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Thursday, March 8, 2012

Bastar ka sahitya: उपन्यास- आमचो बस्तर, लेखक - राजीव रंजन प्रसाद समीक...

Bastar ka sahitya: उपन्यास- आमचो बस्तर, लेखक - राजीव रंजन प्रसाद समीक...: उपन्यास- आमचो बस्तर, लेखक - राजीव रंजन प्रसाद समीक्षा - शरद चंद्र गौड़ बस्तर के इतिहास संस्कृति एंव परम्पराओं का तानाबाना बुन उसे वर्तम...

उपन्यास- आमचो बस्तर, लेखक - राजीव रंजन प्रसाद समीक्षा - शरद चंद्र गौड़


उपन्यास- आमचो बस्तर,
लेखक - राजीव रंजन प्रसाद
समीक्षा - शरद चंद्र गौड़

बस्तर के इतिहास संस्कृति एंव परम्पराओं का तानाबाना बुन उसे वर्तमान की राजनैतिक, सामाजिक एंव आर्थिक समस्याओं से जोड़ते हुये राजीव जी ने एक अभूतपूर्व उपन्यास की रचना की है। ‘आमचो बस्तर’ ना सिर्फ एक उपन्यास है बल्कि बस्तर की ऐतिहासिक विरासत पर लिखा गया प्रमाणित दस्तावेज भी है।
उपन्यास कितना भी लोकधर्मी एंव जनपदीय क्यों न हो उसमें कल्पना के उड़ान की गुंजाईश बनी रहती है ............. राजीव जी ने अपने उपन्यास को कल्पना लोक से दूर ही रखा है। उपन्यास में ऐतिहासिक पात्र तो हैं ही वर्तमान समय के कितने ही पात्रों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं .........भू-विज्ञान के प्रोफेसर डाॅ. कुरैशी मुझे पढ़ा चुके है वहीं एक अन्य प्रोपेसर गौराहा जी आज भी कालेज में है। नक्सलवादी त्रासदी से जूझते बस्तर की विढ़म्बनाओं को रेखाकिंत करते समय लेखक ने घटनाओं को ज्यों का त्यों उतार लिया है, एक बारगी तो ऐसा लगता है कहंी हम नक्सलवाद पर ‘‘ रिपोर्ताज ‘‘ तो नहीं पढ़ रहे, लेकिन सचेत लेखक हमें फिर से उपन्यास के पात्रो से जुड़ने में सफल हो जाता है।
ऐतिहासिक घटनाओं का ताना-बाना बुनने में लेखक को अपार सफलता मिली है बस्तर के पठारी क्षेत्र का नाम दण्ड़कारण्य कैसे पढ़ा इसे समझाने के लिये लेखक राजगुरू मुनिवर शुक्राराचार्य की पुत्री अरजा एंव भारत वर्ष के प्रथम प्रतापी राजा इक्ष्वाकु प्रथम के पुत्र महाराजा दण्ड़ के प्रसंग का वर्णन करते है। शुकराचार्य के श्राप से ही महाराजा दण्ड़ का राज्य ‘‘ अरण्य ‘‘ में परिवर्तित हो जाता है, एंव दण्ड़कारण्य कहलाता है। इसी प्रकार लेखक पात्रों के माध्यम से इस क्षेत्र का बस्तर कैसे पढ़ा विचार करते हैं।
ईस्ट इंड़िया कम्पनी के कैप्टन जे.डी.ब्लण्टने 1795 में बस्तर में प्रवेश करने का प्रयास किया कांकेर रियासत के राजा शामंिसंह ने कैप्टन ब्लण्ट की अगुवाई की। कैप्टन ब्लण्ट ने पंड़ित विद्याधर तिवारी के माध्यम से बस्तर के ईतिहास एंव भूगोल को जाना। राजीव जी ने बड़े सधे शब्दो में पंड़ित विद्याधर तिवारी के माध्यम से बस्तर के इतिहास का वर्णन किया।
उपन्यास मे दो सामानान्तर कहानिया चलती हैं पहली कहानी प्रागैतिहासिक काल से प्रांरभ हो प्राचीन बस्तर में संघर्ष के चिन्ह तलाशती है, प्रचलित मिथकों में संघर्ष के मायने ढूढ़ती है। नल-वाकटक नाग-गंग तथा काकतीय वंश के शासनकाल में हुये विद्रोहों के पीछे कारण और भावनायें तलाश करती है। उपन्यास की समानातंर चलने वाली दूसरी कहानी बस्तर के शिक्षित युवको के संघर्ष की है।
उपन्यास का प्रारंभ नक्सली वारदात से होता है। थाने को चारों ओर से घेर लिया जाता है बुदरू को अहसास हो गया था यह उसकी अंतिम रात हो सकती है। उसके दो हाथ दूरी पर सोमारू पत्थर की ओट से लेटा साहस के साथ मोर्चे पर डटा था, सोमारू को अपनी वर्दी पर गुमान था। खाकी उसका स्टेटस थी यहां तक की वह आफ डूयटी भी प्रायः वर्दी में देखा जाता था, माओवादी हमले में आठ पुलिस कर्मी मारे गये सभी आदिवासी थे उसमें सामिल था बुदरू का कालेज के समय का दोस्त सोमारू।
शैलेष एंव मरकाम दो एैसे पात्र है जिनके माध्यम से लेखक अपने विचार प्रस्तुत करते दिखलाई पढ़ते हैं, मरकाम एक जुझारू क्रांतिकारी एंव बुद्धिजीवी आदिवासी युवक है जो बस्तर की त्रासदी से चिन्तित है वहीं शैलेष बस्तर के बाहर का है किन्तु वह बस्तर से प्यार करता है। उपन्यास में स्त्री पात्र एंव उपकथानक के रूप में प्रेम त्रिकोण भी है।
उपन्यास में घटनाओ का वर्णन करते हुये लेखक ने बस्तर के पर्यटन स्थल यहां की सांस्कृतिक घरोहर तीज-त्योैहार ,देवी-देवताओं, लोकनृत्य, दशहरा आदि का विवरण भी दिया है जिससे उपन्यास के पाठक के मन में बस्तर की स्पष्ट तस्वीर उभर सके।
मानवाधिकार के नाम पर रोटी सेंकने वाले बुद्धिजीवियों पर भी इस उपन्यास में कड़ा प्रहार किया गया है उपन्यास में पंड़ा वैजनाथ, नरोन्हा से लेकर ब्रहमदेव शर्मा तक जो प्रशासक हुये उनकी नितियों एंव दूरगामी प्रभावों का विष्लेशण किया गया है। माओवादियों द्वारा भूमकाल शब्द के इ्रस्तेमाल पर भी लेखक ने आपत्ति की है
-- हां कल कहीं ऐसा न हो की आने वाली पिढ़िया यह समझे कि भूमकाल 2004 को प्रारंभ हुआ ,भूमकाल सलवा जूडूम के खिलाप संघर्ष था। भूमकालिय, गणपती, किसन जी, गुड़सा उसन्डी आदि आदि, मैं यह मानता हूं कि भूमकाल शब्द का इस्तेमाल नक्सलवादियों द्वारा किया जाना आदिवासीयों की पहचान मिटाने की साजिश है।
उपन्यास में पात्रों की स्थिति मानव शरीर में आत्मा के समान होती है पात्र ही कथानक को विकसित करते है और उनका चरित्र उपन्यास को गन्तव्य तक ले जाता है। आमचो बस्तर में मरकाम, शैलेष, दीपक, शालिनी, सोमारू, बुदरू, सोमाली, निधी इत्यादि बस्तर के शिक्षिक नवयुवकों का प्रतिनिधित्व करते है, वहीं ईस्ट इंड़िया कम्पनी का कैप्टन जे.डी.बल्टन कांकेर रियासत का महाराज शामसिंग, राजगुरू पंड़ित विद्याधर तिवारी, काकतीय नरेश अन्नमदेव, दरियादेव महिपालदेव, पुरूषोत्तम देव, रामायणकालीन उपकथा के पात्र राम सीता लक्ष्मण, खर, दूषण, सूर्पनखा, मुनीवर इत्यिादि- इत्यिादि सैकेड़ो ऐतिहासिक पात्रों में राजीव रंजन प्रसाद जी ने पुनः जीवन डाल दिया है।
कथानक को गति देने का कार्य संवादो के माध्यम से होता है संवाद पात्रों के चरित्र चित्रण एंव उपन्यास में नाटकीयता का संचार करते है। आलोच्य उपन्यास आमचो बस्तर के संवाद सशक्त, सार्थक किन्तु लम्बे हैं। लम्बे-लम्ब संवादों के माध्यम से लेखक बस्तर के ऐतिहासिक, सांस्कृृृृृृृृतिक पृष्ठभूमि एंव जीवन संघर्ष का जीवन्त वर्णन किया है। कुछ संवाद इस प्रकार है -
- तुमने झारखंण्ड़ मे कभी सुना है कि माओवादी उलगुलान कर रहे हैं? नहीं ना ? तो फिर बस्तर में वे भूमकाल शब्द कैसे ओड़ सकते है। इस शब्द में आत्मा है यह बस्तर के आदिवासियों की एकता, संगठन क्षमता और संघर्ष का प्रतीक शब्द है। इस शब्द की अपनी मौलिकता है। माओवादियों द्वारा भूमकाल शब्द के इस्तेमाल पर मुझे आपत्ति है।
शैलेष शालिनी से कहता है
- मरकाम असाधारण आदिवासी थे, बस्तर में वो सुबह तभी आयेगी जब मरकाम जैसे और भी आदिवासी जागरूक होगें। एैसे आदिवासी जिन्हे गुमराह नहीं किया जा सकेगा, जिनके पास तर्क होगें और अध्ययन होगा। उपन्यास आमचो बस्तर में राजीव रंजन प्रसाद जी ने नक्सलवाद से उपजी त्रासदी का वर्णन किया है। नक्सवाड़ी के किसान विदा्रेह से उपजे इसा आंदोलन का विस्तार किस प्रकार देश में हुआ एवं इस माओवाद ने किस प्रकार बस्तर में अपने पैर पसारे उसे समझने का प्रयास इस उपन्यास में प्रमुखता से किया गया है।
आमचो बस्तर उपन्यास में चूंकी आदिवासी जीवन का चित्रण किया गया है अतः पात्रानुकुल सामान्य बोल-चाल की भाषा का प्रयोग किया गया है।
मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं कि मुंशी प्रेम चंद ने भी ‘गौदान’’ को लिखते समय अपने सामाजिक परिवेश का इतना अध्ययन नहीं किया होगा जितना राजीव रंजन प्रसाद ने आमचो बस्तर के लिये किया।
महाश्वेता जी के उपन्यास ‘अग्निीगर्भ’ का उल्लेख करना प्रासांगिक ही होगा- अग्निगर्भ का नायक बिसाई टूडू आमचो बस्तर के आते-आते अपने लक्ष्य से भटक चुका है एवं आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने की जगह बस्तर के आदिवासियों का नक्सल वाद के नाम पर शोषण कर रहा है।
प्रत्येक सृजन के पीछे कोई ना कोई उद्देश्य होता है इस उपन्यास में राजीव जी का उद्देश्य नक्सलवादी त्रासदी से पीड़ित बस्तर की सही तस्वीर प्रस्तुत करना है। वे अपने उद्देश्श्य में पूर्ण रूप से सफल रहे हैं।