीन सााधन होते हैं दृष्य,श्रव्य, एवं दृष्य-श्रव्य इनमें से तीसरा साधना जादा प्रभावकारी सिद्ध होता है अतः चलचित्रों में उल्लेखित विषय वस्तुओं की उपेक्षा नहीें की जा सकती निष्चित रूप से समाज को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक है। गांधीगिरी शब्द मुन्न्ााभाई श्रंखला में बनी फिल्मों की याद दिलाता है। ‘‘मुन्न्ााभाई एम.बी.बी.एस.’’ एवं ‘‘लगे रहो मुन्न्ाा भाई’’ में गांधी जी के विचारों को की प्रासांगिता को एक अलग ही तरह से उकेरा है उसकी आवश्यकता एवं महत्व को समझने का प्रयास किया जाना चाहिए। बदली हुई परिस्थितियों में गांधी जी के विचारों की प्रासांगिता और भी ज्यादा बड़ गई है आज जब संपूर्ण इलेक्ट्रानिक मीडिया हिंसा एवं सेक्स को उपभोक्तावस्तुओं को बेचने का आधार बना रहा है तब ऐंसी परिस्थिति में गांधी जी के शांति, सहयोग एवं सादा जीवन के विचार समाज को ना सिर्फ संगठित रखेंगे बल्कि आने वाली पीड़ी को एक नया रास्ता दिखायेंगे। आखिर गांधीगिरी क्या है क्या यह ‘‘दादागिरी’’ से मिलता जिलता शब्द तो नहीं, लेकिन दोनों में वैचारिक समानता दिखाई नहीं पड़ती किंतु ‘‘गिरी’’ शब्द दोनों में समान रूप से उपयोग में लाया जा रहा है। उल्लेखित फिल्म में तो गांधीगिरी को एक हथियार की तरह उपयोग में लाया गया था ‘‘बिना धार का हथियार’’ एक ऐंसा हथियार जो मारे बिना ही घायल कर सकता है यदि कहानी को हकीकत के थोड़े ही करीब मान लिया जाये तो निश्चित रूप से यह एक कारगर हथियार था जिसे सफलता से उपयोग में लाया गया एवं अपेक्षित परिणाम भी प्राप्त हुए। गांधीगिरी हिंसा पर अहिंसा की जीत का साधन है यह एक अहिंसक सत्याग्रह का हथियार है जिसके प्रयोग से दक्षिण अफ्रिका में गांधी जी ने गोरों (अंग्रेजों) को झुका दिया था वहीं भारत में अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा भले ही जाते-जाते वे देश को दो भागों में विभाजित करने में सफल हो गए। अब ना तो गुलामी है नाही सांप्रदायिकता का नासूर बन चुका घाव किंतु हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार ने देश को गुलामी से भी जादा बद्तर स्थति में पहुँचा दिया है आज अगर गांधी होते तो उन्हें एक नहीं कई फिनिक्स, टाल्स्टाय एवं साबरमति आश्रम खोले होते , आज एक नहीं सेंकड़ों गांधी की आवश्यकता इस देश को है। माओवादी नक्सली आंदोलन के चलते देश के अधितर वनांचल मुख्यभूमी से कटकर रह गए हैं , बेकसूर वनवासी मारे जा रहे हैं किसी पत्रिका में पढ़ा था कि नक्सली वारदातों में मरने वालों की संख्या बार्डर पर शहीद होने वालों से अधिक है। शिक्षा के स्तर में अधिकाधिक भिन्न्ाता दिखाई पड़ती है आज डोनेशन के बल पर एक औसत विद्यार्थी भी अच्छे से अच्छे विद्याालय में दाखिाला ले डाॅक्टर-ईंजीनियर बन सकता है वहीं मुफ्त में सरकारी शिक्षा पाने वाला विद्याार्थी आज भी ‘‘लार्ड मैकाले’’ की  क्लर्क बनाओ शिक्षा पा रहा है। विकास की धारा भी सुपर्ण देश में एक सी नहीं बही है जहां पंजाब एवं हरियांणा उन्नत कृषी कर रहे हैं वहीं छŸाीसगढ़, झारखण्ड मध्यप्रदेश में आज भी कृषि की दशा शोचनीय है। ग्राम स्वराज के नाम जल रहे प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण ने भ्रष्टाचार का ही विकेंद्रीकरण किया है। ऐंसा शायद ही कोई विभाग हो जहां भ्रष्टाचार ना हो। कहते हैं आज वही व्यक्ति ईमानदार है जिसे भ्रष्टाचार करने का मौका नहीं मिला अर्थात सभी विभागों को गांधीगिरी की दरकार है। ऐंसा नहीं की आम व्यक्ति में असंतोंष नहीं हर व्यक्ति पीड़ित है, आक्रोशित है वह आंदोलन के लिए तैयार है किंतु उचित नेतृत्व के अभाव ने उसे अपने घर तक सीमित कर के रख दिया है। आज का आम आदमी गांधी के इंतजार में बैठा है। जगदलपुर के जिला कलेक्टोरेट को तत्कालीन कलेक्टर श्री गणेश शंकर मिश्रा जी ने गांधी मय स्वयरूप प्रदान कर दिया वहां आफिस में काम शुरू करने के पहले कर्मचारी गांधीजी के प्रिय भजन वैषणव जन....... को सुनते हैं एवं गांधी जी के आदर्शों पर चलने का प्रण लेते हैं, संपूर्ण कलेक्टोरेट परिसर में गांधी जी के प्रियवचनों एवं गीतों को सुरूचिपूर्ण तरीके से लगाया गया है ऐंसा ही संभाग के अन्य कार्यालयों में भी किया गया है किंतु क्या वास्तव में गांधीवादी आचरण का अनुकरण इन कार्यालयों में किया जा रहा है, क्या ये सभी कार्यालय भ्रस्टाचार से मुक्त हो चुके हैं ? हम चले थे अकेले पीछे मुड़कर देखा तो कारंवा बन गया , प्रयास कैसा भी हो चुपचाप घर बैठने से तो अच्छा ही होता है कहते है चार बार झूंठी हंसी हंसो तो एक बार सच्ची मुसकुराहट आप के लबों पर जरूर का जायेगी बस्तर में मिश्रा जी द्वारा किया गया गांधीवादी अभियान लंबा जायेगा औरों को भी स्वेच्छा से जोड़ेगा ऐंसी आशा की जानी चाहिए।
वास्तव में बहुत से विभाग तो ऐंसे हैं कि जहाँ सीधे-सीधे गांधीगिरी की दरकार है, मैं किन्ही विभाग विशेष के नाम के उल्लेख से परहेज करना चाहता हूँ लेकिन लोग तो जानते हैं रोड पर गाड़ियों को रोक कर चालान के नाम पर क्या किया जाता है, बिल आहरण के नाम पर वसूली का शिकार कौन सा ऐंसा कर्मचारी है जो नहीं हुआ, पुलिस हमारी सुरक्षा के लिए है लेकिन हम अपने बच्चों को पुलिस का नाम लेकर डराते हैं, घर का नक्सा पास कराने चले जाईये, बच्चे के एडमीशन के लिये जाईये आप को नोचने खसोंटने वाले हर जगह मिल जायेंगे। ट्रांसफर में मौसम में तो अधिकारियों के बल्ले-बल्ले ही हो जाते हैं एवं पिसता है सीधा-साधा आदमी जिसने कभी भ्रष्टाचार नहीं किया।
मुझे तो ऐंसा लगता है गांधीजी के विचारों को हकीकत का अमलीजामा पहनाना ही गांधीगिरी है एवं आज के समय में यह हमारी समस्याओं का यही एक मात्र हल भी है।

Tuesday, September 18, 2012

पुरानी डायरी से


पुरानी डायरी से- शरद चन्द्र गौड़
//1//
जब जक मिले ना थे तो  कोई आरजू ना थी
देखा तुझे तो तेरे तलबगार हो गए

//2//
जिन्दगी बदस्तूर गुजर जायेगी
जिन्दगी जिन्दा लाष बन जायेगी
अगर तुम ना मिली तो

//3//
आज हम तुम्हें पाकर रहेंगे
सारे जहां को दुष्मन बनाकर रहेंगे
ना पा सके तुम्हें सषरीर पर
आत्मा को अपना बनाकर रहेंगे

//4//
उनको क्या कहूँ जो अपने को
पहचान नहीं पाते
चाहते तो हैं बहुत पर
पूरा कर नहीं पाते
ना समझ सका इनकी
जिन्दगी का मकसद
इन्सानियत नहीं पर
कीड़े मकोड़ों की तरह रहना
नहीं चाहते

//5//
क्यों रूठ कर चले गये
हमें तनहा छोड़ कर
कभी राह भी बदलेगी
बस अब यही तमन्ना है


//6//
बदल रहा है मौसम कब से
जल्दी से तु आ जा
तरस रही हैं आँखें कब से
आके कुछ समझा जा
बदल रहा है मौसम कब से
याद तेरी जब आती है मुझको
नींद आँखों से खो जाती है
आके लोरी सुना जा
जल्दी से तू आ जा
जल्दी से तू आ जा................

//7//
उजड़े महलों में बहार आ गई
सूखी टहनियों पर फिजा छा गई
पर मेरी तनहा जिन्दगी में
वो ना आ सकी

//8//
जिन्दगी एक इम्तिहान है
जिन्दगी एक कारवां है
हम जिन्दा हैं अगर तो
जिन्दगी से लड़ रहे हैं हम
जिस दिन खतम् होगी यह लड़ाई
फेल होंगे हम इम्तिहान में
मगर हम लड़ते रहेंगे
ज्ब तक दम है
इस इम्तिहान में पास होते रहेंगे

//9//
राह भटक कर कदम लड़खड़ाये
मंजिल मिली तो
दिल की धड़कन रूक जाये

//10//
‘‘आ मेरे पास आ’’
आ मेरे पास आ
आ के नजरें मिला
नैनों की झील में प्यार की नैया चला
आ मेरे पास आ
क्यों लहरा रहीं हैं ये
जुल्फें तेरी
घटाओं की तरह है ये बिखरी हुयी
नैनों की रागनी से ना आँसू बहा
आ मेरे पास आ

पास आकर कभी हम मिल ना सके
दूर रहकर भी ना हम जुदा हो सके
आसमाँ मिल रहा है
धरा से जहांँ
हमने सोचा यही है
मिलेंगे वहाँ

आ मेरे पास आ.........
आ के नजरें मिला

//11//
किसी की आस में चैखट पर दिये ना जलाइ्रये
किवाड़ सूखी लकड़ियों के बने होते हैं

//12//
सिर्फ आदमी
रोता हुआ जन्मता है
षिकायतें करता हुआ जीता है
और निराष होकर मरता है

//13//
तमाम उम्र जिसे खोजता रहा
वह मुझे
अपनी दहलीज पर
पड़ा मिला

//14//
पूँछा था फूलों से
काँटों ने कभी
क्यों तोड़ते हैं लोग तुम्हें
मुझे तनहा छोड़कर
कहा था फूल ने
पूछो उनसे
जो तोड़ते हैं मुझको
तुम्हें तनहा छोड़कर
रख पाते है कितने दिन
जिन्दा
हमें जुदा कर

//15//
सोचता हूँ कभी
ना ये दिन रहे
ना ये रात रहे
पर इस दुनिया में
पर इस दुनिया में
हर शख्स
इन्सान रहे

//16//
क्यों आती हो हर पल
खयालों में मेरे
फैलाती हो क्यों तुम अंधेरों में उजाले
क्या डरती नहीं तुम
इन स्याह अंधेरों से
बेड़ियों में जकड़े इस समाज के लोगों से
यहाँ ना कोई
अब अपना हैष्
खड़े है हम तुम
अब उस दोराहे पर
गुजरती है गाड़ी
हर पल जहाँ से
लगता है अब तो
डर हरपल यहाँ पर
लगता है होगी
टक्कर यहां पर
दुुआ मांगता हूं मैं
अस बे जुंबा से
क्यों जुदा कर रहा है
यूं इन्सां को

//17//

मेरे खयालों ने मुझे, इतना गुमा दिया
ना अब तारीखें याद हैं, ना दिन का पता रहा

//18//
उस काले पत्थर को
मार के ठोकर
फेंका था मैनें
आज मंदिर में रखा देख
लोग शीस नवां रहे हैं
शायद यही अंतर है
सड़क पर पड़े और
मंदिर में रखे पत्थर का........

//19//
उस राह पर चलते हुए
राही अधिक है
इस राह पर तो फूल नहीं कांटे अधिक है
क्या यही है मुजुषा !

मन की आरजू में बसे सपने अधिक है
इन सपनों में सच्चाई नहीं झूट अधिक है
क्या यही है मुजुषा !

उस दिन देखी मेने एक वृक्ष पर
कूकती कोयल
इस वृक्ष पर तो
कोयल नहीं कौए अधिक है
क्या यही है मुजुषा !

मेरे खयालों में वह आती अधिक है
दुखते हुए जख्मों को दुखाती अधिक है
क्या यही है मुजुषा !

उसके तो मन की आरजू है
मंजुषा
मेरे तो मन मैं बसी है
मंजुषा ही मंजुषा

//20//
प्यार
देख रही हूँ नित नये सपने
चांद सितारे जितने नभ में
प्यार मिला संसार मिला
जिसको जग का ज्ञान मिला
करम , कत्र्तव्य अधिकार सभी में
कत्र्तव्य को ही प्यार मिला
कहते हैं नहीं मिला उस ेअब तक कुछ
पर धरती माँ का प्यार मिला

//21//
दीवाली
दीवाली की दीप्ती से
दीप जल रहे हैं
मनवा के अंगने में फूल खिल रहे हैं
सजनी के सजना से पहली दीवाली पर
प्रेम देख भंवरे जल रहे हैं
दीवाली की दीप्ती से
दीप जल रहे हैं

मतवाली चंचल सी
हिरनी सी आँखों में
ख्वाबों की दुनिया के
अष्क दिख रहे हैं
राहों की रोषनी
दियों की दीप्ती
राही एक बार
खूब रूक रहे हैं
दीवाली की दीप्ती से
दीप जल रहे हैं

//22//
निगाहें तबस्सुम है जो दीवाना बना देती है
गिला है सिर्फ उन्हीं से
जो हमें देख नजरें चुरा लेती है
मंजिलें कहीं क्या निगाहों ने देखी है
हमारी मंजिलें तो निगाहें झुका लेती है
नजरें इनायत दे तो चंद लब्ज कहूँ
इष्क ने कहा है
ये जो दिया है
वह बुझ कर जला है!
खता है सिर्फ उन्हीं से
जे जल कर बुझे है
हम जलकर भी अहले वफा कर रहे हैं
उन्हें लाल जोड़े में विदा कर रहे हैं
निगाहें तबस्सुम है जो दीवाना बना देती है
गिला है सिर्फ उन्हीं से
जो हमें देख नजरें चुरा लेती है






Tuesday, September 11, 2012

समीक्षा-व्यंग्य संग्रह : राम खिलावन का राम राज्य,लेखक : रवि श्रीवास्तव


व्यंग्य संग्रह : राम खिलावन का राम राज्य
लेखक : रवि श्रीवास्तव
प्रकाषक : यष पब्लिकेषन
1/10753 गली नं.-3 सुभाष पार्क
नवीन शाहदरा, कीर्ति मंदिर के पास, दिल्ली-110032
फोन : 09899938522
प्रथम संस्करण : 2012
मूल्य : 195/-

समीक्षा : शरद चन्द्र गौड़
             Mobile-9424280807

यष प्रकाषन दिल्ली से प्रकाषित रवि श्रीवास्तव जी के इस व्यंग्य संग्रह में उनके तीस व्यग्यों को शामिल किया गया है। इसकी प्रस्तावना में ही प्रेम जनमेजय जी ने कहा है ‘‘ वे राजनैतिक विसंगतियों के मायाजाल में स्वयं को दिग्भ्रमित कर सीमित नहीं करते, एक नई बात के साथ अपने पाठक को षिक्षित करते हैं ’’।
परामर्शदाता, दो कौड़ी के समारोह से लौटते हुए, सत्ता प्रतिष्ठान एवं समीक्षा के प्रतिमान, सूरज की रोषनी एवं सूरज का अंधेरा, वे लौटकर नहीं आये हैं, बीच बहस में बुद्धि जीवी, साहित्यिक गोष्ठियों में श्रोताओं का योगदान, जागो-जागो पखवाड़ा आया, कभी-कभी ऐसा भी होता है आलेखों में साहित्यक आयोजनों , साहित्य के क्षेत्र में दिये जा रहे सम्मानों एवं साहित्यिक पत्रिकाओं पर काबिज परामर्षदाताओं पर तीखा व्यंग्य किया गया है।
परामर्षदाता में वे लिखते हैं, कुछ पत्रिकाएं ऐसी भी हैं जो चर्चित नामों को अपना परामर्षदाता बताती हैं जबकि ऐसे चर्चित रचनाकारों का इन पचिकाओं से कोई सरोकार नहीं रहता, वहीं इन पत्रिकाओं के मालिक भी लेखक बनने के मोह से बच नहीं पाते , इनके अधकचरे लेखन को बना-संवारकर प्रस्तुत करना संपादक मण्डल का दायित्व बन जाता है।
संसाधन वाले लोगों को अब साहित्यकार बनने का चस्का लग गया है, अधकचरे साहित्य को किताब के रूप में प्रस्तुत कर भव्य विमोचन समारोह किये जा रहे हैं। ‘‘दो कौड़ी के समारोह से लौटते हुए’’ अधकचरे साहित्य पर किया गया ऐसा ही एक प्रहार है।
समकालीन कविता प्रायोजित समीक्षा की षिकार हो रही है, विषेष कर बड़े अफसर जब कवि बनते हैं तब उनके संग्रह की बड़ी-बड़ी समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपती हैं, समीक्षक भी सत्ता के सामने नतमस्तक हो उनकी तुलना पूर्व स्थापित कवियों से करने से नहीं चूकते, लेखक ने अपने आलेख ‘‘सत्ता प्रतिष्ठान और समीक्षा के प्रतिमान’’ में इस प्रकार के विचार व्यक्त किये हैं।
पुरस्कारों की हकीकत को सामने लाने का काम किया है ‘‘सूरज की रोषनी में सूरज का अंधेरा ’’ में । बिकाऊ पुरस्कारों पर प्रहार करते हुए इस व्यंग्य के एक पात्र रामलाल निरमोही एक संपादक को फोन पर कहते है ‘‘ दूसरा सुझाव सुनिये ध्यान से , दो हजार नौ में हमारा भी उपन्यास आया है छपकर ‘‘सूरज की रोषनी में सूरज का अंधेरा ’’ आप चाहें तो पहला पुरस्कार दे सकते हैं हमारी कृति को, बड़ी प्रषंसा हो रही है, पत्रिकाओं में चर्चे हैं, कई पत्रिकाओं में समीक्षा भी आयी है। ‘‘वे लौटकर नहीं आए हैं’’ के माध्यम से भी उन्होनें पुरस्कारों के सच को उजागर किया है, कुछ साहित्यिक पत्रिकाएं साहित्यकारों को सम्मानित करने के लिए पुरस्कार नहीं दे रही बल्कि स्वयम् को स्थापित करना ही उनका ध्येय बन गया है। ‘‘कभी-कभी ऐसा भी होता है’’ आलेख में लेखक ने विभिन्न साहित्यिक आयोजनो के अपने अनूठे अनुभवों को शामिल किया है, यह आलेख इन आयोजनों की प्रासांगिता तक पर प्रष्न चिन्ह लगाता है।
इस संग्रह का पहला व्यंग्य ‘‘षनी की महादषा और बाजारवाद’’ है, इस में उन्होनें ना सिर्फ अंधविष्वास को रेखांकित किया है बल्कि राजनेताओं के वास्तविक चरित्र को भी उजागर किया है, चुटिली भाषा में उन्होनें अपनी बात बड़ी ही सरलता से रखी है।
‘‘मुंबई की बारिषःटी.वी. पर’’ में टी.वी. पर प्रसारित समाचारों पर तीखा व्यंग्य किया है, महानगरों विषेषकर मुंबई की बारिष को ये समाचार चैनल दिनभर दिखाते हैं इन्हें चिंता होती है अपनी टी.आर.पी. की भले ही पूरा देष बाढ़ ग्रस्त क्यों ना हो।
अमीरों की अमीरी एवं गरीबों की गरीबी को भी लेखक ने बड़ी ही सुक्ष्मता से देखा है, अमीरों के कुत्ते का गुम हो जाना चर्चा का विषय बन जाता है, जबकि गरीब घर के ईमानदार नवयुवक पप्पु के गायब हो जाने की पुलिस रिपोर्ट तक नहीं लिखाई जाती , ‘‘ पप्पू और पामेरियन’’ के माध्यम से इसी आर्थिक विषमता के सामाजिक पक्ष को सफलता से उजागर किया गया है।
राजनेताओं के चरित्र पर भी वे टिप्पणी करने से नहीं चूके ‘‘षपथ ग्रहण समारोह’’ में वे लिखते हैं - जनता के सामने वोटों के लिए हाथ जोड़कर घिघियाने वाले नेता रिजल्ट निकलते ही शेर बनकर दहाड़ने लगते हैं, ये ही मंत्री बनने के लिए शपथ ग्रहण समारोह में जमकर फिजूल खर्ची करते हैं।
‘‘मुरारी लाल जा चुके हैं’’, पढ़ते हुए अनायास ओठों पर मुस्कुराहट आ ही जाती है, पूर्व किरायेदार के परिचितों को किस प्रकार नया किरायेदार झेलता है, इस व्यंग्य में उसे बड़े ही आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। नये किरायेदार ने ‘‘ मन ही मन संकल्प दुहराया मकान कितना भी अच्छा क्यों ना हो, पूर्व किरायेदार का इतिहास भी अच्छा होना चाहिए’’ ।
लेखक ने मंहगाई की मार से ग्रस्त गरीबों के दर्द को छुआ है ‘‘ मंहगाई को आत्मसात करना सीखें’’ में । वहीं ढोंगी बाबाओं पर अंधभक्ति रखने वालों को सीख दी है ‘‘ इस तरफ गया है’’ में। राज्य में गौरव पथ के नाम पर बनी सड़कों का क्या हाल है यह किसी से नहीं छिपा है , इसी गौरव पथ पर तीखा व्यंग्य है ‘‘गौरव पथ का आत्र्तनाद’’।
राजा भैया बाहुबलियों का सिंबल बन गया है, ‘‘पेनल-पेनल’’ आलेख के माध्यम से लेखक ने व्यवस्था पर तीखे प्रहार किये हैं। आज के जागरूक मतदाता को बहलाया-फुसलाया नहीं जा सकता उसे अच्छे एवं बुरे की समझ है, लकिन अफसोस राजनीतिक पार्टियां योग्य उम्मीदवार को चुनाव में खड़ा करने का साहस नहीं कर पाती, यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें चरित्रहीनों में से किसी एक को चुनना हमारी मजबूरी है। ‘‘हमारा वोट आखिर किधर जायेगा’’ में कुछ इसी प्रकार के उदगार व्यक्त किये गये हैं।
वी.आई.पी. के आगमन से किस प्रकार छोटे शहरों की याता यात व्यवस्था बिगड़ जाती है एवं आम नागरिक विषेषकर टेªफिक में फंसे मरीज किस प्रकार परेषान होते हैं इसका मार्मिक चित्रण लेखक ने ‘‘सावधान ! राजधानी ष्षहर में ’’ में किया है। रिटायर व्यक्तियों के दर्द का भी अहसास लेखक ने अपने आलेख ‘‘रिटायर होने के बाद आखिर जाना कहां है’’ में किया है। सरकारी आयोजनों में भी जानीलीवर जैसे कामेडियन की फूहड़ कामेडी परोसी जाने लगी है, आहत लेखक इसका वर्णन अपने व्यंग्य ‘‘षताब्दी समारोह में जानी लीवर ’’ में करते हैं।
अंत में उस आलेख पर चर्चा करना चाहूंगा जिसने इस संग्रह को अपना नाम दिया, ‘‘ राम खिलावन का राम राज्य’’ मंहगाई की मार झेल रहे आम नागरिक के दुख-दर्द का अहसास है, एक तरफ जहां आम नागरिक मंहगाई से त्रस्त है वहीं नेता, मंत्री माला पहन स्वागत करवा रहे है...यही राम खिलावन के लिए अब राम राज्य है।

Saturday, July 28, 2012

श्रीमती कविता गौड़ की कविताएं



श्रीमती कविता गौड़ की कविताएं

//1//
घर
खाली मकान को घर कहते हो
ना बच्चों की किलकारियाँ
न सास की दुलार भरी फटकार
न ननद से तकरार व मुनहार
न ससुर व जेठ के खखारने
का संकेत
न बहु के पायल की मीठी
झुन-झुन सी आवाज
न देवर भाभी का मीठा परिहास
न षाम को पड़ोसिनों की बैठक
न मोहल्ले के बच्चों की धूम-धड़ाका  
यह सब ना होते हुए भी
मकान अब घर कहलाते है
फर्नीचर व सजावट से होता है
घर के व्यक्तियों का आँकलन
लोगों के रहने की जगह में 
रहते हैं अब लग्जरी सामान
ऐसा ही होता है आज का मकान
नहीं-नहीं आज का घर....आज का घर

//2//
त्याग
त्यााग है माता
त्याग है पत्नी
त्याग है बहन
त्याग है बेटी
त्याग है हर नारी
त्यागती है घर अपना
पति के लिए
त्याागति है सुख चैन
बच्चों के लिए
त्याागति है हर इच्छा
परिवार के लिए
फिर भी न होता
कोई नाम उसका
पर जब कोई पुरूश
त्याग करता है
तो वो ऊँचाईयों
पर पहुँच जाता है
राम और भीश्म बनकर
दुनिया में पूजा जाता है

मेरी कविता अबूझ...अबूझमाड़.......... & नारायणपुर.......


 //1//
अबूझ...अबूझमाड़..........

अब मैं नहीं रहा अबूझ
पहेलियों की तरह
कठिन प्रष्नों का पुलिन्दा

गुंजती है ढोल-नगाड़ों
और गीतों से
मेरी हर शाम

घोटुल में
चेलिक-मोटियारी
के नृत्य मेरा जीवन है
मेरी संस्कृति मेरी धरोहर है
अब भी मेरी हवाओं में
शांति है , मिठास है
अब भी मुझे बारूद की गंध अच्छी नहीं लगती
लहलहाते वन, कल-कल करते झरने निष्छल निष्कपट आदिवासी जन
मेरी जीवन है
अब लोग मुझे बुझ रहे हैं
अब नहीं रहा मैं अबूझ...अबूझमाड़
//2//
 नारायणपुर.......

उबड़-खाबड़ रास्ते
घने वन
गलियां की आवाजें
बमों के धमाके
मौत से सन्नाटे में
बन रही सड़कें, पुल-पुलिए और स्कूल
सूरज की रोषनी
प्रति दिन बन कर आती है
आषाओं की पहली किरण

विकास के पथ पर
चलेंगे हम चाहे जितनी आएं बाधाएं
लांघ लेंगे हम ऊँचे - ऊँचे अवरोधों को
बढ़ चले ये कदम
ना रूकेंगे अब

अब ना रहेगा
अबूझ... अबूझमाड़
अब ना रहेगा कोई
अनपढ़ और अषिक्षित किसान

नारायणपुर की मढ़यी
फिर सजेगी
फिर होगा
जीवन उल्लास

बंद पड़े घोटुल
फिर होंगे आबाद
चैलिक और मोटियारी
फिर झूमेंगे साथ-साथ

एक यात्रा वैश्णोदेवी श्रीनगर ,एवं अम्रतसर की........




एक यात्रा वैश्णोदेवी श्रीनगर ,एवं अम्रतसर की........


मेरी साली साहिबा का फोन आया जीजाजी वैश्णोदेवी जाने का आरक्षण करा रहे हैं आप भी जाओगे, अक्सर मैं मना कर दिया करता था इसलिए उन्हें मेरी हां की उम्मीद कम ही रही होगी लेकिन मैनें अपनी सहमती जता दी , साथ ही अम्रतसर , श्रीनगर एवं गुलमर्ग जाने का भी प्रस्ताव रखा, श्रीनगर जाने की इच्छा लंबे समय से रही है, फिर वहां षांति की स्थापना ने वहां घूमने का एक अवसर प्रदान किया मैं इसे खोना नही चाहता था। रिजर्वेषन चूंकि दो माह पहले करा रहे थे इसलिए परेषानी नहीं हुई दुर्ग- जम्मूतवी सुपरफास्ट से 29 मई 2012 को हमारा 19 बर्थ का रिजर्वेषन हो गया। मुझे मेरी पत्नी कविता बच्चों संस्कार एवं सत्यदीप को जगदलपुर से रायपुर आकर टेªन पकड़नी थी, मेरे साडू़ भाई दीपक, साली प्रतिभा उनके दो बच्चों ईषा एवं दिवयांष को गीदम से रायपुर आना था गीदम जगदलपुर से भी 80 किलोमीटर दक्षिण में है जो कि एक धूर नक्सली बेल्ट के नाम से जाना जाता है। हम दोनों परिवार 27 तारीख को ही अपनी ससुराल सुन्दरनगर रायपुर आ गये। रायपुर से मेरे सास-ससुर भी साथ जा रहे थे, एक साली रचना एवं उसके बच्चे यष एवं  यषस्वी को भिलाई से रायपुर आना था, वे भी 28 तारीख को ही रायपुर आ गये। अब हम लोगों का घूमने का पूरा मूड़ बन चुका था एवं रास्ते की तैयारी जोर-षौर से चल रही थी, खाने पीने का इतना सामान ये सभी रख रहे थे कि दो लगेज सिर्फ खाने पीने के सामान से ही भर गये। मेरी पत्नी कविता छः बहने हैं उनमें से वह सबसे बड़ी है, इस यात्रा में छः में से मेरी पांच साली एवं उनका परिवार साथ जा रहा था, इतने लागों का एक साथ इक्ट्ठा होना एक दुर्लभ संयोग था लेकिन हम कमोबेस सब एक जगह इकट्ठे हो रहे थे। सबसे छोटी साली एकता उसके पति सतीष एवं उनकी बच्ची को रायपुर के घर की रखवाली का दायित्व मिला वे बच्ची के छोटी होने के कारण इस यात्रा पर नही जा रहे थे, वे दोनों भी 29 तारीख की सुबह ही रायपुर पहुंच गये, अब सुंदरनगर रायपुर का हमारा घर खचाखच भर चुका था बच्चों की उठापटक कूंदफांद , हल्लागुल्ला को रोकना अब किसी के बस में नहीं था। इस यात्रा के सूत्राधार रेल्वे कर्मचारी मेरे साड़ु भाई बृजेष ने टिकिट कटाने का बीड़ा उठाया था, वो उनकी पत्नी अर्थात मेरी एक और साली भावना उसके बच्चे बादल-बिन्नी को बिलासपुर से चढ़ना था, एक और साली अर्चना एवं उसकी बच्ची रिया को षहडोल से चढ़ना था, उनके पति संजीव मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं मैं चाहता था कि वे भी साथ जायें लेकिन नौकरी संबंधी व्यस्तता के कारण वे हमारे साथ नहीं जा रहे थे।
नियत समय से डेढ़ घंटे पहले पहले हम लोग रेल्वे स्टेषन पहुंच चुके थे टेªन प्लेटफार्म नं 5 पर आने वाली थी सभी इलेक्ट्रानिक डिस्प्ले दुर्ग-जम्मुतवी के 5 नम्बर पर आने की सूचना दे रहे थे कि टेªन के आने के सिर्फ पांच मिनिट पहले एनाउंसमेंट होने लगा कि दुर्ग से चलकर जम्मूतवी जाने वाली सपुरफास्ट टेªन प्लेटफार्म नं 2 पर आ रही है। समस्या यह थी कि अभी भी इलेक्ट्रानिक डिस्प्ले टेªन को प्लेटफार्म नं 5 पर आने की सूचना दे रहे थे जबकी एनाउंसर उसके प्लेटफार्म नं 2 पर आने की लगातार उदघोशणा कर रही थी, पूरे प्लेटफार्म पर अफरातफरी आ आलम था, इतने सारे सामान एवं बच्चों के साथ होने के कारण मेरी भी हालत पस्त हो गई तिस पर से हमने कुली भी नहीं किया था, तभी किसी ने सूचना दी अनाउंसर ने गलत अनांउस किया है, ट्रेन इलेक्ट्रानिक डिस्प्ले के अनुसार प्लेटफार्म नं 5 पर आ रही है। इस अफरातफरी के माहोल में ही करीब 12.30 बजे टेªन ने प्लेटफार्म नं 5 में प्रवेष किया, कुछ मुसाफिर प्लेटफार्म नं 2 पर भी जा चुके थे, अधिकांष अपनी बोगियों से दूर थे, इसलिए अफरातफरी का माहौल कम नहीं हुआ था गनीमत है, हम सभी अपनी बोगी के पास ही थे इसलिए हमें अपनी बोगी में चढ़ने में ज्यादा परेषानी नहीं हुई, गर्मी के मारे बुरा हाल था, भीड़ एवं अफरातफरी के माहोल में बच्चों के गुम हो जाने की षंका होती है, हमारी सास हम लोगों को कहीं नहीं दिखाई दे रही थी एवं टेªन ने प्लेटफार्म को छोड़ दिया था, गनीमत थी वे बोगी के दूसरे गेट की तरफ से आती नजर आयी। वैश्णोदेवी दर्षनार्थियों की भीड़ के कारण कूपे में रिजर्वेषन से ज्यादा लोग भरे थे एक परिवार तो बिना बर्थ कनफर्म के ही जम्मू के 1800 कि.मी. के सफर पर निकला हुआ था, ऐंसे और भी यात्री थे जिनने बोगी में भीड़ का माहौल बना दिया था। भाटापारा आते-आते हमें बड़ी मुष्किल से अपनी सीटें प्राप्त हो सकी। बच्चों ने अपना रंग जमा लिया था उनके अंताक्षरी के दौर चल रहे थे वहीं ताष के खेल भी वे खेल रहे थे, हम लोग भी उनके साथ ही इंज्वाय करने के मूड में थे। बिलासपुर से बादल एवं बिन्नी के आ जाने से बच्चों की तो जैसे चांदी हो गई , एक छः सीट का पूरा कूपा उनलोगों ने हथिया लिया एवं जम कर मस्ती करने लगे, उन्हें देख कर यही लगता है कि इन्हें कभी थकान नहीं होती, वहीं गर्मी के मारे भी बुरा हाल था, ठण्डा पानी एवं षीतल पेय ही एक मात्र विकल्प बचा था, अब सभी को इंतजार था षहडोल का ढेर सारे खाने-पीने के सामान के साथ अर्चना एवं रिया षहडोल के रेल्वेस्टेषन पर मौजूद थे, सजीव उनको छोड़ने आये थे , मैं प्लेटफार्म पर उतरा एवं उनसे मुलाकात की। अब हमारे सफर के पूरे मुसाफिर टेªन में सवार हो चुके थे उनकी मस्ती के कारण मानों पूरा कंपार्टमेंट जी उठा था। षहडोल के बाद गर्मी में भी कमी आ चुकी थी मौसम अच्छा खासा सुहावना हो चुका था, खाने का एक आईटम खा भी नहीं पाते थे कि दूसरा निकल जाता था।
मेरी बड़ी बहन एवं उसका परिवार ग्वालियर में रहता है, मेरा मित्र प्रतीक भी ग्वालियर में है, वे मुझसे मिलने प्लेटफार्म पर आने वाले थे किंतु पता चला कि झांसी के बाद टेªन सीधी अगरा केंट रूकती है। आगरा में भी मुझे मेरे एक फेस बुक मित्र से मिलना था, पठानकोट जाने के कारण वे आगरा में मुझसे मिलने नहीं आ सके , मिलने की जगह चक्की बेंक तय हुई जोकि पठानकोट के पास ही है एवं वहां से जम्मू डेढ़ घण्टे की दूरी पर रह जाता है। षिव दिसवार से मेरी मुलाकात फेस बुक पर हुई थी किंतु षीघ्र ही हम दोनों फोन पर भी बात करने लगे , उसकी पोस्टिंग श्रीनगर से तीन सौ किलोमीटर आगे मिलेट्री केंप में थी एवं वह इस समय अपने घर आगरा आया हुआ था, मुझे उसकी चक्की बेंक में इंतजार रहा किंतु वह नही आ पाया, फिर मेरी उससे मुलाकात वापसी में आगरा स्टेष्न पर ही संभव हो सकी। सफर में गरमी थी किंतु फिर भी हम सब उसका भरपूर लुत्फ उठा रहे थे, चक्की बेंक से जम्मूतवी तक टेªन बिल्कुल पेसेंजर में तब्दील हो गई, पता चला यहां से सिंगल लाईन है, लगभग सही समय संध्या 9.30 पर हम जम्मूतवी पहुंचे। वापसी में हमे उस नदी को देखने का भी अवसर मिला जिसके नाम पर इस स्टेषन का नाम जम्मूतवी पड़ा था। हमने पहले ही से निर्णय लिया हुआ था कि यदी साधन मिल गया तब हम सीधे बस से कटरा जायेंगे, रात्राी विश्राम कटरा में ही कर 31 तारीख की सुबह हम वैश्णोदेवी की चढ़ाई सुबह षुरू करेंगे। सामान को स्टेषन से बाहर निकालकर कर मैं, बृजेष एवं दीपक बस की जानकारी लेने बस अड्डे की तरफ निकले, षेश साथियों को सामान के साथ वहीं रूकने को कहा गया। बस अड्डा पास ही था, कटरा के लिए लाईन से बस खड़ी थी एक दो बस वालों से बात भी हो गई, हम वापस अपने साथियों के पास आये ,दूरी ज्यादा नहीं थी एवं सभी के लगेज में व्हील लगे थे इसलिए हम बिना आटो रिक्सा या कुली के बस अड्डे पहुंच गये, बस ठीक थी सब को बैठने की जगह मिल गई सामान रखने एवं उतारने में थोड़ी दिक्कत गई। ये दिक्कत तो कम थी कटरा पहुंचने पर एक बड़ी दिक्कत सामने आने वाली थी जिसका मुझे पूर्व अनुमान नहीं रहा था। 45 किलोमीटर के घाट को पूरा करने में पूरंे दो घण्टे लगे, लगभग बारह बजे रात्री हम कटरा के अंधेरे बस स्टेण्ड में 19 सदस्यों एवं सामान के साथ पूरे दो घण्टे खड़े रहे, किसी एक लाज में 19 सदस्यों के रूकने की जगह नहीं मिल पा रही थी वहीं धर्मषाला भी भरी हुई थी, पहले से रिजर्वेषन ना कराने की परेषानियां हम झेल रहे थे। काफी दौड़-भाग के बाद हमें एक ठीक-ठाक लाज में तीन ट्रिªपल बैड रूम मिल सके, वो हमारे लिए नाकाफी थे , लेकिन कोई विकल्प भी नहीं था बच्चों को नींद आ रही थी इसलिए हम लोग किसी प्रकार उसमें एडजेस्ट हो ही गए। थकान के कारण सभी घोड़े बेचकर सोये, आदतन मैं ही सबसे पहले उठा, सुबह के पांच बजे हुए थे लाज की संकरी गली से निकल कर मैं मुख्य सड़क पर आ चुका था, जो दूरी रात में ज्यादा लग रही थी बड़ी सुबह वह मुष्किल से आधा किलामीटर ही निकली मैने एक ठेले पर चाय पी एवं उन पहाड़ों को जी भरकर निहारा जिसपर माता वैश्णोदेवी विराजी हुई थी। कहते हें जब तक माता नहीं बुलाती तब तक कोई उनके दरबार में नहीं जा सकता बिल्कुल सही लगा, मेरा कई बार मन हुआ थ वैश्णोदेवी दर्षन का किंतु किसी ना किसी कारण से टलता ही रहा एवं आज में वैश्णोदेवी के चरणों में बसे कटरा नगर में मौजूद था। जाय वाले ने ही मुझे बता दिया बस अड्डे के बाजु से लगी इमारत में टिकिट खिड़की है , छह बजे के आस पास लोग लाईन में लगना षुरू हो जाते हैं, दूसरी चाय पी कर मैं अपने लाज की ओर जा रहा था। आज सुबह ही एक ऐंसी घटना घटी की एक डेढ़ घण्डे के लिए हम सभी परेषान हो गए किंतु फिर उसे ही याद कर रास्ते भर मजाक करते रहे, वह घटना थी सुबह-सुबह हमारे ससुर जी का रास्ता भटक कर गुम हो जाना।
मैनें दीपक को उठाया ‘‘यार जल्दी लाईन में लग जायेंगे तो टिकिट भी जल्दी मिल जायेगा, हम गरमी षुरू होने के पहले ही चढ़ाई षुरू कर सकते है’’ , दीपक ने समय नहीं लगाया हम दोनों बाहर निकले हमारे पीछे-पीछे ही हमारे ससुर जी भी निकले, लाईन में ज्यादा देर खड़ा होना पड़ता है, इसलिए मेनें उन्हें बताया आप लाईन में नहीं लगो हम दोनों टिकिट ले आयेंगे। ‘‘ चलों में भी टहल लूंगा एवं चाय भी पी लूंगा’’ उनने कहा। दूरी ज्यादा नहीं थी हम दोनों सीधे जाकर लाईन में लग गए, हमारे आगे भी डेढ़ दो सौ लोग लाईन में लगे हुए थे, हमारा नंबर करीब एक घण्टे बाद आ गया। टिकिट लेकर हम बाहर निकले बाहर ही एक टेªवल ऐजण्ट का कार्यालय था वहां हम श्रीनगर के लिए टैक्सी एवं लाॅज बुक करने गए। उन्नीस सदस्यों के कटरा से श्रीनगर ले जाने वापस जम्मू छोड़ने एवं ं दो दिन एवं तीन रात रहने का खर्चा उनने बताया अड़तालीस हजार, किंतु 38 से 40 हजार के बीच सौदा लगभग तय हो गया। हम दोनों लाॅज पहुंचे सब फरती से तैयार हो रहे थे बच्चे तक नहा धो कर तैयार मिले, हम सब  लाज से बाहर निकल आये । तब किसी को खयाल आया पापाजी नहीं दिख रहे हैं। पता चला वो हम दोनों के साथ गये थे फिर वापस नहीं आये तिस पर से किसी का मोबाईल भी काम नहीं कर रहा था। मेरा मोबाईल तो पोस्ट पेड था किंतु वह भी काम नहीं कर रहा था। हम लोगों नेे उन्हें खूब खोजा, मैं समझ चुका था वो लाॅज भूल कर भटक गये हैं पर फिर घूमते फिरते बस स्टेण्ड के पास जरूर आयेंगे, करीब डेढ़ घण्टे की खोज के बाद वे मुझे एक आटो के पास नजर आये एवं क्षंण भर में ही गायब भी हो गये, में सड़क क्रास कर तेजी से भागा वे एक लाज के रिषेप्सन पर रखे फोन के पास खड़े थे। मुझे देख उनके चेहरे पर जो खुषी आयी वह देखते ही बनती थी, वे अपने गुम हो जाने की सूचना रायपुर अपनीे सबसे छोटी बेटी एकता को दे चुके थे।
कटरा के बस अड्डे से वैश्णोदेवी चढ़ाई स्थल तक पहुंचने के लिए आसानी से आॅटो उपलब्ध थे, तीन आटो में बैठ हम सभी आधा घण्टे से भी कम समय में वहां पहुच गये। घोड़े वाले चेक पोस्ट के पहले से ही हमारे पीछे पड़ने लगे, उपर जाने एवं वापस आने का दो हजार तक मांग रहे थे। हम लोग पैदल ही बढ़ते रहे चेक पोस्ट के बाद तो सैंकड़ों घोड़े वाले मौजूद थे एवं वे सभी आ-आ कर चर्चा कर रहे थे। बार्गिंग भी चल रही थी हम लोगों की तरफ से बृजेष ने बारगिंग का दायित्व संभाला , हम लोगों ने निर्णय लिया कि घोड़े से ऊपर जायेंगे एवं पैदल उतरेंगे , मम्मी-पापा वापस भी घोड़े से ही आयेंगे। आठ सौ पचास रूपये में सिर्फ ऊपर ले जाने का सौदा तय हुआ एवं ंहम सभी अलग-अलग घोड़ों पर सवार हो गए। मेरे दोने बेटे सत्यदीप एवं संस्कार एक ही घोड़े पर सवार थे, बादल एवं बिन्नी भी एक ही घोड़े में आ गये।अब सिलसिला षुरू हुआ चढ़ाई का दोनों तरफ दुकाने खड़ी चढ़ाई , पैदल यात्री एवं घुड़सवार एक ही रास्ते पर चल रहे थे। खच्चरों पर सिर्फ सामान उपर से नीचे लाया ले जाया जा रहा था। चढ़ाई की षुरूआत के एक डेढ़ किलोमीटर तक घनी बस्ती थी दोनों तरफ मेवों एवं पूजा सामग्री की दुकानें थी। साथ ही होटल ,ं कोल्ड ड्रिक एवं पानी बाटल की ढेरों दुकानें थी। करीब दो किलोमीटर के बाद दुकाने कुछ कम हो गई फिर भी हर एक किलोमीटर पर रेस्टोरेंट उपलब्ध थे। रास्ते में जगह-जगह टीन षेड भी बने हुए थे। घोड़ों के चारे एवं पानी की व्यवस्था भी अच्छी दिखी। रास्ते के कुछ भाग पर तो टीन के लंबे षेड भी लगे हुए थे। हेलीकाप्टर से भी दर्षन हेतु ऊपर जाया जा सकता है, जाने एवं आने का किराया भी 750 रू ही है लेकिन इसकी पहले से बुकिंग आवष्यक है। हेलीकाप्टर की उड़ान भी अच्छी लग रही थी हम ने उड़ते हेलीकाप्टर को अपने कैमरे में कैद कर लिया। छः किलोमीटर की चढ़ाई के बाद आता है अर्धकुमारी, घोड़े से चढ़ने वाले यहां नहीं रूकते लेकिन पैदल यात्री यहां विश्राम कर ही आगे बढ़ते हैंें। अर्धकुमारी में रूकने एवं खाने की अच्छी व्यवस्था है। जाते समय हम यहां नहीं रूके लेकिन वापसी की पैदल यात्रा में हम सभी ने यहां आधा घण्टा विश्राम किया। कठिन हेयर पिन मोड़ों पर घोड़े का चढ़ना रोमांचक रहा पहले कभी मैनें घोड़े पर बैठ इतनी दूरी तय नहीं की थी, घोड़े सिद्धस्थ थे लेकिन फिर भी कुछ डर तो लग ही रहा था। ‘‘सांझी छत’’ पर हेलीपेड बना था, वहां से हेलीकाप्टर की उड़ान एवं हेण्डिंग भी कम आकर्शक नहीं थी। रास्ते में एक स्थान पर हम सभी एक बार फिर मिले एव ंहम सब ने साथ में चाय नाष्ता लिया। दुर्गम पहाड़ियों के बीच से बने रास्तों से होते हुए हम माता वैश्णोदेवी के दरबार में पहुंच ही गए। अर्धकुमारी से मंदिर तक के लिए इलेक्ट्रिक आटो की भी सुविधा उपलब्ध है, लेकिन घोड़े से चढ़ाई चढ़ने का अलग ही रोमांच है। मंदिर क्षेत्र में भी खाने-पीने की ढेरों दुकाने है, लेकिन यहां पर सामानों का रेट आसमान छूता दिखा , श्रद्धालुओं की मजबूरी का फायदा दुकान वाले उठा रहे थे। रजिस्ट्रेषन टिकिट पर एक काउंटर पर मोहर लगाई गई। यहां जूते एवं चप्पल रखने के लिए लाकर उपलब्ध है, ध्यान रहे यहां से आगे पानी की बाटल या पेन तक ले जाना मना है, इसलिए इन सामग्री को लाॅकर में ही रख देना उचित रहेगा। चेकिंग के बाद हम सभी लाइन में लगे आगे पुनः चेकिगं से गुजरना पड़ा , भीड़ थी किंतु इतनी भी नही की परेषानी होती। बिना किसी धक्का मुक्की के हम लोग देवीदर्षन हेतु गुफा के द्वार तक पहँुच गए। संगमरमर के पत्थरों से सजी इस गुफा के सिरे पर माता वैश्णोदेवी का दर्षन करना एक अनूठा अनुभव रहा। हम सभी ने बड़े ही आराम से दर्षन किये एवं गुफा से बाहर आ बरांडे में हम सभी ने विश्राम किया। यहां से पर्वतों का अद्भुत नजारा दिख रहा था। मेरी माता वैश्णोदेवी के दर्षन की कामना पूरी हो चुकी थी इसका मुझे विष्वास ही नहीं हो रहा था। 

         छोटे बच्चों के साथ भैरंो बाबा के दर्षन करने जाना संभव नहीं था, वहां पैदल एवं घोड़े से जा सकते थे, बृजेष एंव दीपक भेंरोबाबा के दर्षन के लिए निकले , मेरे सास-ससुर को हमने घोड़े उपलब्ध करवा दिये अब हम छोटे-बड़े पंद्रह सदस्य, 14 किलोमीटर से अधिक के पैदल सफर पर रवाना हो रहे थे। बच्चों में असीम उत्साह थ जय माता दी के उद्धोश के साथ ही हमने अपनी डगर पर कदम बढ़ाये, पैदल यात्रा बड़ी ही रोमांचक थी प्रकृति काजो नैसर्गिक सौन्दर्य हम घोड़ों के सफर में नहीं देख सके थे उनको निहारना एक अविस्मरणीय अनुभव था। बादल, सत्यदीप एवं खुद मैं भी कैमरे में सारे दृष्यों को कैद करते जा रहे थे। मेरे छोटे बैटे संस्कार ने दिव्यांष  को करीब आधा किलोमीटर पीठ पर लादकर चलाया, रास्ते में रूककर हमने चाय बिस्किट भी लिए कुछ देर विश्राम भी किया। घोड़ों एवं पैदल यात्रियों के लिए रास्ते में बेरीकेट्स लगा अलग-अलग चलने की व्यवस्था भी थी। सीढ़ियो से भी कई जगह आने जाने की व्यवस्था थी। सीढ़ियों का रास्ता संक्षिप्त जरूर लगा पर इसमेंथकान ज्यादा होती है। रचना को चलने में परेषानी होने लगी, अब उसे थोड़ी-थोड़ी देर में बैठना पड़ रहा था। बच्चे ज्यादा थे एवं में अकेला पुरूश सदस्य दल में बचा था उपर से अंधेरा भी होने लगा था, अंधेरे मेें सामने से एवं पीछे से आने वाले घोड़ों की टक्कर का डर बराबर बना हुआ था, दूरियां बड़ी ही मुष्किल से कट रही थी , बच्चे भी थकने लगे थे रचना अब बड़ी मुष्किल से चल पा रही थी । हमसे गलती हो चुकी थी हमें उसे घोड़े से ही नीचे भेजना था। थकान सभी के अर्धकुमारी के बाद का सफर तय करते समय एक-एक कदम बड़ी ही मुष्किल से उठ रहा था। रास्ते में ही दीपक से फिर मुलाकात हो गई वह भैरो बाबा के दर्षन कर घोड़े से वापस आ रहा था, उसने बताया बृजेष पैदल आ रहा है। ईषा को हमने दीपक के साथ भेज दिया। अब लाईट से जगमगाती दुकानों का सिलसिला षुरू हो चुका था लगा मानों हम नीचे उतर चुके हैं, थकान के मारे बुरा हाल था, रास्ता था कि खतम होने का नाम ही नहीं ले रहा था, मैने एक जूस की दुकान पर रखाी बेंचों पर बैठने का निणय लिया, रचना अभी भी काफी पीछे ही थी, हम सभी नीबू एवं सोड़े की सिकंजी पी रहे थे, रचना भी आ चुकी थी एवं वह भी अब आराम कर रही थी। लगभग एक घण्टे के विश्राम के बाद हम फिर अपने सफर पर निकल पडे़, भीड़ भरे बाजार से गुजरकर आखिरकार हम निकासी द्वार पर आ ही चुके थे । जहां हमारे सास-ससुर जी हमारा इंतजार कर रहे थे, दीपक एवं ईषा भी वहां पहले से ही थे, बृजेष बस नहीं था क्योंकि उसे भैरो बाबा के दर्षन कर पैदल आना था। वापसी में आटो का मिलना कठिन हो गया, आटोवाले मनमाना पैसा मांग रहे थे , तिस पर भी आॅटो नहीं मिल रहे थे। में एवं दीपक आटो खोज रहे थे एवं यहां रचना की तबियत खराब हो गई, मेरी पत्नी कविता उसके पास थी बड़ी मुष्किल से उसे हमने उसी अवस्था में आॅटो में बिठाया एवं लाज पहुचे । रचना को दवाई दी गई अब उसकी तबियत सामान्य थी बाकी सब भी ठीक थे, आष्चर्यजनक रूप से बृजेष हम सभी से पहले लाॅज पहुंच चुके थे एवं स्नान कर आराम कर रहे थे। बच्चे तो आते साथ ही बिना खाना खाये सो गए , मम्मी-पापा ने भी खाना खाने से मना कर दिया, कविता रचना के पास थी। मैं भावना, अर्चना,दीपक और प्रतिभा पास के ही रेस्टोरेण्ट में खाना-खाने गए। खाना अच्छा था पर थकान के कारण किसी से भी ठीक से खाना नहीं खब पाया हम तीन प्लेट खाने की पार्सल तैयार करवा के भी ले आये। अब हम लाॅज में थे एवं मुझे भी नींद आ रही थी।

एक जून की सुबह मैं पांच बजे ं प्रातः कालीन भ्रमण पर निकला हुआ था, सबसे पहले मैने एक ठेले पर चाय पी एवं एस.बी.आई. के ए.टी.एम. की जानकारी प्राप्त की करीब एक-डेड़ किलामीटर के मार्निंग वाक के बाद मेनें एटीएम से पैसा निकाला एवं कटरा की सड़कों पर घूमता हुआ लाॅज पहंुचा। रास्ते में बहुत सारे टेªवल ऐजेण्टों के आफिस थे। हमारे लाॅज का मालिक भी टेªवल एजण्टों के संपर्क में था उसने कल ही मुझे  एवं दीपक से श्रीनगर टूर की बात कर ली थी एवं उन्होनें 42 हजार रूपये में तीन रात एवं दो दिनों का कष्मीर टूर हमें आफर किया। व्यक्ति विष्वसनीय लगे इसलिए हमने सहमति दे दी, मेमेण्ट के समय उन्होनें खुद दो हजार कम कर हमारा टूर 40 हजार में फाइनल कर दिया एवं हमने उन्हें 20 हजार रूपये अग्रिम दिये जिसकी उन्होनें हमे रसीद भी दी। षेश 20 हजार हमें अपने भ्रमण मेें 3 किस्तों में उन्हें देना था । हमारा कटरा से सुबह 8 बजे निकलने का कार्यक्रम था। कटरा के लाज में कराई गई मालिष का उल्लेख ना करूं तो कटरा का भ्रमण पूरा नहीं लगेगा। सुबह के छः बजे वह 18-20 साल का स्मार्ट युवक मुझसे मिला उसने जीन्स-टीषर्ट एवं स्पोर्ट षू पहन रखे थे। थक गये होंगे सर मालिष करवा लें जो मर्जी हो दे देना, मैनें पूंछा पहले बताओ कितना लोगे,  पहले करवा लो साहब फिर जो मर्जी हो दे देना। वैश्णोदेवी की चढ़ाई के कारण पैर तो दुख ही रहे थे उस पर से मेरे सभी साथी अभी भी सो रहे थे। मैने मालिष कराने का निर्णय लिया, उसने मुझे बराण्डे में एक लुंगी बिछा कर लिटाया एवं मालिष षुरू की उसके सिद्धस्थ हाथ सरसों के तेल से मालिष कर रहे थे। मेरी पिंण्डलियों के दर्द को कुछ राहत मिल रही थी। पापाजी भी उठ चुके थे मैनें उनसे भी कहा वो भी तैयार हो गए , उनकी अच्छी मालिष के बाद मेरे छोटे बेटे संस्कार ने मालिष करवाई। एक स्मार्ट नव युवक मालिष के इस व्यवसाय को अपना सकता है, आष्चर्य लगा। मैनें उसे 100 रू दिये उसने 50 रूपये और मांगे मैंने 20रू और दे दिये  वहं राजी खुषी वहां से विदा हुआ। बाजार में भीड़-भाड़ हो चुकी थी हम  सब हल्के चाय नाष्ते के बाद श्रीनगर जाने को तैयार थे साढ़े आठ बच चुके थे, हम अपनी योजना से आधेघण्टे देर से चल रहे थे। लेकिन निकलते-निकलते सुबह के नौ बज ही गये। कुछ त्यौहार था इसलिए हर पांच किलोमीटर पर कष्मीरी रहवासी पानी-सरबत एवं परसाद के दौनें दे रहे थे। कष्मीर में हम लोगों का स्वागत कुछ इस प्रकार होगा हमने कभी सोचा भी नहीं था। हम लोग एक 12 सीटर मिनी बस एवं एक टवेरा में थे। कष्मीर की सुन्दर वादियों की षुरूआत ‘‘पटनीटाप’’ से ही हो जाती है। पटनीटाप में कोणधारी वन दिखने लगे, यहां के सुन्दर गार्डन एवं नजारों ने मन मोह लिया। हम सभी थके हुए थे इसलिए पार्क में ज्यादा घूमने की स्थिति में नहीं थे , लेकिन बच्चों ने यहां भी घुड़सवारी की। मौसम बदलने लगा था ठण्डी हवाओं के झोंके इस बात का अहसास कराने लगे थे कि हम कष्मीर की सुरम्य वादियों में प्रवेष कर रहें हैं, मेरा कवि मन कविता लिखने को आतुर था। हमारा काफिला अपने गंतव्य को रवाना हो चुका था मैं मिनी बस में था, बच्चों ने फिल्मी गीतों की मानों झड़ी ही लगा दी थी। कुछ सदस्य आंखे भी बंद कर रहे थे लेकिन प्राकृति के सुन्दर नजारों को देखने की जाह उन्हें सोने नहीं दे रही थी। चिनाब नदी के किनारे-किनारे मीलों तक का सफर, गहराई में हिलोरे मारती चिनाब एवं उसके किनारे बसी बस्तियां बरबस ध्यान आकर्शित कर रही थी। पहाड़ों एवं घाटी का कठिन जीवन साफ दिखाई दे रहा था, पहाड़ों पर बने कष्मीरी घर, पहाड़ी की चोटी से घाटी का नजारा एवं वहां बने टीन की छत वाले घर बरबस आकर्शित कर रहे थे। कभी-कभी तो आष्चर्य होता था ये पहाड़ की ठलानों पर बने अपने घरों  तक पहुंचते हैसे होंगे। एक डेम के नजारे को हम कभी नहीं भूल सकते, वापसी में हमने इसके ठीक सामने बने रेस्टोरेंट में खाना खाया था। लगभग 3 किलोमीटर लंबी जवाहर टनल का सबको इंतजार था, षाम हो चुकी थी सूरज क्षितिज में जाकर कहीं छुप चुका था , हमारी दोनों गाड़िया ओग-पीछे जवाहर टनल में प्रवेष कर रही थी।
श्रीनगर पहुचते-पहुंचते रात के दस  बच चुके थे , लाॅज पहले से बुक था इसलिए परेषानी नहीं हुई। डल झील के पास स्थित रूमा लाॅज अच्छा निकला, सुन्दर कारपेट से सजे इस लाॅज में  गरम पानी की व्यवस्था के साथ अटेच लेट-बाथ की सुविधा थी। हम सभी को पूरे सामान के साथ अपने-अपने कमरों में जाने में आधे घण्टा से ज्यादा लग गया । समय ज्यादा हो गया था, लाॅज का रेस्टोरेण्ट बंद हो चुका था, लेकिन हमें बहुत ही अच्छा षाकाहारी होटल लाॅज के बगल में ही खुला मिल गया, रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे  फिर भी हमें अच्छा-खासा खाना मिल गया। हम सब सोने जा रहे थे सभी को सुबह का इंतजार था कल हम श्रीनगर एवं उसके आस-पास घूमने जाने वाले थे।

2 जून 2012 की सुबह पांच बजे मेरी आंख खुली, कष्मीर की खबसूरत वादियाँ श्रीनगर के लाॅज की इस खिड़की से मुझे आमंत्रित कर रही थी। मेरे कमरे में मेरे साथ सो रहे सभी बच्चे अभी भी गहरी नींद में थे, मैं तीसरी मंजिल से नीच उतरा और अपने प्रातःकालीन भ्रमण पर निकल पड़ा। दूर-दूर तक फैली पर्वत श्रृंखलाओं  की चोटियों पर जमी बर्फ मुझे अपनी ओर आकर्शित कर रही थी, डल झील के पास ही लगी एक नहर में भी हाउस बोट खड़ी हुई थी, उसी से लगा एक पार्क भी था। मैने पार्क का एक चक्कर लगाया एवं हलकी एक्सरसाईज भी की, वैश्णोदेवी की थकान अब मिट चुकी थी, अनजान सड़कों पर मै आजुबाजू के घरों एवं दुकानों को ध्यान से देखते हुए आगे बढ़ रहा था। एक ठेले पर मैनें चाय पी एवं हिन्दी एवं उर्दू  के स्थानीय समाचार पत्र खरीदे। मुझे हांलाकी उर्दू नहीं आती लेकिन मै जानना चाहता था यहां के उर्दू मीडिया के ख्याल कष्मीर समस्या पर किस प्रकार के है। कटरा से श्रीनगर तक के सफर में जो अमन-चैन मुझे दिखा वह मुझे हमेषा याद रहेगा, सांम्प्रदायिकता तो वहां मुझे लेष मात्र भी नजर नहीं आ रही थी। श्रीनगर वाले पर्यटकों का बड़ा सम्मान करते हैं, सुबह के भ्रमण में मैने कितने ही लोगों से रास्ता पूछा सभी ने अपेक्षित सहयोग दिया। कष्मीर घाटी के मकानों का विषेश आर्कीटेक्ट मुझे आकर्शित कर रहा था। मैं श्रीनगर आते समय बस की खिड़की से भी लगातार बाहर घरों को छतों को देख रहा था एवं केनान के 18 मेगा पिक्सल कमरे से उनके फोटो खींच रहा था, सुन्दर आकर्शक डिजाईन में टीन की चादर से बनी छतें जिनको कि आकर्शक रंगों से पोता गया था। इतना तो तय था भूकंप की पट्टी पर होने के कारण यहां के घर हलकी निर्माण सामग्री से बनाये जाते हैं वहीं बर्फ ना जम सके इस लिए टीन की सीट को ठलवा सेप दे छत बनाई जाती है। मुझे स्लेब वाले घरों दुकान, होटल यहां तक की मल्टी स्टोरी बिल्डिंग पर की छत पर भी लकड़ी का फ्रेम लगा कर टीन कीे आकर्शक छत बनाना श्रीनगर एवं घाटी की विषेशता दिगी। विचारों की श्रृंखला को विराम देते हुए चाय ठेले वाले से एक और चाय मांगी, दूसरी चाय पीते हुए मैने स्थानीय हिन्दी पेपर के मुख्य-मुख्य समाचार पढ़ डाले, मैं जानना चाहता था कि आम कष्मीरी षेश भारत वासियों को किस नजर से देखते हैं, उनके सामान्य व्यवहार से मुझे बड़ा ही संतोश मिला। मैं टहलते हुए वापस अपने लाॅज आ चुका था, मेरे साथी भी उठना षुरू हो गए थे, मैं एक बार सभी कमरों में गया एवं सब के हाल-चाल जाने सब ने आधा घण्टे में तैयार हो जाने का भरोसा दिलाया, साढ़ेआठ-पौने नौ के आस-पास हम सब लाज के बाहर थे, बच्चे कैमरों से फोटो खींचने लगे थे, हमारे दोनो ड्रªाइवर अपने-अपने वाहनों की सफाई कर रहे थे। हम सभी रोमा लाॅज के ठीक बाजू में स्थित एक हाॅटल में आलू के परांठों का आर्डर दे रहे थे, दिनभर घूमना था इसलिए हेवी ब्रेकफास्ट जरूरी था। एक परांठा बीस रूपये का था , साथ में अचार एवं दो प्रकार की सास, दही मांगे जाने पर उसने अमूल दही का हुआ डिब्बा दिया जिसका कि अलग से भुगतान करना था। नास्ता अच्छा था बच्चों ने चाऊमिन का भी लुफ्त उठाया, सभी ने इत्मिनान से एक-एक चाय पी , अब हम आज के श्रीनगर भ्रमण के लिए तैयार थे।  

टवेरा एवं मिनी बस में सवार हो हम सभी श्रीनगर की सड़कों पर निकल चुके थे, हमारा पहला पड़ाव षंकराचार्य मंदिर था। मैनें मिनीबस के ड्राइवर से लाल चैक के विशय में बात कि, ‘‘क्या लाल चैक’’ भी ले जाओगे। वहां भीड़ होती है एवं पार्किगं की समस्या है, अभी नहीं लेकिन आप कहेंगे तब हम वापसी में लाल चैक होते हुए लाॅज आ जायेंगे। मैं उग्रवादी घटनाओं के साक्षी बने उस लाल चैक को करीब से देखना एवं उस समय के दर्द को महसूस करना चाहता था, पर मैनें जिद्द नहीं की क्योंकि सब जल्द से जल्द डलझील में नौका विहार करना चाहते थे। हम सभी डल झाील के पास निकल रहे थे , झील का सुन्दर नजारादेखते ही बनता था। षिकारे एवं हाउसबोट इस नजारे मैं चार चांद लगा रहे थे। हम षंकराचार्य मंदिर जाने के लिए चेक पोस्ट पर रूके , इसी बीच रेलिंग के पास खड़े हो हमने डल झील को जी भर कर निहारा एवं कैमरे में उन स्मृतियों को हमेषा-हमेषा के लिए सुरक्षित कर लिया। षंकराचार्य का मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है, जहां जाने के लिए सकरी सड़क है। मंदिर के पास पार्किंग की सुविधा है, लेकिन जाम लग जाने के कारण हमें लगभग आधा किलोमीटर पहले ही वाहनों से उतरना पड़ गया। मंदिर तक पहुचने के लिए भी खड़ी चढ़ाई थी । सीढ़ियाँ सीधी थी उनमें मोड़ कम ही थे, मंदिर के पास से श्रीनगर का विहंगम दृष्य दिखाई पड़ रहा था, मानों इस पहाड़ी के चारों तरफ श्रीनगर को बसाया गया हो। डलझील किसी नगीने के समान दिखाई दे रही थी। कहते है डलझील की परिसीमा 90 किलोमीटर से भी ज्यादा है।षंकराचार्य का अध्ययन स्थल एक छोटी सी गुफा को देखना अच्छा लगा, पूरे श्रीनगर एवं हिमाच्छादित पर्वत श्रंृखलाओं को इस पहाड़ी से देखना  अद्भुत था। हमारा अगला पड़ाव श्रीनगर के उद्यानों का भ्रमण था, इस कड़ी में हम जा रहे थे ‘‘चष्मे षाही’’। पहाड़ी चष्में (झरने) से निकलते षीतल स्वच्छ पानी से बने कुण्ड के सामने बने इस उद्यान का बड़ा महत्व है, इसका पानी गंगा के समान ही पवित्र माना जाता है, सभी पर्यटक इसका पवित्र पानी पी रहे थे साथ ही अपने परिवार एवं मित्रों के लिए बाॅटलों में इकट्ठा कर ले भी जा रहे थे। झरने के पानी से बनी सुन्दर नहर बाग की षोभा बड़ा रही थी, वहीं बड़े-बड़े बोन्साई बरबस ध्यान खींच रहे थे। यहां कष्मीरी छात्राओं के एक समूह से मिलना एवं उनके साथ फोटो ख्ंिाचाना अच्छा लगा। बच्चों ने उनसे बात-चीत भी की। पार्किंग से लगा बाजार कष्मीरी वस्तुओं एवं खाने पीने के सामानों से अटा पड़ था। हमारा अगला मुकाम था षालीमार बाग , टिकिट कटा कर हम सभी ने बाग में प्रवेष किया, दीपक गाड़ी में ही आराम करना चाह रहे थे इसलिए वे बाहर ही रूक गये। लंबे चैड़े क्षेत्र में फैले इस बाग में पेड़-पौधों की बहुत सा किस्में दिखाई दे रही थी। हमने इस बाग में बहुत इंज्वाय किया, कष्मीरी पोषाक में सभी ने फोटो खिंचवाये, एक पोषाक का फोटोग्राफ के साथ किराया 150 रू था, मैं उनके फोटोग्राफर के साथ खुद भी फोटो खींच रहा था। यहां रायपुर में कार्यरत एक बैंक अधिकारी  के परिवार के साथ मुलाकात हुई, उनके साथ मिलना सुखद रहा, उनके साथ उनकी पत्नी एवं डाॅक्टर बेटी भी साथ थी। बच्चों की धमाचैकड़ी एवं खेल-कूद से मानों बाग में जान आ गई थी, समय की कमी ने हमें वहां से विदा लेने को मजबूर कर दिया अब हमारा अगला पड़ाव था डल झील जिसका सब को बेसब्री से इंतजार था।षालीमार बाग के सामने आ कर हमने कष्मीरी पोषाक में खिंचाए फोटोग्राफ एक दुकान से प्राप्त कर लिए, खाने-पीने की ढेरों दुकानें थी इसलिए हम सब ने कुछ ना कुछ खालेने का निर्णय लिया। मैनें , कविता ,बादल एवं रचना ने खाने की थाली मंगवा ली बाकी लोग डोसा, चाउमिन, पुलाव इत्यादी खा रहे थे।

षालीमार बाग से हम पहुंचे कष्मीरी कपड़ों की एक दुकान पर कपड़े अच्छे किंतु मंहगे थे किसी ने भी खरीदी में विषेश रूची नहीं दिखाई, लेकिन बगल में स्थित मेवे की एक दुकान से सभी ने मेवे जरूर खरीदे, अब हमजा रहे थे डल झील। हमारे लाॅज की तरफ से डलझील जाने का एक और रास्ता था जहां से हमें हमारे गाईड ले कर गए, षिकारा का किराया तय करने के लिए कुछ बातचीत जरूर हुई पर आठ सौ पचास रूपये एक षिकारे की दर से हमने उन्हें किराय पर लिया। समय का कोई बंधन नहीं था हम जब तक चाहते इस नौका विहार का आनंद ले सकते थे। नाव चलाने वाला बहुत ही अच्छा गाईड साबित हुआ उसने डल झील की पूरी जानकारी हमें दी। झील के परले सिरे पर जमीन से लगे हुए हाउस बोट थे जिनके एक दिन का किराया 1500रू से 10,000 रू. तक था, लाईन से लगे हाउस बोट बड़े ही आकर्शक लग रहे थे। हमने निर्णय लिया अगली बार कभी श्रीनगर आये तब हाउस बोट में ही रूकेंगे।  एक बड़ा हाॅटल भी डलझील में षान से खड़ा था उसका बाग बड़ा ही आकर्शक लग रहा था। हमारी बोट के साथ सामान बेचने वाले स्थानीय लोगों की बोट भी चल रही थी। हमने फ्रूट सलाद खाया साथ ही केसर भी खरीदा। तैरता हुआ पूरा का पूरा बाजार डल झील की विषेशता थी, सैकडों आकर्शक दुकानें झील में सजी हुई थी हम लोगों ने भी दुकानों से कुछ खरीददारी की , डलझील के बीचोंबीच था ‘‘नेहरू उद्यान’’ यहां का अलग टिकिट लगा, हम टिकिट कटा कर बाग में पहुचे यहां हमने फोटोग्राफी की साथ ही यहां के वाटर गेम्स का भी आनंद लिया। मैनें एवं बृजेष ने वाटर सर्फिंग भी की। पूरी झील मानों एक नगर के समान थी इसमें जगह-जगह आईलेण्ड पर यहां के रहवासियों के घर थे जहां से ये सिर्फ नाव के द्वारा ही झील से अंदर बाहर आ सकते थे। नाव बनाने का कारखाना भी झील के अंदर ही था, वहीं पानी पर की जाने वाली खेती ने सब से ज्यादा आकर्शित किया, पानी पर पहले तैरने वाली घ्ंाास उगाई जाती है एवं फिर उस पर टमाटर इत्यादी सब्जियों की खेती होती है। अब हमारा षिकारा झील से बाहर की ओर जा रहा था हमने एक तैरते रेस्टोरेंट से काफी ली एवं गरम काफी का आनंद लेते हुए झील को जी भरकर निहारा, मन तो नहीं हो रहा था कि झील से बाहर निकलें पर षाम हो चुकी थी, महिलाओं को खरीदी भी करनी थी। हम षाम टलते-टलते अपने लाॅज पहुंच चुके थे। लाॅज में विश्राम करने का मन नहीं हुआ, मैं अकेला ही लाॅज से निकला षाम के सात से ज्यादा बज चुके थे मै एक बार फिर पैदल ही श्रीनगर की सड़कों पर टहल रहा था, श्रीनगर की जीवन षैली को समझने के लिए 2-3 दिन का समय कम था लेकिन एक जिज्ञासा तो थी ही, श्रीनगर वासियों ने उग्रवाद के साये में बहुत दिन गुजारे थे, अब उनका जीवन षांत एवं उल्लास मय लगा, श्रीनगर के बाग-बगीचों एवं डलझील मे स्थानीय पर्यटकों विषेशकर षालेय विद्यार्थियों की उपस्थिती उत्साहवर्धक लगी। सड़कों पर भी पर्यटक घूमते दिख रहे थे, दुकाने सजी थी लोग खरीददारी कर रहे थे, मेरी धर्म  पत्नी एवं उसकी बहने भी आज इकट्ठी हो पैदल ही पास के बाजार में खरीददारी करने गई थी, एक लंबे वाक के बाद रास्ता पूंछते हुए मैं लाॅज तक पहुंच चुका था, लाज के बाहर ही अन्य साथी भी मिल गए, हमने एक बार फिर उसी हाॅटल में खाना-खाने का निर्णय लिया जिसमें पहले खाना खा चुके थे। आज उसने अच्छा खाना परोसा सभी ने पूरे उल्लास के साथ भोजन का आनंद लिया, कल हमें बड़ी सुबह गुलमर्ग के लिए निकलना था, देर हो जाने पर गुलमर्ग के गोण्डोला का टिकट नहीं मिल पाता है ऐंसी जानकारी हमें बहुत से लोगों से मिल चुकी थी, सभी ने सुबह पांच बजे उठ कर 6.30 बजे तक तैयार हो जाने का निर्णय लिया एवं श्रीनगर में दूसरी रात गुजारने हम सभी अपने-अपने कमरों की और निकल पड़े।
3 जून की सुबह बर्फ पर खेलने एवं दुनिया के सबसे ऊंचाई तक ले जाने वाले गोण्डोला पर बैठने की चाहत में बच्चे एवं बड़े सभी समय से पहले ही तैयार थे। अभी तक लाॅज के बगल का रेस्टोरेण्ट भी नहीं खुला था, सुबह के 7 बजे हमने लाॅज छोड़ दिया एवं गुलमर्ग के लिए निकल पड़े। गुलमर्ग के रास्ते में हमें टिपिकल श्रीनगरी आर्कीटेक्ट से बने सुन्दर घर देखने को मिले, टीन की छतों को बड़े ही करीने से संवारा गया था, हर घर सुन्दरता में दूसरे से टक्कर लेता मालुम पड़ रहा था, रास्ते के ही एक रेस्टोरेंट में हमने चाय बिस्कुट का नास्ता किया। गुलमर्ग की पहाड़ियों पर चढ़ने के पहले ही , हमारी गाड़ियां एक स्थान पर रूकी यहां सभी के कए गरम कपड़े किराये से मिलते हैं, हम सभी के पास पर्याप्त गरम कपड़े थे फिर भी हम सभी ने वहां से अतिरिक्त कपड़े ले ही लिए, साथ में बरफ पर चलने के लिए गम बूट भी दिये गये। एक जोड़ी कपड़े का किराया 150 रू था जिसे हमने अग्रिम भुगतान कर दिया। सुंदर पहाड़ी रास्ते से होते हुए हम गुलमर्ग की बर्फीली वादियों  की ओर जा रहे थे, दूर-दूर तक बर्फ से ढकीं पहाड़ी चोटियां दिखाई दे रही थी। हमें  गुलमर्ग के बसअड्डे पर उतारा गया, पता चला यहां से , एक किलोमीटर या तो पैदल जाना पड़ेगा या घोड़े पर , फिर वहां से पहाड़ी पर जाने वाला रोप वे अर्थात यहां की भाशा में गुलमर्ग गोण्डोला मिलेगा। घोड़ों पर चढने को काई तैयार नहीं था, अतः हम सभी पैदल ही निकल पड़े नीचे अच्छी खासी गर्मी थी उपर से गरम कपड़ों का बोझ। सड़क पक्की थी ,बहुत सी गाड़ियां वहां आ-जा रही थी , पता नहीं हमारे गाड़ी वाले ने हमें एक किलोमीटर से ज्यादा का पैदल मार्च क्यों करा दिया। बहरहाल एक व्यक्ति को एक आईडी पर पांच से ज्यादा टिकट नहीं मिल रहे थे गनीमत थी मेरे पास तकरीबन सभी के आईडी की फोटो कापी थी। हमें टिकिट मिल गये अब हम गोण्डोला राईड के लिए लाइन में लगे थे एक टिकिट 300रू का था। हमारा नम्बर जल्द ही आ गया,  रोमंाचक राईड हमें हरे भरे पर्वतों के बीच से ले जा रही थी। हमने देखा कुछ लोग पगडंडियों से पैदल भी उपर जा रहे थे। मुष्किल से दस मिनिट की इस राईड ने हमें दूसरे गोण्डोला स्टेषन तक पहुचा दिया, यहां से बर्फीली पर्वत श्रृंखलाओं को करीब से देखा जा सकता था किंतु बर्फ अभी भी दूर ही थी, पर्यटकों की लाईन पहाड़ी चैटी तक ले जाने  वाली गोण्डोला राईड के लिए लगी थी। टिकिट के लिए इस लाइन में हमारे आगे, दो-तीन सौे लोग लगे हुए थे। हम भी लाईन में लग गये, दो घण्टे तक लाईन में लगे रहने के बाद भी हमारा नम्बर नहीं आया, गार्ड की ड्यूटी करने वाले कर्मचारी खुलेआम ब्लैक में टिकिट बेच रहे थे जिसे देख कर लाईन में लगे लोगों ने विरोध किया एवं विवाद की स्थिति खड़ी हो गई। 5-6 नवयुवकों का समूह सिर्फ टिकिट की कालाबाजारी में ही लगा था आष्चर्य तो तब हुआ कि उन्हें सुरक्षा कर्मियों का संरक्षण मिला हुआ था, मन खट्टा हो गया। लगा इतनी दूर आकर भी बर्फीली चोटियों  को छुए बिना ही जाना पड़ेगा। घोडे़ वाले भी सक्रिय थे वे नजदीक की बर्फीली पहाड़ियों तक ले जाने का 800 रू मांग रहे थे। भाग्य से हमें दूसरी राईड का टिकिट मिल ही गया एक टिकिट की कीमत 500 रू थी। गजब के उत्साह ने थकान को मिटा दिया। यहां का मौसम गरम तो नहीं था पर ज्यादा ठण्ड भी नहीं थी। बर्फीली पहाड़ी चोटियों तक ले जाने वाले गोण्डोला राईड पर हम सवार हो चुके थे, एक रोमांचक अनुभव हमारा पग-पग पर इंतजार कर रहा था। अब हमारे चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी यका-यक हमें ठण्ड भी लगने लगी थी जैसे-जैसे ऊपर जा रहे थे ठण्ड बढ़ती ही जा रही थी। अब हम गोण्डोला स्टेषन पर उतर रहे थे बर्फीली हवाओं के कारण ठण्ड से हाल बुरा हो गया था। गरम मौसम से पल भर में बर्फीली चोटियों पर आ जाने के कारण हमारा षरीर माहौल से अनुकुलन नहीं कर पा रहा था। जैसे ही हम टीन षेड से बाहर निकले हवाओं की गति और तेज हो गई हम बड़ी ही मुष्किल से बर्फीली पहाड़ियों पर चल पा रहे थे, बर्फ पर खेलने का जब सिलसिला षुरू हुआ तो कुछ ठण्ड से राहत मिली वहीं बीच-बीच में सूर्य देवता के दर्षन हो जाने से हवा भी गरम हो जाती थी। दूर-दूर तक सिर्फ बर्फीली पर्वतमालाओं के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दे पा रहा था, हम इन दृष्यों को अपने कैमरे में सहेज रहे थे। मेरे बेटे संस्कार का ठण्ड के मारे बुरा हाल था, दिव्यांष भी ठण्ड बरदाष्त नहीं कर पा रहा था, सत्यदीप, बादल , बिन्नी और यष खूब खेल रहे थे। मैनें और कविता ने भी बर्फ के गोलों को खूब एक दूसरे की तरफ उछाला। अब समय था वापस गोण्डोला स्टेषन पर जाने का , यहां भी लाईन थी, बर्फीली चोटियों से नीचे का नजारा और भी खूबसूरत दिख रहा था। पहली राईड के बाद हम दूसरी राइड के लिए भी लाईन में लगे थे। आज का मेरा दिन सिर्फ लाइ्रन में लग कर ही जाया हुआ, मुष्किल से एक धण्टे बर्फ पर खेलने के आनंद के लिए हम लोगों को से  चार-पांच घण्टे सिर्फ लाईन में ही खड़ा होना पड़ा । फिर भी हम भाग्यषाली ही थे जो आज बफीर्ली चैटियों तक पहुंच सके वरना तो आधे से ज्यादा पर्यटकों को निराष होकर ही जाना पड़ा। गोण्डोला राईड से हम नीचे आ चुके थे एवं खूबसूरत गोल्फ कोर्स के किनारे-किनारे घूमते हुए बस अड्डे अपनी गाड़ियों की तरफ जा रहे थे। यहां हमने साथ में लाए हुए नास्ते को खाया , आज सुबह के भोजन के लिए समय ही नहीं मिला ,ब्रेक फास्ट भी बिस्किुट एवं मिक्चर इत्यादी का ही होता रहा । आज हमारा श्रीनगर के संक्षिप्त टूर में अंतिम दिन था कल ही सुबह हम जम्मू के लिए निकल रहे थे। हल्का पानी गिरने लेगा था श्रीनगर आते -आते षाम हो गई मेरे कहने मिनी बस एवं टवेरा वाले ड्राइवर हमें लाल चैक से होते हुए लाॅज ले गए, लाॅज पहंुचकर  हमने भोजन कर ही विश्राम करने का निर्णय लिया, सिर्फ सामान इत्यादी को रखने हम लोग लाॅज में अपने -अपने कमरों में पहंुचे। पुनः उसी हाॅटल में हम रात्री भोजन ले रहे थे, अब तो वहां के वेटर भी हम सभी को पहचानने लगे थे। हमें सुबह जल्दी निकलना था इसलिए आज रात्री ही सामान पेक करना जरूरी था, गुलमर्ग की चर्चा एवं खाना खाते समय भी जारी रही , सभी सुबह जल्द तैयार होने को तैयार थे, श्रीनगर से हमारा अगला पड़ाव था अम्रतसर।
4 जून की सुबह जल्दी उठपाना संभव नहीं हो पा रहा था, मैं अपनी आदत के मुताबिक 5 बजे उठ चुका था, एक बार फिर मैं श्रीनगर की सड़कों पर सुबह-सुबह घूमना चाह रहा था। आठ बजे तक ही सब तैयार हो पाये, हमारी मिनी बस का एक टायर कच्ची मिट्टी में फंस चुका था, तिस पर वह टायर पंचर भी था। दोनों ड्राइवर मिनी बस को निकालने का प्रयास कर रहे थे, उन्हें टोचन के लिए गाड़ी लानी पड़ी ,गनीमत थी उसी टेªवल ऐजंेसी की एक बस मिल गई जिसने टोचन कर हमारी मिनी बस को बाहर निकाला , फिर टायर बदलने का काम षुरू हुआ, इस सब में सुबह 10 से ज्यादा बज चुके थे। इसी बीच हमने आलू के परांठों का हेवी ब्रेकफास्ट कर लिया था, एव ंहम सभी श्रीनगर से विदाई  ले रहे थे, यहां की मधुर स्मृतियां हमारे जहन में हमेषा बनी रहेंगी ऐसा मुझे विष्वास था। श्रीनगर से जम्मू के रास्ते में हमारी दोनों गाडियाँ अलग-अलग ही चलीं टवेरा के ड्रायवर की गलती के कारण दोनों गाड़ियों के साथियों की मुलाकात फिर सीधे जम्मू में ही हो सकी। श्रीनगर से निकलते ही मिनीबस के ड्राइवर ने टायर का पंचर बनवाया जो कि जरूरी था इसी बीच टवेरा के ड्रायवर ने अपनी गाड़ी नहीं रोकी एवं वह हमसे काफी आगे निकल गया, रास्ते भर हम सभी एक दूसरे की चिंता करते रहे। सफर षांति से गुजरा सभी षांत थे एवं आराम के मूड़ में थे इसलिए अधिकांष सफर में आंखे मूंदे ही बैठे रहे। पहली बार दोनों गाड़ियों के मुसाफिरों ने अलग-अलग जगह खाना खाया। हमने एक सुंदर डेम के सामने बने हाॅटल में वहां का स्पेषल राजमा-चांवल खाया , साथ ही डेम का सुंदर नजारा भी देखा,मेरे दोनों बेटे टवेरा में थे इसलिए खाने में भी विषेश मजा नहीं आया। जम्मू रूकने का कार्यक्रम हमारा नहीं था, जम्मू के बस अड्डे पर हमें अमृतसर जाने वाली बस लगी मिली, लेकिन थकान से मेरे बेटे संस्कार एवं ई्रषा को उल्टी होने लगी थी, लगातार सफर की थकान अब साफ दिखाई देने लगी थी। रास्ते में विषेश परेषानी नहीं गई , पंजाब में  प्रवेष करने के साथ ही हमारे मोबाईल काम करने लगे, करीब साढ़े ग्यारह बजे मैनें घर फोन कर अपने सकुषल होने की सूचना दी। उसी बस वाले ने हमें अमृतसर के दीपसिंह गुरूद्वारे के सामने उतारने  का 500 रू अतिरिक्त लिया, गुरूद्वारे के सामने ही चार मंजिला एक बड़ी धरमषाला थी जिसमें सुबह के 6 बजे हमें एक बड़ा हाॅल मिल गया जिसमें लेट-बाथ की अच्छी सुविधा थी। 
5 एवं 6 जून हमने स्वर्णमंदिर के दर्षन एवं अमृतसर भ्रमण के लिए नियत किया था, हमारी वापसी कीे ट्रेन हमें 7 जून की सुबह 8.30 बजे जालंधर केंट से पकड़नी थी जो कि अमृतसर से 100 किलोमीटर की दूरी पर था। हमें 6 जून की संध्या अमृतसर से निकलकर रात्री विश्राम जालंधर में ही करना था। रात किसी की नींद  पूरी नहीं हुई थी, अमृतसर दो दिनं रूकना था इसलिए जल्दबाजी भी नहीं थी इसलिए सभी  दो-तीन घण्टों के लिए सो गए, आराम से तैयार हम 10 बजे के बाद ही धरमषाला से निकले। बाहर ही एक अच्छी चाय की दुकान थी  जहां हमने चाय एवं बेकरी के बिस्किट खाये एवं अमृतसर की संकरी गलियों से होते हुए पैदल ही स्वर्णमंदिर की तरफ निकल पड़े। चंद्रधर षर्मागुलेरी की कहानी ‘‘उसने कहा था’’ का अमृतसर मुझे आज भी नजर आ रहा था, बस अब तांगेवालों की जगह आटोवालों ने ले ली थी , फिर सरल एवं सहयोगी जनों ने दिल जीत लिया था। गरमी ज्यादा थी करीब दो किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद हम स्वर्णमंदिर के द्वार पर थे। विषाल परिसर में फैले इस मंदिर की व्यवस्था देखते ही बनती थी, इतनी भीड़ के बाद भी किसी प्रकार की धक्का मुक्की यहां बिल्कुल नहीं दिखी। हमने एक काउंटर से निःषुल्क किताबें भी प्राप्त की, एक किताब थी श्री तेजा सिंह लिखित ‘‘गुरू नानक एण्ड हिस मिषन’’ एवं दूसरी थी बलविंदर सिंह जौड़ासिंधा लिखित ‘‘सरहिंद फतह का नायक बाबा बंदा सिंह बहादुर’’। पवित्र सरोबर के बीचोंबीच स्थित स्वर्ण मंदिर में गुरूग्रथ साहिब के दर्षन के लिए लंबीलाइन थी पर व्यवस्था इतनी अच्छी थी कि दर्षन में जरा भी परेषानी नहीं आयी। दर्षन के बाद हमने लंगर में भंडारा खाया, लंगर की व्यवस्था भी अभूतपूर्व थी प्रतिदिन हजारों लोगों का खाना परोसा जाता था वह भी बगैर किसी परेषानी के, स्वयंसेवकों ने सारी व्यवस्था अच्छे से संभाली हुई थी। गर्मी बहुत थी , यात्रा की थकान भी थी इसलिए हम सभी धर्मषाला की ओर चल पड़े। बृजेष , दीपक एवं पापाजी बाघा बार्डर जा रहे थे, मेरा इरादा कुछ विश्राम के बाद अमृतसर की गलियों में घूमने का था। रात का भोजन हमने पास के ही एक हाॅटल में किया। इस प्रकार हमारा अमृतसर का पहला दिन पूरा हुआ कल हमें अन्य गुरूद्वारे एवं मंदिर घूमने थे। मेरा इरादा किताब की दुकानों से कुछ किताबें खरीदनें का भी था।
6 जून की सुबह सभी आराम से उठे, लेकिन मैंें सुबह पांच बजे ही उठ गया था,जल्दी से स्नान कर मैं बड़ी सुबह ‘‘दीपसिंह गुरूद्वारे’’ में दर्षन के लिए चला गया, सुबह-सुबह गुरूद्वारे जाना मुझे बड़ा अच्छा लगा। महिलाएं खरीदादरी करना चाहती थी , साथ ही उन्हें कुछ और मंदिर भी जाना था। बच्चे धरमषाला में ही अपने मनोरंजन में व्यस्त थे। महिलाओं के लिए हमने आॅटो की व्यवस्था कर दी, बच्चों ने धरमषाला में ही नास्ता कर लिया। ब्रजेष, दीपक एवं पापाजी साथ ही सेविंग कराने निकले एवं तीन घण्टे बाद वापस आये। मैनें पुलिस के एक अधिकारी से किसी अच्छी किताब दुकान का पता पूंछा उन्होनें मुझे हालबाजार  के आजाद बुक डिपो का नाम सुझाया। मैं अम्रतसर के लेखकों की कुछ किताबे खरीदना चाहता था। रिक्षा वाला बड़ा ही भला व्यक्ति निकला उसने मुझसे जाने आने के 40 रू लिए । अम्रतसर की गलियों से निकलकर हम अब चैड़ी सड़को पर आ चुके थे , हालबाजार में किताब की बहुत सी दुकाने थी पर सभी मुझे नामी लेखकों की किताबें ही दिखा रहे थे। आजाद बुक डिपो में मुझे अम्रतसर के ही कुछ लेखकों की अच्छी किताबें मिली। श्री मनमोहन  जी का 1993 में निकला कविता संग्रह ‘‘मेरे में चांदनी’’, कमलेष षर्मा जो कि साऊथ हाल लंदन में रहती हैं का कविता संग्रह ‘‘साधना’’ एवं पुश्पा षर्मा का कविता संग्रह ‘‘समाज के कीड़े’’ मैनें खरीदे। पुश्पा जी से मेरी फोन पर बात भी हुई एवं मेनें उनसे अमृतसर की साहित्यक गतिविधियों की जानकारी ली एवं अपने नगर जगदलपुर की साहित्यिक गतिविधियों को उनके साथ साझा भी किया। धरमषाला आते आते दोपहर के दो बज चुके थे, जालंधर के लिए बसों की जानकारी हम सुबह ही पता लगा चुके थे। बच्चे मेरा इंतजार कर रहे थे, मैं उन्हें भोजन के लिए पास के एक हाॅटल में ले गया, हमारे वापस आने के कुछ ही देर बाद धीरे-धीरे सभी इकट्ठे होने लगे, अब हमे अपना सामान बांधना था। हमारा अगला पड़ाव था जालंधर। हमें जालंधर जाने के लिए एक ए.सी. बस मिल गई , बस आरामदायक थी , बच्चे एवं महिलाएं सामने बैठे थे हमलोग पीछे बैठे हुए थे, बच्चों ने गानों की झड़ी ही लगा दी एंसा लगने लगा मानों पूरी बस ही टूरिस्ट बस बन गई हो, दो घण्टे के इस आराम दायक सफर के बाद हम जालंधर केण्ट रेलवेस्टेष पहुच चुके थे। टेªन अगले दिन सुबह की ही थी इसलिए हमने प्लेटफार्म के वेटिंग रूम में ही रात गुजारने का निर्णय लिया, स्टेषन पर भीड़-भाड़ नहीं थी इसलिए रात अच्छी गुजरी पास के ही एक छोटे से हाॅटल में खाना खाया साथ ही अगले दिन सुबह के खाने के लिए आलू के परांठे एवं दही का आर्डर भी दे दिया, अगले दिन  ट्रेन रवाना होन के आधा धण्टा पहले ही हाॅटल वाले ने हमें हमारे भोजन का पार्सल उपलब्ध करवा दिया। अब 7 जून की सुबह साढ़ेआठ बजे हमें इंतजार था जम्मू तवी से चलकर दुर्ग जाने वाली सुपर फास्ट ट्रेन का।  प्लेटफार्म पर बोगियों की स्थिति दिखाने वाले डिस्प्ले की व्यवस्था नहीं थी अतः अंदाज लगा कर प्लेटफार्म पर खड़े होना था। हमने प्लेटफार्म पर ही नास्ता किया, एक बुक स्टाल से मैनें समाचर पत्र एवं मुन्षी प्रेमचन्द की अमर कहानियों की एक किताब खरीदी। ट्रेन समय पर ही आयी हमें बैठने में भी कोई परेषानी नहीं हुई, हमारी यात्रा अब अंतिम चरण में थी, रात को सब प्लेटफार्म पर ही सोये थे इसलिए किसी की भी नींद पूरी नहीं हो पायी थी, थोड़ी ही देर में सब सौ चुके थे। मेरे जिस मित्र से मैं आगरा एवं चक्की बैंक में जाते समय नहीं मिल पाया था, वह आगरा के स्टेषन पर मुझसे एवं कविता से बड़ी ही आत्मियता से मिला, उसके हाथ में हमारे लिए आगरे के पेठे का एक बड़ा डिब्बा भी था, हम दोनों ने सिर्फ फोन पर बात की थी पर हमने स्टेषन की भीड़ में भी एक दूसरे को आसानी से पहचान लिया। अर्चना षहडोल में उतर गई अब हमारा काफिला कम होने लगा था, बिलासपुर में भावना-बृजेष एवं उनका परिवार उतर गया, षेश हम सभी रायपुर में उतरे, एकता एवं सतीष हम लोगों का इंतजार कर रहे थे।  यहां से रचना को दूसरे दिन भिलाई जाना है, मैं उसी दिन षाम को सपरिवार जगदलपुर के लिए रवाना हुआ, दीपक एवं प्रतिभा भी दूसरे ही दिन गीदम रवाना हो गए। इस प्रकार श्रीनगर, वैश्णोदेवी एवं अमृतसर की यादों को समेटे हमारी यह यात्रा सुबह-सुबह जगदलपुर आ कर अपने मुकाम पर पहुंच गई।






Thursday, March 8, 2012

Bastar ka sahitya: उपन्यास- आमचो बस्तर, लेखक - राजीव रंजन प्रसाद समीक...

Bastar ka sahitya: उपन्यास- आमचो बस्तर, लेखक - राजीव रंजन प्रसाद समीक...: उपन्यास- आमचो बस्तर, लेखक - राजीव रंजन प्रसाद समीक्षा - शरद चंद्र गौड़ बस्तर के इतिहास संस्कृति एंव परम्पराओं का तानाबाना बुन उसे वर्तम...

उपन्यास- आमचो बस्तर, लेखक - राजीव रंजन प्रसाद समीक्षा - शरद चंद्र गौड़


उपन्यास- आमचो बस्तर,
लेखक - राजीव रंजन प्रसाद
समीक्षा - शरद चंद्र गौड़

बस्तर के इतिहास संस्कृति एंव परम्पराओं का तानाबाना बुन उसे वर्तमान की राजनैतिक, सामाजिक एंव आर्थिक समस्याओं से जोड़ते हुये राजीव जी ने एक अभूतपूर्व उपन्यास की रचना की है। ‘आमचो बस्तर’ ना सिर्फ एक उपन्यास है बल्कि बस्तर की ऐतिहासिक विरासत पर लिखा गया प्रमाणित दस्तावेज भी है।
उपन्यास कितना भी लोकधर्मी एंव जनपदीय क्यों न हो उसमें कल्पना के उड़ान की गुंजाईश बनी रहती है ............. राजीव जी ने अपने उपन्यास को कल्पना लोक से दूर ही रखा है। उपन्यास में ऐतिहासिक पात्र तो हैं ही वर्तमान समय के कितने ही पात्रों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं .........भू-विज्ञान के प्रोफेसर डाॅ. कुरैशी मुझे पढ़ा चुके है वहीं एक अन्य प्रोपेसर गौराहा जी आज भी कालेज में है। नक्सलवादी त्रासदी से जूझते बस्तर की विढ़म्बनाओं को रेखाकिंत करते समय लेखक ने घटनाओं को ज्यों का त्यों उतार लिया है, एक बारगी तो ऐसा लगता है कहंी हम नक्सलवाद पर ‘‘ रिपोर्ताज ‘‘ तो नहीं पढ़ रहे, लेकिन सचेत लेखक हमें फिर से उपन्यास के पात्रो से जुड़ने में सफल हो जाता है।
ऐतिहासिक घटनाओं का ताना-बाना बुनने में लेखक को अपार सफलता मिली है बस्तर के पठारी क्षेत्र का नाम दण्ड़कारण्य कैसे पढ़ा इसे समझाने के लिये लेखक राजगुरू मुनिवर शुक्राराचार्य की पुत्री अरजा एंव भारत वर्ष के प्रथम प्रतापी राजा इक्ष्वाकु प्रथम के पुत्र महाराजा दण्ड़ के प्रसंग का वर्णन करते है। शुकराचार्य के श्राप से ही महाराजा दण्ड़ का राज्य ‘‘ अरण्य ‘‘ में परिवर्तित हो जाता है, एंव दण्ड़कारण्य कहलाता है। इसी प्रकार लेखक पात्रों के माध्यम से इस क्षेत्र का बस्तर कैसे पढ़ा विचार करते हैं।
ईस्ट इंड़िया कम्पनी के कैप्टन जे.डी.ब्लण्टने 1795 में बस्तर में प्रवेश करने का प्रयास किया कांकेर रियासत के राजा शामंिसंह ने कैप्टन ब्लण्ट की अगुवाई की। कैप्टन ब्लण्ट ने पंड़ित विद्याधर तिवारी के माध्यम से बस्तर के ईतिहास एंव भूगोल को जाना। राजीव जी ने बड़े सधे शब्दो में पंड़ित विद्याधर तिवारी के माध्यम से बस्तर के इतिहास का वर्णन किया।
उपन्यास मे दो सामानान्तर कहानिया चलती हैं पहली कहानी प्रागैतिहासिक काल से प्रांरभ हो प्राचीन बस्तर में संघर्ष के चिन्ह तलाशती है, प्रचलित मिथकों में संघर्ष के मायने ढूढ़ती है। नल-वाकटक नाग-गंग तथा काकतीय वंश के शासनकाल में हुये विद्रोहों के पीछे कारण और भावनायें तलाश करती है। उपन्यास की समानातंर चलने वाली दूसरी कहानी बस्तर के शिक्षित युवको के संघर्ष की है।
उपन्यास का प्रारंभ नक्सली वारदात से होता है। थाने को चारों ओर से घेर लिया जाता है बुदरू को अहसास हो गया था यह उसकी अंतिम रात हो सकती है। उसके दो हाथ दूरी पर सोमारू पत्थर की ओट से लेटा साहस के साथ मोर्चे पर डटा था, सोमारू को अपनी वर्दी पर गुमान था। खाकी उसका स्टेटस थी यहां तक की वह आफ डूयटी भी प्रायः वर्दी में देखा जाता था, माओवादी हमले में आठ पुलिस कर्मी मारे गये सभी आदिवासी थे उसमें सामिल था बुदरू का कालेज के समय का दोस्त सोमारू।
शैलेष एंव मरकाम दो एैसे पात्र है जिनके माध्यम से लेखक अपने विचार प्रस्तुत करते दिखलाई पढ़ते हैं, मरकाम एक जुझारू क्रांतिकारी एंव बुद्धिजीवी आदिवासी युवक है जो बस्तर की त्रासदी से चिन्तित है वहीं शैलेष बस्तर के बाहर का है किन्तु वह बस्तर से प्यार करता है। उपन्यास में स्त्री पात्र एंव उपकथानक के रूप में प्रेम त्रिकोण भी है।
उपन्यास में घटनाओ का वर्णन करते हुये लेखक ने बस्तर के पर्यटन स्थल यहां की सांस्कृतिक घरोहर तीज-त्योैहार ,देवी-देवताओं, लोकनृत्य, दशहरा आदि का विवरण भी दिया है जिससे उपन्यास के पाठक के मन में बस्तर की स्पष्ट तस्वीर उभर सके।
मानवाधिकार के नाम पर रोटी सेंकने वाले बुद्धिजीवियों पर भी इस उपन्यास में कड़ा प्रहार किया गया है उपन्यास में पंड़ा वैजनाथ, नरोन्हा से लेकर ब्रहमदेव शर्मा तक जो प्रशासक हुये उनकी नितियों एंव दूरगामी प्रभावों का विष्लेशण किया गया है। माओवादियों द्वारा भूमकाल शब्द के इ्रस्तेमाल पर भी लेखक ने आपत्ति की है
-- हां कल कहीं ऐसा न हो की आने वाली पिढ़िया यह समझे कि भूमकाल 2004 को प्रारंभ हुआ ,भूमकाल सलवा जूडूम के खिलाप संघर्ष था। भूमकालिय, गणपती, किसन जी, गुड़सा उसन्डी आदि आदि, मैं यह मानता हूं कि भूमकाल शब्द का इस्तेमाल नक्सलवादियों द्वारा किया जाना आदिवासीयों की पहचान मिटाने की साजिश है।
उपन्यास में पात्रों की स्थिति मानव शरीर में आत्मा के समान होती है पात्र ही कथानक को विकसित करते है और उनका चरित्र उपन्यास को गन्तव्य तक ले जाता है। आमचो बस्तर में मरकाम, शैलेष, दीपक, शालिनी, सोमारू, बुदरू, सोमाली, निधी इत्यादि बस्तर के शिक्षिक नवयुवकों का प्रतिनिधित्व करते है, वहीं ईस्ट इंड़िया कम्पनी का कैप्टन जे.डी.बल्टन कांकेर रियासत का महाराज शामसिंग, राजगुरू पंड़ित विद्याधर तिवारी, काकतीय नरेश अन्नमदेव, दरियादेव महिपालदेव, पुरूषोत्तम देव, रामायणकालीन उपकथा के पात्र राम सीता लक्ष्मण, खर, दूषण, सूर्पनखा, मुनीवर इत्यिादि- इत्यिादि सैकेड़ो ऐतिहासिक पात्रों में राजीव रंजन प्रसाद जी ने पुनः जीवन डाल दिया है।
कथानक को गति देने का कार्य संवादो के माध्यम से होता है संवाद पात्रों के चरित्र चित्रण एंव उपन्यास में नाटकीयता का संचार करते है। आलोच्य उपन्यास आमचो बस्तर के संवाद सशक्त, सार्थक किन्तु लम्बे हैं। लम्बे-लम्ब संवादों के माध्यम से लेखक बस्तर के ऐतिहासिक, सांस्कृृृृृृृृतिक पृष्ठभूमि एंव जीवन संघर्ष का जीवन्त वर्णन किया है। कुछ संवाद इस प्रकार है -
- तुमने झारखंण्ड़ मे कभी सुना है कि माओवादी उलगुलान कर रहे हैं? नहीं ना ? तो फिर बस्तर में वे भूमकाल शब्द कैसे ओड़ सकते है। इस शब्द में आत्मा है यह बस्तर के आदिवासियों की एकता, संगठन क्षमता और संघर्ष का प्रतीक शब्द है। इस शब्द की अपनी मौलिकता है। माओवादियों द्वारा भूमकाल शब्द के इस्तेमाल पर मुझे आपत्ति है।
शैलेष शालिनी से कहता है
- मरकाम असाधारण आदिवासी थे, बस्तर में वो सुबह तभी आयेगी जब मरकाम जैसे और भी आदिवासी जागरूक होगें। एैसे आदिवासी जिन्हे गुमराह नहीं किया जा सकेगा, जिनके पास तर्क होगें और अध्ययन होगा। उपन्यास आमचो बस्तर में राजीव रंजन प्रसाद जी ने नक्सलवाद से उपजी त्रासदी का वर्णन किया है। नक्सवाड़ी के किसान विदा्रेह से उपजे इसा आंदोलन का विस्तार किस प्रकार देश में हुआ एवं इस माओवाद ने किस प्रकार बस्तर में अपने पैर पसारे उसे समझने का प्रयास इस उपन्यास में प्रमुखता से किया गया है।
आमचो बस्तर उपन्यास में चूंकी आदिवासी जीवन का चित्रण किया गया है अतः पात्रानुकुल सामान्य बोल-चाल की भाषा का प्रयोग किया गया है।
मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं कि मुंशी प्रेम चंद ने भी ‘गौदान’’ को लिखते समय अपने सामाजिक परिवेश का इतना अध्ययन नहीं किया होगा जितना राजीव रंजन प्रसाद ने आमचो बस्तर के लिये किया।
महाश्वेता जी के उपन्यास ‘अग्निीगर्भ’ का उल्लेख करना प्रासांगिक ही होगा- अग्निगर्भ का नायक बिसाई टूडू आमचो बस्तर के आते-आते अपने लक्ष्य से भटक चुका है एवं आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने की जगह बस्तर के आदिवासियों का नक्सल वाद के नाम पर शोषण कर रहा है।
प्रत्येक सृजन के पीछे कोई ना कोई उद्देश्य होता है इस उपन्यास में राजीव जी का उद्देश्य नक्सलवादी त्रासदी से पीड़ित बस्तर की सही तस्वीर प्रस्तुत करना है। वे अपने उद्देश्श्य में पूर्ण रूप से सफल रहे हैं।