Wednesday, July 20, 2011

Hindi Kavita- नोनी की नेनो


काम वाली बाई ने
अपनी बच्ची को
नोनी कहकर बुलाया
नोनी सरपट भाग कर आई
मुझे लगा कहीं यह
टाटा की नेनों तो नहीं

‘‘बस्तर’’ में छोटी बच्ची को
कहते हैं नोनी
अँग्रेज़ी में छोटा-कण कहलाता है
नेनो
इस असाधारण समानता ने
मानों दो भाषाओं का
संगम बना दिया
नोनी को नेनो और
नेनो को नोनी बना दिया

नोनी भी चुलबुली और चंचल है
सरपट भागती है तो लोग उसे देखते हैं
नेनो को देखने के लिए भी
लोग तरसते हैं

पूरे चेनलो में
नेनो की बहार है
मानो नेनो को देखकर ही पेट भर जाएगा
फिर नोनी की भूख कोन मिटाएगा

लाख रूपये का कोई मायने नहीं रहा
नेनो चलाने वाला भी गरीब कहलाएगा

Hindi Kavita- मृग-मरीचिका


मैं मृग-मरीचिका
प्यासे को पानी का आभास दिलाती
मैं पानी का मोल बताती
मैं पानी को अनमोल बनाती
मैं मृग-मरीचिका

रेगिस्तान में उठती
गरम हवा की लहर हूँ मै
मानों शांत पानी में
किसी नें कंकड़
मार दिया हो

मैं पानी की एक-एक
बूँद को तरसते
मरूस्थल की पहचान हूँ
कभी मेरी छाती पर
मारता था हिलोरे
समन्दर का पानी
उसी पानी की आस में हूँ मैं

मैं मीठे पानी के
स्त्रोत का
रास्ता जानती हूँ
मैं हारे-थके प्यासे
काफ़िले में
जीने की आस बँधाती हूँ

अनमोल पानी का
झरना नहीं हूँ मै
कुँए और सरोवर का
मीठा पानी भी नहीं हूँ मैं
मैनें तो पानी को
कभी छुआ तक नहीं
मुझे तो पानी कभी दिखा ही नहीं
मैं तो बस
प्यासे की प्यास हूँ
मैं तो बस
पानी का अहसास हूँ

Hidi Kavita- मैं पानी हूँ

मैं पानी हूँ
आपकी आँखों का पानी
प्यासे की प्यास
बुझाने वाला पानी
रंगहीन, गंधहीन पानी
झील नदी नालों
पोखरों
तालाब और कुँए का पानी
वर्षा का पानी
ओस का पानी
समुन्दर का लहलहाता
इठलाता बलखाता पानी
बर्फ़ का जमा
बादलों का वाष्पित पानी

नदियों में बहता
तालाब पोखरों में बँधता
बादलों में आसमान छूता
उड़ता बरसता
फिर बहता
मैं रूकता नहीं
मैं चलता रहता हूँ
अपनी मंज़िल की ओर
सारा जहाँ मेरी मंज़िल

समंदर मेरा अन्तिम पड़ाव
जहाँ पर भी
मैं मारता हिलोरे
और उड़ जाता
बादल बन कर

मेरे बिना जीवन नहीं
मेरे बिना जग नहीं
मैं ना गिरूँ तो
पड़ जाता सूखा
मैं बरस पड़़ूँ
तो आ जाती बाढ़

मेरे जीवन चक्र
को मत रोको
मैं अनमोल हूँ
मुझे सहेजो

Hindi Kavita- बसंत ऋतु के बासंती पौधे


ऋतु बदली
आया बसंत

बसंती चादर से
सुशोभित वसुंधरा
सूखे पत्ते उड़ते
इधर-उधर
दरख़्तों पर सुशोभित
बासंती कोमल पत्तियाँ

आम बौरा गए
हो गए बासंती
मधुर सुगन्ध से
सुगन्धित वसुन्धरा
साड़ी में लिपटी
बलखाती, मुस्काती
लकदक यौवन के
मद में मदमाती नवयौवना

धूल के गुबार
उड़ते पत्तों का बवंडर
सबको चिढ़ाते
‘शान से इठलाते
बासन्ती पत्तों से लिपटे दरख़्त

ऋतु बदली आया बसन्त

Hindi Kavita- Bachapan


लड़ते-झगड़ते
और शिकायत करते
ये छोटे-छोटे बच्चे
फिर मिल जाते
क्षण भर में
खेलते-कूदत
किलकारियाँ भरते
ये छोटे-छोटे बच्चे

इनको खेलता देख
जी उठता हूँ मैं
इनको झगड़ता देख
बचपन की यादों में
खो जाता हूँ मैं
इनकी निश्छल हँसी
कराती है मुझे
मंदिर का-सा अहसास

काश समय का चक्र
उलटा घूम जाता
और मुझे
अपना बचपन पुनः मिल पाता

Hindi Bal-Kavita- Gadha Computer

मैं हमेशा दौड़ में
पिछड़ जाता
हैंग हो जाता, स्लो हो जाता
हर प्रकार के वायरस मुझे सताते
मुझे चलाने वाले
हाथ से काम कर
मुझ से आगे निकल जाते
मैं गधा कम्प्यूटर
मेरी विंडो खुलने के पहले
क्लोज हो जाती
मेरी मदर बोर्ड मुझे सताती
मेरा प्रिंटर
एक घण्टे में
एक प्रिंट निकालता
मैं गधा कम्प्यूटर

मुझे चलाने वाला
रोज़ झल्लाता
माऊस टेबल पर पटकता
और खाम-खा
की-बोर्ड के बटन
खटखटाता
कुर्सी पर पीछे झुकता
माऊस से
मिनीमाईज-मेक्सीमाईज करता
सी०पी०यू० के डब्बे को
हाथ से ठक...ठकाता
यू०पी०एस० के तारों को
निकालकर पुनः लगाता
अपनी क़िस्मत को कोसता
और पुनः
की-बोर्ड के बटन
खटखटाता
मैं गधा कम्प्यूटर

मेरा एंटी-वायरस
खुद वायरस से
इन्फेक्टेड हो जाता
अपग्रेड करने के लिए
रोज संदेश पढ़ाता
वायरस मेरे साथ
गुल्ली-डंडा खेलते
मेरे कहने पर कि
मैं एण्टी-वायरस हूँ
मुँह टेढ़ा कर जीभ चिढ़ाते
मैं हैरान-परेशान
ताकता अपने चलाने वाले को
और सोचता 
मैं हूँ गधा कम्प्यूटर

Hindi Kavita-Mera Jeevan

क्षंण भंगुर है जीवन मेरा
दीप जलाऊँगा।
फैल रहा अंधियारा काला
पल दो पल के लिए सही में 
उजियारा लाऊँगा।

पीड़ा मेरी अमिट छाप है
जीवन मेरी दृश्टि
फूलों की चाह नहीं है
ना मुरझाने का भय
खड़े लेन में अंतिम व्यक्ति 
से बतियाऊँगा 
क्षण भंगुर है जीवन मेरा
दीप जलाऊँगा...........

अंधियारे के काले काले बादल 
फेल रहे हैं नभ में
सूरज की हलकी सी किरण
बंद मुट्ठी में कर 
जग में फेलाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

पीड़ा मेरी मुझको भाये 
तुझको तेरा षुभ अर्पित
तेरे दुखों को अम्रत समझ
में पी जाऊंगा 
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

तू क्या जाने जलते अंगारों को 
मुख में रखने का सुख
ठण्डी-ठण्डी बर्फीली सी 
पवनों का सुख में पाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

पत्ते-पौधे जंगल सब कुछ
हर पल भाते मुझको
होले-हाले आती वायु से
नव जीवन पाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगाक्षंण भंगुर है जीवन मेरा
दीप जलाऊँगा।
फैल रहा अंधियारा काला
पल दो पल के लिए सही में 
उजियारा लाऊँगा।

पीड़ा मेरी अमिट छाप है
जीवन मेरी दृश्टि
फूलों की चाह नहीं है
ना मुरझाने का भय
खड़े लेन में अंतिम व्यक्ति 
से बतियाऊँगा 
क्षण भंगुर है जीवन मेरा
दीप जलाऊँगा...........

अंधियारे के काले काले बादल 
फेल रहे हैं नभ में
सूरज की हलकी सी किरण
बंद मुट्ठी में कर 
जग में फेलाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

पीड़ा मेरी मुझको भाये 
तुझको तेरा षुभ अर्पित
तेरे दुखों को अम्रत समझ
में पी जाऊंगा 
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

तू क्या जाने जलते अंगारों को 
मुख में रखने का सुख
ठण्डी-ठण्डी बर्फीली सी 
पवनों का सुख में पाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा

पत्ते-पौधे जंगल सब कुछ
हर पल भाते मुझको
होले-हाले आती वायु से
नव जीवन पाऊंगा
क्षण भंगुर है जीवन मेरा 
दीप जलाऊंगा