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Saturday, July 28, 2012

श्रीमती कविता गौड़ की कविताएं



श्रीमती कविता गौड़ की कविताएं

//1//
घर
खाली मकान को घर कहते हो
ना बच्चों की किलकारियाँ
न सास की दुलार भरी फटकार
न ननद से तकरार व मुनहार
न ससुर व जेठ के खखारने
का संकेत
न बहु के पायल की मीठी
झुन-झुन सी आवाज
न देवर भाभी का मीठा परिहास
न षाम को पड़ोसिनों की बैठक
न मोहल्ले के बच्चों की धूम-धड़ाका  
यह सब ना होते हुए भी
मकान अब घर कहलाते है
फर्नीचर व सजावट से होता है
घर के व्यक्तियों का आँकलन
लोगों के रहने की जगह में 
रहते हैं अब लग्जरी सामान
ऐसा ही होता है आज का मकान
नहीं-नहीं आज का घर....आज का घर

//2//
त्याग
त्यााग है माता
त्याग है पत्नी
त्याग है बहन
त्याग है बेटी
त्याग है हर नारी
त्यागती है घर अपना
पति के लिए
त्याागति है सुख चैन
बच्चों के लिए
त्याागति है हर इच्छा
परिवार के लिए
फिर भी न होता
कोई नाम उसका
पर जब कोई पुरूश
त्याग करता है
तो वो ऊँचाईयों
पर पहुँच जाता है
राम और भीश्म बनकर
दुनिया में पूजा जाता है

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