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Tuesday, September 18, 2012

पुरानी डायरी से


पुरानी डायरी से- शरद चन्द्र गौड़
//1//
जब जक मिले ना थे तो  कोई आरजू ना थी
देखा तुझे तो तेरे तलबगार हो गए

//2//
जिन्दगी बदस्तूर गुजर जायेगी
जिन्दगी जिन्दा लाष बन जायेगी
अगर तुम ना मिली तो

//3//
आज हम तुम्हें पाकर रहेंगे
सारे जहां को दुष्मन बनाकर रहेंगे
ना पा सके तुम्हें सषरीर पर
आत्मा को अपना बनाकर रहेंगे

//4//
उनको क्या कहूँ जो अपने को
पहचान नहीं पाते
चाहते तो हैं बहुत पर
पूरा कर नहीं पाते
ना समझ सका इनकी
जिन्दगी का मकसद
इन्सानियत नहीं पर
कीड़े मकोड़ों की तरह रहना
नहीं चाहते

//5//
क्यों रूठ कर चले गये
हमें तनहा छोड़ कर
कभी राह भी बदलेगी
बस अब यही तमन्ना है


//6//
बदल रहा है मौसम कब से
जल्दी से तु आ जा
तरस रही हैं आँखें कब से
आके कुछ समझा जा
बदल रहा है मौसम कब से
याद तेरी जब आती है मुझको
नींद आँखों से खो जाती है
आके लोरी सुना जा
जल्दी से तू आ जा
जल्दी से तू आ जा................

//7//
उजड़े महलों में बहार आ गई
सूखी टहनियों पर फिजा छा गई
पर मेरी तनहा जिन्दगी में
वो ना आ सकी

//8//
जिन्दगी एक इम्तिहान है
जिन्दगी एक कारवां है
हम जिन्दा हैं अगर तो
जिन्दगी से लड़ रहे हैं हम
जिस दिन खतम् होगी यह लड़ाई
फेल होंगे हम इम्तिहान में
मगर हम लड़ते रहेंगे
ज्ब तक दम है
इस इम्तिहान में पास होते रहेंगे

//9//
राह भटक कर कदम लड़खड़ाये
मंजिल मिली तो
दिल की धड़कन रूक जाये

//10//
‘‘आ मेरे पास आ’’
आ मेरे पास आ
आ के नजरें मिला
नैनों की झील में प्यार की नैया चला
आ मेरे पास आ
क्यों लहरा रहीं हैं ये
जुल्फें तेरी
घटाओं की तरह है ये बिखरी हुयी
नैनों की रागनी से ना आँसू बहा
आ मेरे पास आ

पास आकर कभी हम मिल ना सके
दूर रहकर भी ना हम जुदा हो सके
आसमाँ मिल रहा है
धरा से जहांँ
हमने सोचा यही है
मिलेंगे वहाँ

आ मेरे पास आ.........
आ के नजरें मिला

//11//
किसी की आस में चैखट पर दिये ना जलाइ्रये
किवाड़ सूखी लकड़ियों के बने होते हैं

//12//
सिर्फ आदमी
रोता हुआ जन्मता है
षिकायतें करता हुआ जीता है
और निराष होकर मरता है

//13//
तमाम उम्र जिसे खोजता रहा
वह मुझे
अपनी दहलीज पर
पड़ा मिला

//14//
पूँछा था फूलों से
काँटों ने कभी
क्यों तोड़ते हैं लोग तुम्हें
मुझे तनहा छोड़कर
कहा था फूल ने
पूछो उनसे
जो तोड़ते हैं मुझको
तुम्हें तनहा छोड़कर
रख पाते है कितने दिन
जिन्दा
हमें जुदा कर

//15//
सोचता हूँ कभी
ना ये दिन रहे
ना ये रात रहे
पर इस दुनिया में
पर इस दुनिया में
हर शख्स
इन्सान रहे

//16//
क्यों आती हो हर पल
खयालों में मेरे
फैलाती हो क्यों तुम अंधेरों में उजाले
क्या डरती नहीं तुम
इन स्याह अंधेरों से
बेड़ियों में जकड़े इस समाज के लोगों से
यहाँ ना कोई
अब अपना हैष्
खड़े है हम तुम
अब उस दोराहे पर
गुजरती है गाड़ी
हर पल जहाँ से
लगता है अब तो
डर हरपल यहाँ पर
लगता है होगी
टक्कर यहां पर
दुुआ मांगता हूं मैं
अस बे जुंबा से
क्यों जुदा कर रहा है
यूं इन्सां को

//17//

मेरे खयालों ने मुझे, इतना गुमा दिया
ना अब तारीखें याद हैं, ना दिन का पता रहा

//18//
उस काले पत्थर को
मार के ठोकर
फेंका था मैनें
आज मंदिर में रखा देख
लोग शीस नवां रहे हैं
शायद यही अंतर है
सड़क पर पड़े और
मंदिर में रखे पत्थर का........

//19//
उस राह पर चलते हुए
राही अधिक है
इस राह पर तो फूल नहीं कांटे अधिक है
क्या यही है मुजुषा !

मन की आरजू में बसे सपने अधिक है
इन सपनों में सच्चाई नहीं झूट अधिक है
क्या यही है मुजुषा !

उस दिन देखी मेने एक वृक्ष पर
कूकती कोयल
इस वृक्ष पर तो
कोयल नहीं कौए अधिक है
क्या यही है मुजुषा !

मेरे खयालों में वह आती अधिक है
दुखते हुए जख्मों को दुखाती अधिक है
क्या यही है मुजुषा !

उसके तो मन की आरजू है
मंजुषा
मेरे तो मन मैं बसी है
मंजुषा ही मंजुषा

//20//
प्यार
देख रही हूँ नित नये सपने
चांद सितारे जितने नभ में
प्यार मिला संसार मिला
जिसको जग का ज्ञान मिला
करम , कत्र्तव्य अधिकार सभी में
कत्र्तव्य को ही प्यार मिला
कहते हैं नहीं मिला उस ेअब तक कुछ
पर धरती माँ का प्यार मिला

//21//
दीवाली
दीवाली की दीप्ती से
दीप जल रहे हैं
मनवा के अंगने में फूल खिल रहे हैं
सजनी के सजना से पहली दीवाली पर
प्रेम देख भंवरे जल रहे हैं
दीवाली की दीप्ती से
दीप जल रहे हैं

मतवाली चंचल सी
हिरनी सी आँखों में
ख्वाबों की दुनिया के
अष्क दिख रहे हैं
राहों की रोषनी
दियों की दीप्ती
राही एक बार
खूब रूक रहे हैं
दीवाली की दीप्ती से
दीप जल रहे हैं

//22//
निगाहें तबस्सुम है जो दीवाना बना देती है
गिला है सिर्फ उन्हीं से
जो हमें देख नजरें चुरा लेती है
मंजिलें कहीं क्या निगाहों ने देखी है
हमारी मंजिलें तो निगाहें झुका लेती है
नजरें इनायत दे तो चंद लब्ज कहूँ
इष्क ने कहा है
ये जो दिया है
वह बुझ कर जला है!
खता है सिर्फ उन्हीं से
जे जल कर बुझे है
हम जलकर भी अहले वफा कर रहे हैं
उन्हें लाल जोड़े में विदा कर रहे हैं
निगाहें तबस्सुम है जो दीवाना बना देती है
गिला है सिर्फ उन्हीं से
जो हमें देख नजरें चुरा लेती है






Tuesday, September 11, 2012

समीक्षा-व्यंग्य संग्रह : राम खिलावन का राम राज्य,लेखक : रवि श्रीवास्तव


व्यंग्य संग्रह : राम खिलावन का राम राज्य
लेखक : रवि श्रीवास्तव
प्रकाषक : यष पब्लिकेषन
1/10753 गली नं.-3 सुभाष पार्क
नवीन शाहदरा, कीर्ति मंदिर के पास, दिल्ली-110032
फोन : 09899938522
प्रथम संस्करण : 2012
मूल्य : 195/-

समीक्षा : शरद चन्द्र गौड़
             Mobile-9424280807

यष प्रकाषन दिल्ली से प्रकाषित रवि श्रीवास्तव जी के इस व्यंग्य संग्रह में उनके तीस व्यग्यों को शामिल किया गया है। इसकी प्रस्तावना में ही प्रेम जनमेजय जी ने कहा है ‘‘ वे राजनैतिक विसंगतियों के मायाजाल में स्वयं को दिग्भ्रमित कर सीमित नहीं करते, एक नई बात के साथ अपने पाठक को षिक्षित करते हैं ’’।
परामर्शदाता, दो कौड़ी के समारोह से लौटते हुए, सत्ता प्रतिष्ठान एवं समीक्षा के प्रतिमान, सूरज की रोषनी एवं सूरज का अंधेरा, वे लौटकर नहीं आये हैं, बीच बहस में बुद्धि जीवी, साहित्यिक गोष्ठियों में श्रोताओं का योगदान, जागो-जागो पखवाड़ा आया, कभी-कभी ऐसा भी होता है आलेखों में साहित्यक आयोजनों , साहित्य के क्षेत्र में दिये जा रहे सम्मानों एवं साहित्यिक पत्रिकाओं पर काबिज परामर्षदाताओं पर तीखा व्यंग्य किया गया है।
परामर्षदाता में वे लिखते हैं, कुछ पत्रिकाएं ऐसी भी हैं जो चर्चित नामों को अपना परामर्षदाता बताती हैं जबकि ऐसे चर्चित रचनाकारों का इन पचिकाओं से कोई सरोकार नहीं रहता, वहीं इन पत्रिकाओं के मालिक भी लेखक बनने के मोह से बच नहीं पाते , इनके अधकचरे लेखन को बना-संवारकर प्रस्तुत करना संपादक मण्डल का दायित्व बन जाता है।
संसाधन वाले लोगों को अब साहित्यकार बनने का चस्का लग गया है, अधकचरे साहित्य को किताब के रूप में प्रस्तुत कर भव्य विमोचन समारोह किये जा रहे हैं। ‘‘दो कौड़ी के समारोह से लौटते हुए’’ अधकचरे साहित्य पर किया गया ऐसा ही एक प्रहार है।
समकालीन कविता प्रायोजित समीक्षा की षिकार हो रही है, विषेष कर बड़े अफसर जब कवि बनते हैं तब उनके संग्रह की बड़ी-बड़ी समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपती हैं, समीक्षक भी सत्ता के सामने नतमस्तक हो उनकी तुलना पूर्व स्थापित कवियों से करने से नहीं चूकते, लेखक ने अपने आलेख ‘‘सत्ता प्रतिष्ठान और समीक्षा के प्रतिमान’’ में इस प्रकार के विचार व्यक्त किये हैं।
पुरस्कारों की हकीकत को सामने लाने का काम किया है ‘‘सूरज की रोषनी में सूरज का अंधेरा ’’ में । बिकाऊ पुरस्कारों पर प्रहार करते हुए इस व्यंग्य के एक पात्र रामलाल निरमोही एक संपादक को फोन पर कहते है ‘‘ दूसरा सुझाव सुनिये ध्यान से , दो हजार नौ में हमारा भी उपन्यास आया है छपकर ‘‘सूरज की रोषनी में सूरज का अंधेरा ’’ आप चाहें तो पहला पुरस्कार दे सकते हैं हमारी कृति को, बड़ी प्रषंसा हो रही है, पत्रिकाओं में चर्चे हैं, कई पत्रिकाओं में समीक्षा भी आयी है। ‘‘वे लौटकर नहीं आए हैं’’ के माध्यम से भी उन्होनें पुरस्कारों के सच को उजागर किया है, कुछ साहित्यिक पत्रिकाएं साहित्यकारों को सम्मानित करने के लिए पुरस्कार नहीं दे रही बल्कि स्वयम् को स्थापित करना ही उनका ध्येय बन गया है। ‘‘कभी-कभी ऐसा भी होता है’’ आलेख में लेखक ने विभिन्न साहित्यिक आयोजनो के अपने अनूठे अनुभवों को शामिल किया है, यह आलेख इन आयोजनों की प्रासांगिता तक पर प्रष्न चिन्ह लगाता है।
इस संग्रह का पहला व्यंग्य ‘‘षनी की महादषा और बाजारवाद’’ है, इस में उन्होनें ना सिर्फ अंधविष्वास को रेखांकित किया है बल्कि राजनेताओं के वास्तविक चरित्र को भी उजागर किया है, चुटिली भाषा में उन्होनें अपनी बात बड़ी ही सरलता से रखी है।
‘‘मुंबई की बारिषःटी.वी. पर’’ में टी.वी. पर प्रसारित समाचारों पर तीखा व्यंग्य किया है, महानगरों विषेषकर मुंबई की बारिष को ये समाचार चैनल दिनभर दिखाते हैं इन्हें चिंता होती है अपनी टी.आर.पी. की भले ही पूरा देष बाढ़ ग्रस्त क्यों ना हो।
अमीरों की अमीरी एवं गरीबों की गरीबी को भी लेखक ने बड़ी ही सुक्ष्मता से देखा है, अमीरों के कुत्ते का गुम हो जाना चर्चा का विषय बन जाता है, जबकि गरीब घर के ईमानदार नवयुवक पप्पु के गायब हो जाने की पुलिस रिपोर्ट तक नहीं लिखाई जाती , ‘‘ पप्पू और पामेरियन’’ के माध्यम से इसी आर्थिक विषमता के सामाजिक पक्ष को सफलता से उजागर किया गया है।
राजनेताओं के चरित्र पर भी वे टिप्पणी करने से नहीं चूके ‘‘षपथ ग्रहण समारोह’’ में वे लिखते हैं - जनता के सामने वोटों के लिए हाथ जोड़कर घिघियाने वाले नेता रिजल्ट निकलते ही शेर बनकर दहाड़ने लगते हैं, ये ही मंत्री बनने के लिए शपथ ग्रहण समारोह में जमकर फिजूल खर्ची करते हैं।
‘‘मुरारी लाल जा चुके हैं’’, पढ़ते हुए अनायास ओठों पर मुस्कुराहट आ ही जाती है, पूर्व किरायेदार के परिचितों को किस प्रकार नया किरायेदार झेलता है, इस व्यंग्य में उसे बड़े ही आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। नये किरायेदार ने ‘‘ मन ही मन संकल्प दुहराया मकान कितना भी अच्छा क्यों ना हो, पूर्व किरायेदार का इतिहास भी अच्छा होना चाहिए’’ ।
लेखक ने मंहगाई की मार से ग्रस्त गरीबों के दर्द को छुआ है ‘‘ मंहगाई को आत्मसात करना सीखें’’ में । वहीं ढोंगी बाबाओं पर अंधभक्ति रखने वालों को सीख दी है ‘‘ इस तरफ गया है’’ में। राज्य में गौरव पथ के नाम पर बनी सड़कों का क्या हाल है यह किसी से नहीं छिपा है , इसी गौरव पथ पर तीखा व्यंग्य है ‘‘गौरव पथ का आत्र्तनाद’’।
राजा भैया बाहुबलियों का सिंबल बन गया है, ‘‘पेनल-पेनल’’ आलेख के माध्यम से लेखक ने व्यवस्था पर तीखे प्रहार किये हैं। आज के जागरूक मतदाता को बहलाया-फुसलाया नहीं जा सकता उसे अच्छे एवं बुरे की समझ है, लकिन अफसोस राजनीतिक पार्टियां योग्य उम्मीदवार को चुनाव में खड़ा करने का साहस नहीं कर पाती, यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें चरित्रहीनों में से किसी एक को चुनना हमारी मजबूरी है। ‘‘हमारा वोट आखिर किधर जायेगा’’ में कुछ इसी प्रकार के उदगार व्यक्त किये गये हैं।
वी.आई.पी. के आगमन से किस प्रकार छोटे शहरों की याता यात व्यवस्था बिगड़ जाती है एवं आम नागरिक विषेषकर टेªफिक में फंसे मरीज किस प्रकार परेषान होते हैं इसका मार्मिक चित्रण लेखक ने ‘‘सावधान ! राजधानी ष्षहर में ’’ में किया है। रिटायर व्यक्तियों के दर्द का भी अहसास लेखक ने अपने आलेख ‘‘रिटायर होने के बाद आखिर जाना कहां है’’ में किया है। सरकारी आयोजनों में भी जानीलीवर जैसे कामेडियन की फूहड़ कामेडी परोसी जाने लगी है, आहत लेखक इसका वर्णन अपने व्यंग्य ‘‘षताब्दी समारोह में जानी लीवर ’’ में करते हैं।
अंत में उस आलेख पर चर्चा करना चाहूंगा जिसने इस संग्रह को अपना नाम दिया, ‘‘ राम खिलावन का राम राज्य’’ मंहगाई की मार झेल रहे आम नागरिक के दुख-दर्द का अहसास है, एक तरफ जहां आम नागरिक मंहगाई से त्रस्त है वहीं नेता, मंत्री माला पहन स्वागत करवा रहे है...यही राम खिलावन के लिए अब राम राज्य है।