Friday, July 22, 2011

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- कुम्हार का घड़ा

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- कुम्हार का घड़ा: "आज मैने घड़़ा बनाया घूमते हुए चाक पर गीली मिट्टी को चढ़ा अपनी हथेलियों और अँगुलियों से सहेजकर चाक पर चढ़ी मेरे हाथों से घूमती मिट्टी..."

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- कचरे का डब्बा

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- कचरे का डब्बा: "मेरे घर की पहचान कचरे का डब्बा मेरे घर का पता कचरे के डब्बे वाली गली मुझे नमस्ते करता कचरे का डब्बा दादी से रोज़ मिलता बतियाता और आँ..."

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- जल अब तो आजा

Bastar ka sahitya: Hidi Kavita- जल अब तो आजा: "कुंभी के अब नहीं होते दर्शन तालाब उदास खग-विहीन शंख, कमल, तरंग अब दिखते नाही टोंटी भी है जल-विहीन शहर उठा है आस लगाए गुण्डी, धड़ा,..."

Hidi Kavita- कचरे का डब्बा


मेरे घर की पहचान
कचरे का डब्बा
मेरे घर का पता
कचरे के डब्बे वाली गली
मुझे नमस्ते करता
कचरे का डब्बा
दादी से रोज़ मिलता
बतियाता और आँखे दिखाता
कचरे का डब्बा

सोचता हूँ
कचरे का डब्बा ना होता तो
मामाजी को घर नहीं मिलता
जानवरों को ढोर नहीं मिलता
कचरे के डब्बे ने
लगाम लगा दी
तेज़ रफ़्तार से आने वाले
वाहनों पर
सामने आ खड़ा हुआ
सीना तान
कचरे का डब्बा

कचरे के डब्बे के
इतने फ़ायदे हैं
कि अब तो
उसकी बदबू भी भीनी खुशबू
लगती है
 बेख़ौफ़
मोहल्ले के लड़के
सड़क पर खेलते हैं
क्योंकि
बेतरतीब फैले कचरे ने
रास्ता रोक
सड़क को मैदान बना दिया है

सफ़ाई को मुँह चिढ़ाता
कचरे का डब्बा
शहर के सौन्दर्यकरण
से ख़फ़ा
कचरे का डब्बा
मेरे घर की पहचान
कचरे का डब्बा

Hidi Kavita- जल अब तो आजा


कुंभी के अब नहीं
होते दर्शन
तालाब उदास खग-विहीन

शंख, कमल, तरंग
अब दिखते नाही
टोंटी भी है जल-विहीन

शहर उठा है आस लगाए
गुण्डी, धड़ा, मटका लिए
लड़ते रहते
बात-बात पर
करते तू..तू, मैं..मैं
टोंटी उनको खूब निहारती
मैं अब तक हूँ नीर विहीन

मछली ने अब चलना सीख लिया
जीना सीख लिया
जल-विहीन
अब तो आजा अब तो आ जा
टोंटी भी अब आस लगाती
पानी आजा पानी आजा

Hidi Kavita- कुम्हार का घड़ा


आज मैने घड़़ा बनाया
घूमते हुए चाक पर
गीली मिट्टी को चढ़ा
अपनी हथेलियों और
अँगुलियों से सहेजकर

चाक पर चढ़ी
मेरे हाथों से घूमती मिट्टी
मुझ से पूछ रही थी
मेरा क्या बनाओगे
जो भी बनाओं
घड़ा या सुराही
दिया या ढक्कन
बस बेडौल नहीं बनाना

घबराहट में वह
इधर-उधर गिर जाती
और ताकती
बूढ़े कुम्हार की ओर
ये तुमने
किसे बिठा दिया चाक पर
मेरा रूप बनाने
नौसीखिये हाथों में
ढलती मिट्टी
चिन्तित है अपने भविष्य पर
मैनें भी देखा
बूढ़े कुम्हार की ओर आस से
वह मेरी मंशा समझ गया
और उसने अपना हाथ
लगा
सम्हाला मिट्टी को चॉक पर
मिट्टी में भी जीने
की आस बंधी
और संभल गई वह चॉक पर

एक सुन्दर सा घड़ा बन गया
आज मेरे हाथ से
घूमते हुए चाक पर

Wednesday, July 20, 2011

Hindi Kavita- नोनी की नेनो


काम वाली बाई ने
अपनी बच्ची को
नोनी कहकर बुलाया
नोनी सरपट भाग कर आई
मुझे लगा कहीं यह
टाटा की नेनों तो नहीं

‘‘बस्तर’’ में छोटी बच्ची को
कहते हैं नोनी
अँग्रेज़ी में छोटा-कण कहलाता है
नेनो
इस असाधारण समानता ने
मानों दो भाषाओं का
संगम बना दिया
नोनी को नेनो और
नेनो को नोनी बना दिया

नोनी भी चुलबुली और चंचल है
सरपट भागती है तो लोग उसे देखते हैं
नेनो को देखने के लिए भी
लोग तरसते हैं

पूरे चेनलो में
नेनो की बहार है
मानो नेनो को देखकर ही पेट भर जाएगा
फिर नोनी की भूख कोन मिटाएगा

लाख रूपये का कोई मायने नहीं रहा
नेनो चलाने वाला भी गरीब कहलाएगा