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Sunday, November 21, 2010

बस्तर एक खोज

बस्तर एक नजर...

दण्डकारण्य के पठार पर स्थित बस्तर अपने नैसर्गिक सौंदर्य एवं जनजातीय विविधता के लिये जाना जाता है। एक ओर जहाँ सभ्यता के प्रकाश की किरणें इसे आलिंगनबद्ध कर सुन्दर स्वरूप प्रदान कर रही हैं, वहीं सभ्यता को उसके आदिम युग में आज भी देखा जा सकता है। ऐसा लगता है मानो बस्तर एक जीवित जीवाश्म हो। 

जैवविविधता के साथ यहाँ सभ्यता की विविधता भी देखने को मिल रही है। लंगोटी पहन कर कांवर में टी.वी.सेट ले जाने के दृश्य भी यहाँ दिखाई पड़ जाते हैं।

[बस्तर राज महल का मुख्यद्वार]  

भौगोलिक क्षेत्र: बस्तर अब दण्तेवाड़ा, नारायणपुर, बीजापुर, बस्तर एवं कांकेर जिलों में विभाजित हो चुका है। किंतु जब हम बस्तर क्षेत्र की चर्चा करते हैं तब उसकी कल्पना दण्तेवाड़ा ,बीजापुर, नारायणुपर, एवं कांकेर के बिना अधूरी प्रतीत होती है। सबसे पहले बस्तर जिले को दो जिलों यथा बस्तर एवं कांकेर में विभाजित कर दिया गया किंतु बस्तर संभाग के अस्तित्व के कारण बस्तर शब्द की प्रशासनिक स्थिति बनी रही। आगे चलकर दण्तेवाड़ा जिला अस्तित्व में आया एवं बाद में बीजापुर एवं नारायणपुर जिले के अस्तित्व के बाद बस्तर जिले के पास जब 32 विकास खण्डों में से 12 विकास खण्ड ही रह गये तो बस्तर संभाग का प्रशासनिक अस्तित्व भी समाप्त हो गया। किंतु आज भी बस्तरियों के मनोमस्तिष्क में बस्तर बसा है। जाहे कितने भी प्रशासनिक फेरबदल क्यों ना हो जायें, यह बस्तर अस्तित्व में बना रहेगा।

लेखक परिचय:-


शरद चन्द्र गौड तथा कविता गौड बस्तर अंचल में अवस्थित रचनाकार दम्पति हैं। आपका बस्तर क्षेत्र पर गहरा अध्ययन व शोध है।

आपकी प्रकाशित पुस्तकों में बस्तर एक खोज, बस्तर गुनगुनाते झरनों का अंचल, तांगेवाला पिशाच, बेड नं 21, पागल वैज्ञानिक प्रमुख हैं। साहित्य शिल्पी के माध्यम से अंतर्जाल पर हिन्दी को समृद्ध करने के अभियान में आप सक्रिय हुए हैं।

बस्तर छत्तीसगढ़ के दक्षिण में स्थित है। बस्तर का प्रवेश-द्वार छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से है। बस्तर का क्षेत्रफल 39114 वर्ग किलोमीटर हैं एवं यह केरल प्रान्त से भी बड़ा है। इसकी सीमायें पूर्व में उड़ीसा, पश्चिम में महाराष्ट्र तथा दक्षिण में आन्ध्रप्रदेश से लगी हुई है। उत्तर में छत्तीसगढ़ के रायपुर, दुर्ग तथा राजनांदगांव जिलों से उसकी सीमा संलग्न है। बस्तर मुख्यत: पहाड़ी एवं पठारी क्षेत्र है। इसके उत्तर एवं दक्षिण का धरातल निचला है। उत्तर पूर्व में विस्तृत उच्चतम भूमि है। उत्तर -पश्चिम में अबूझमाड़ का पहाड़ी भाग स्थित है। दक्षणि-पश्चिम में दन्तेवाड़ा की तराई तथा कुटरु बीजापुर की उच्चतम भूमि है। दक्षिण में पठार की सीमा गोदावरी के मैदान तथा पूर्व में इन्द्रावती के मैदान से बनती है। बस्तर संभाग के लगभग मध्य भाग में स्थित पर्वतमाला बैलाडीला इस अंचल के सबसे ऊँचे शिखर से युक्त है। इसकी अधिकतम ऊँचाई 4160 फुट है।

कांकेर से लगी हुई केशकाल घाटी है। हेयर-पिन टर्निंग वाली यह घाटी अद्भुत छटा लिये हुये है। नेशनल हाइवे से जाते हुए महसूस होने लगता है कि बस्तर यहीं से शुरू हो गया। बस्तर का पहनावा, यहाँ की बात, बोली, रहन-सहन सब केशकाल से शुरू हो जाता है। केशकाल से नेशनल हाइवे में आगे जाते हैं कोंडागांव और जिला मुख्यालय जगदलपुर पहुँचते हैं, इससे आगे दंतेवाड़ा, बीजापुर सुकमा, कोंटा एवं मड़ई के लिये देश-विदेश में चर्चित नारायणपुर कोण्डागाँव से पश्चिम में 50 किलोमीटर की दूरी पर है। कांकेर की सुबह किसी हिल स्टेशन का अहसास दिलाती है। दूध नदी एवं उसके सामने खड़ा विशाल गड़िया पहाड़, बड़े-बड़े काले ग्रेनाइट पत्थर अदभुत नजारा उपस्थित करते हैं। पर्यटकों के घूमने के लिए चित्रकोट का प्रपात, कोटमसर की विश्वप्रसिद्ध गुफा, कैलाश गुफा, तीरथगढ़ का झरना, चिंगीतराई, बैलाडीला में लौह अयस्क के पहाड़ों की श्रंखला, दंतेश्वरी माई का मंदिर, अकाशनगर, बारसूर की पुरातात्विक धरोहर आदि कई स्थान है।
[चित्रकोट जलप्रपात] 

इंद्रावती नदी के किनारे बसा जिला मुख्यालय जगदलपुर अपने आप में दर्शनीय है। जगदलपुर नगर के हृदय स्थल में स्थित शहीद पार्क, दलपत सागर का आइलेण्ड, दण्तेश्वरी मंदिर, बालाजी मंदिर, आसनापार्क, लामनी पार्क पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। अन्य पर्वतों में अबूझमाड़ के पहाड़ , तुलसी डोंगरी, तेलिनघाटी, कोडेरघाटी, अरनपुर घाटी, रावनघाट तथा तरान्दुल के पहाड़ उल्लेखनीय है। संभाग के बीचों बीच पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित नदी इन्द्रावती इस क्षेत्र की सबसे बड़ी नदी है। इसकी कुल लम्बाई 402 किलोमीटर है। बस्तर अंचल में यह 386 कि.मी. बह कर गोदावरी नदी में मिल जाती है। अन्य नदियों में शबरी, शखनी, डंकिनी, नारंगी, कोटरी प्रमुख है। इन्द्रावती नदी पर चित्रकोट एवं कांगेर नदी (मुनगा गहार नदी भी कहते हैं) पर तीरथगढ़ के सुन्दर जल-प्रपात प्रसिद्ध है।

बस्तर अपने सघन वनों के लिये प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में यह दण्डकारण्य का एक हिस्सा था। कालान्तर में गुप्तकाल के आसपास इसे महाकान्तार कहा जाता था। व्हेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत में बैलाडीला का उल्लेख भी किया है। ऐंसा माना जाता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में हल्बा जाति बिहार से पलायन कर दक्षिण भारत पहुँच गयी एवं कालांतर में उनकी पीढ़ी बस्तर क्षेत्र में निवास करने लगी। बस्तर का 55.8 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है। यहां की प्राकृतिक स्थिति तथा मानसूनी जलवायु सागौन तथा साल वनों के लिये सर्वथा अनुकूल है। बस्तर को ‘‘साल वनों का द्वीप’’ भी कहा जाता है। यहाँ की उष्ण-आर्द्र जलवायु में बीजा, टिक्स, साजा, हल्दू, शीशम जैसी इमारती लकडी के वृक्ष तथा बांस के वन यत्र तत्र प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। अनेक प्रकार की लताएं, गुल्म, झाड़ियाँ, वनोषधियाँ, कन्द-मूल-फल इत्यादि की भी यहाँ प्रचुरता रही है। वन उपज में हर्रा, शहद, तिखुर, चिरौंजी, भेलवां लाख, धूप, महुआ इमली, सरई बीज, तेंदुपत्ता जैसी उपयोगी वस्तुएं उपलब्ध होती हैं। फूल बुहारी, सिंयाडी की रस्सी मसनी भी वनोपज से बनाई जाती है। इस अंचल में जंगली भैंसा, नीलगाय, शेर, चीता, तेंदुआ, चीतल, सांभर, बारहसिंगा, भालू, जंगली सूअर, बंदर तथा खरगोश जैसे वन्य पशु एवं मैना, मोर, बुलबुल, तोता, तीतर, बटेर, जंगली मुर्गी जैसे जंगली पक्षी पाये जाते है। बस्तर की मैना अपनी बोली के कारण विख्यात रही है। वन्य प्राणी सुरक्षा संबंधी कानूनों तथा बस्तर के अभ्यारण्यों में से जंगली भैसों, शेरों तथा अन्य प्राणियों की सुरक्षा की आशा बँधी है। अन्यथा इनका काफी विनाश होता रहा है। खनिज संसाधनों की दृष्टि से बस्तर भारत के अत्यधिक सम्पन्न क्षेत्रों में से एक है। यहाँ का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध अयस्क लोहा है। बैलाडीला, रावघाट, छोटे डोंगर, चेरागांव, कुरसुबोरी, कोंडा परवा में इसका भण्डार हैं। बैलाडीला से लौह अयस्क का निर्यात जापान को किया जाता है। अन्य महत्वपूर्ण खनिजों में टिन, बाक्साइट, कोरण्डम, अभ्रक, चूना पत्थर प्रमुख है।

साप्ताहिक बाजार का दिन यहाँ के रहवासियों के उत्सवित होने का खास दिन होता है। कई-कई किलोमीटर से स्त्री-पुरूष, बच्चे पैदल चल कर यहाँ आते हैं। बाजार तक का सफर एक तरह से जीवन का सफर होता है। पूरे सप्ताह भर बच्चे, बूढ़े, जवान इसी दिन का इंतजार करते हैं। गोंचा, एवं दशहरे के अवसरों पर पूरे बस्तर के गाँव-गाँव से, घर-घर से लोग जगदलपुर पहुँचते हैं। 

खाने पकाने के बर्तन, अनाज, कपड़े-लत्तों के साथ। इन दिनों जगदलपुर का दृश्य ही बदल जाता है। कलेक्टोरेट के सारे बरामदे, अन्य सरकारी भवन, अधिकांश लोगों के घर-परछी, बाग-बगीचे, सड़क के किनारे, यहाँ-वहाँ जहाँ भी देखिये भोजन बन रहा है। एक झुण्ड में बैठे सब बातें कर रहे हैं। आंगा देव के साथ कुछ लोग अलग झुंड में हैं। आंगा विशेष लकड़ी से बना होता है, दिखने में फ्रेम जैसा, दोनों सिरे को कंधे पर उठाकर दो व्यक्ति चलते हैं, दौड़ते हैं, आंगा को खेलाते हैं। वही आंगा उनके दुख-दर्द में सबसे नजदीक रहता है, खुशियों में सबसे सामने रहता है।

 बस्तर दशहरे में मावली परघा का कार्यक्रम बड़ा आकर्षक होता है, किसी भव्य शादी की बारात भी फीकी लगती है, जब दंतेश्वरी माई के छत्र का यहाँ आगमन होता है। दशहरे के रथ का निर्माण काफी पहले से शुरू हो जाता है। 

बस्तर की जनजातीय विविधता, जीवन-शैली, सामाजिक रीति-रिवाज एवं धार्मिक मान्यताएं जहाँ रूचिकर एवं जिज्ञासा उत्पन्न करने वाली है, वहीं बस्तर का प्राकृतिक सौन्दर्य मन मोह लेता है।

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