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Sunday, November 21, 2010

बस्तर दशहरा

बस्तर  दशहरा
बस्तर अंचल के दशहरे का संबंध रावण वध से नहीं है। इसकी जन स्वीकृति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह 75 दिनों तक चलता है। एवं इसमें शामिल होने बस्तर के कोन-कोने से आदिवासी आते हैं। बस्तर दशहरे का रूवरूप बस्तर के राजघराने की परंपराओं एवं जगन्नाथपुरी की रथ परिक्रमा परंपरा से जुड़ा हुआ है। वहीं माँ दण्तेश्वरी के साथ ही बस्तर के सभी देवी देवताओं के छत्रों की इस अवसर पर उपस्थित इसे जनस्वीकृति एवं धार्मिक स्वरूप प्रदान करती है। एक लोक उत्सव के रूप में इसकी ख्याति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इस अवसर पर देश विदेश के हजारों पर्यटक जगदलपुर आते हैं। पूर्व बस्तर राज्य के परगनिया माँझी, माँझी, मुकद्दम और कोटवार आदि ग्रामीण आज भी दशहरे की व्यवस्था में समय से पहले मनोयोग से जुट जाया करते हैं। भूतपूर्व बस्तर राज्य में मंदिर व्यवस्था की देख रेख में दशहरा मनाया जाता था। हर गांव से खाने-पीने की सामग्री जुटाई जाती थी एवं इस सामग्री को कोठी के कोठिया को सोंप दी जाती थी। समय एवं परिस्थियों के बदलने पर षासन ने जनभावनाओं का संम्मान करते हुए दशहरा कमेटी के माध्यम से इसे मूर्त रूप दिया है। कहा जात है कि चालुक्य नरेष पुरूशोत्तम देव ने एक बार जगन्नाथपुरी तक पैदल यात्रा की एवं जगन्नााथ मंदिर में एक लाख स्वर्णमुद्रयें एवं आभूशंण भेंट किये। भगवान जगन्नाथ ने प्रसन्न होकर वहाँ के पुजारी को स्वप्न में आकर राजा पुरूशोत्तम देव को रथपति घोशित कर दिया। तभी से परंपरागत रूप से दशहरे एवं गोंचा पर्व के समय रथ चलाने की परंपरा है। राजषाही ेके समय इन रथों पर राजा बैठा करते थे। बदली परिस्थतियों में अब दण्तेश्वरी मंदिर जगदलपुर के पुजारी रथ पर बैठते हैं । बस्तर राजवंश से जुड़े परिवारों एवं राजमहल की सक्रिय भागीदारी बस्तर दशहरे को राजषाही रूप प्रदान करती है।

हरियाली अमावस्या के दिन पाटजात्रा पूजा के लिए ठुरलू खोटला लकड़ी बिलोरी ग्राम के 65 परिवार के सदस्य माजकोट वन क्षेत्र से लाते हैं। यह रथ निर्माण के लिये प्रथम लकड़ी होती है। प्रत्येक धर से एक-एक सदस्य जंगल जाता है एवं ठोस तने वाले साल वृक्ष की लकड़ी काटता है। पाट जात्रा से दो दिन पूर्व लकड़ी काटी जाती है एवं जंगल से ग्राम तक कंधे पर रख कर लाई जाती है। गांव से षहर बिना बैेल की बैलगाड़ी का उपयोग परंपरा अनुसार ठुरलू खोटला लकड़ी लाने में किया जाता है।
काछनगादी-
बस्तर दशहरे का प्रारंभ काछन गादी की परंपरा से होता है। इस दिन मिरगान जाति कि एक क्वांरी कन्या पर काछन देवी आती हैं। यह कार्यक्रम अष्विन मास की अमावश्या के दिन आयोजित होता है। पहले राजा गाजे-बाजे एवं जलूस के साथ पथरागुड़ा के भंगाराम चौक पर स्थित काछिन गुड़ी आते थे किंतु अब इस परंपरा का निर्वाहन दण्तेश्वरी मंदिर के पुजारी करते है। मिरगान जाति की क्वांरी कन्या पर जब काछन देवी आ जाती हैं तो उसे कांटो की गद्दी पर बिठा कर, सिरहा (पुजारी) द्वारा झुलाया जाता है। देवी की पूजा अर्चना कर दशहरा मनाने की स्वीकृति प्राप्त की जाती है। काछिन देवी के प्रसाद को उसकी स्वीकृति मान कर बस्तर दशहरे के समारोह की षुरूआत होती है।
जोगी बिठाई-
अश्विनी शुक्ल 1 को स्थानीय सीरासार (सिरहासार) में जोगी बिठाई की रस्म पूरी की जाती है। कहा जाता है कि दशहरे का कार्यक्रम निर्वघ्न चले किसी प्रकार की परेशानियां ना आयें इसी कामना के साथ हल्बा समाज का एक आदमी सीरासार भवन के मध्यभाग में बनाये गये गङ्ढे में दशहरे की समाप्ती तक लगातार नौ दिनों तक योगासन की मुद्रा में बैठता है। जोगी इस बीच सिर्फ फलाहार करता है।जोगी बिठाई के समय बली देने का भी रिवाज है।
रथ परिक्रमा-

जोगी बिठाई के दूसरे दिन से रथ परिक्रमा शुरू हो जाती है। पहले 12 पहियों वाला विशाल रथ चलाया जाता था किंतु चलाने में होने वाली असुविधा के कारण अब 4 चक्कों वाला रथ चलाया जाता है। कहा जाता है कि राजा पुरूशोत्तम देव को भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में आकर रथपथी घोशित किया था तब से ही रथ पर बस्तर राजा आरूढ़ होते हैं। किंतु अब माँ दण्तेश्वरी का छत्र ही आरूढ़ होता है साथ में मंदिर के पुजारी होते हैं। रथ को आकर्शक तरीके से फूलों से सजाया जाता है। अश्विशुक्ल 2 से अश्विशुक्ल 7 तक प्रतिदिन रथ गोलबाजार की परिक्रमा कर दण्तेश्वरी मंदिर के सिंहद्वार पर आकर खड़ा हो जाता है। इस अवसर पर गांव-गांव से अमंत्रित देवी देवताओं के छत्र एवं गाजे-बाजे आज भी दिखलाई पड़ते हैं। रथ को बढ़ी-बढ़ी रस्सियों की सहायता से स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोग अपार श्रध्दा के साथ खींचते हैं।रथ परिक्रमा में स्थानीय हल्बा समुदाय के लोगों का विषेश महत्व होता है।
निशाजात्रा-
अश्विशुक्ल 8 दुर्गाश्टमी को निषाजात्रा का जलूस इतवारी बाजार के पूजामंडप पहुँचता है जहाँ पूजा की जाती है।
मावली-परधाव-
अश्विशुक्ल 9 को संध्या 9 बजे मावली-परघा होती है। इस अवसर पर दण्तेवाड़ा से आई माँ दण्तेश्वरी की डोली में मावली माता का स्वागत किया जाता है। मावली देवी को माँ दंतेष्वरी का ही एक रूप माना जाता है। इस प्रकार कहा जाता है कि बस्तर दशहरे को अपना आषीर्वाद देने मावली देवी के रूप में स्वयम् माँ दण्तेश्वरी उपस्थित रहती हैं। मावली माता की मूर्ती नये कपड़े में चंदन का लेप कर बनाई जाती है। मावली माता की डोली को राजपरिवार के सदस्य, पुजारी राजगुरू और अन्य श्रध्दालू दंतेष्वरी मंदिर तक पहुंचाते है। इसी दिन जोगी उठाई की रस्म भी होती है।
भीतर रैनी-
विजया दषमी के दिन भीतर रैनी एवं एकादषी के दिन बाहर रैनी का कार्यक्रम संपन्ना होता है। रथ गोलाबाजार की परिक्रमा करता है एवं इसके बाद दण्तेश्वरी मंदिर के पास आकर खड़ा हो जाता है। इस अवसर पर बली देने की भी परंपरा रही है। इसी दिन रात्रि को परंपरा अनसार रथ की चोरी कर आदिवासी कुमड़ाकोट ले जाते हैं।
बाहर-रैनी-

एकादषी के दिने राजपरिवार के सदस्य, पुजारी एवं विभिन्ना ग्रामों से आये मांझी ,मुखिया , पुजारी अपने ग्राम देवी-देवताओं के छत्रों के साथ देवी की पूजा करते हैं एवं अन्ना अर्पित कर प्रसाद ग्रहण करते हैं। फूल मालाओं, नये कपड़ों एवं झालरों से सजा हुआ रथ गाजे-बाजे के साथ लालबाग की मुख्य सड़क से होते हुए कोतवाली चौक पहुँचता है, मेन रोड , गुरूनानक चौक से होते हुए रथ पुन: दण्तेश्वरी मंदिर पहुँच जाता है। हजारों की संख्या में उपस्थित जनसमुदाय, रंग'बिरंगे कपड़ों में सजे आदिवासी इस अवसर पर विषेंश आकर्शंण का केन्द्र होते हैं।
मुरिया-दरबार-
बाहर रैनी के दूसरे दिन अश्विशुक्ल 12 को मुरिया दरबार का आयोजन स्थानीय सीरासार में किया जाता है। सही मायने में यह काकतीय राजवंषीय बस्तर के राजाओं की संसद रही है जिसमें राजा, राजगुरू एवं उनके मंत्री, सीधे विभन्ना ग्रामों से आये मांझ, मुखिया, एवं अन्य ग्राम प्रतिनिधयों से चर्चा करते थे। आज भी मुरिया दरबार के स्वरूप को प्रजातांत्रिक स्वरूप में स्वीकार किया जा रहा है। इस परंपरागत दरबार में राज्य के मुख्यमंत्री, बस्तर के सांसद, सभी विधायक भाग लेते हैं। एवं बस्तर क्षेत्र में विकास योजनाओं पर चर्चा की जाती है। बदले हुए स्वरूप में जनप्रतिनिधि बस्तर क्षेत्र के विकास के लिये अपनी मांगे मुख्यमंत्री के समक्ष रखतें हैं। इस प्रकार इस परंपरागत दरबार का एक सार्थक उपयोग बस्तर दशहरे की विषेशता है।
ओहाड़ी-
गंगामुण्डा में बनाये गये मावली माता के मण्डप से अश्विशुक्ल 13 को मावली माता को समारोह पूर्वक दण्तेवाड़ा के लिये विदा किया जाता है। इस विदायी समारोह को ओहाड़ी कहते हैं। ओहाड़ी के साथ ही बस्तर दशहरे के कार्यक्रम समाप्त हो जाते हैं
लोकउत्सव का स्वरूप ग्रहण कर चुके बस्तर दशहरे को देखने देश-विदेश से हजारों षैलानी आते हैं, इनकी चहल-पहल विभिन्ना पर्यटन स्थलों पर देखी जा सकती है। इस अवसर पर राज्य षासन की तरफ से विकास प्रदर्षनी का आयोजन किया जाता है। दशहरे के अवसर पर पहुँचे मनोरंजन पार्क भी लोगों को आकर्शित करते हैं।

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